महारानी विक्टोरिया और उनके मुंशी अब्दुल करीम पर बनी ब्रिटिश फिल्म 'विक्टोरिया एंड अब्दुल' ने आपको काफी शोहरत दिलाई। अब्दुल के रोल और 1850 के दशक को समझने के लिए क्या तैयारी की थी? अब्दुल करीम आगरा के भले ही थे, लेकिन भारत का नक्शा तब काफी बदल चुका था। 1857 की क्रांति हो चुकी थी। रेलगाड़ी जैसी नई चीज देश में आ चुकी थी। लेकिन उसमें सफर सिर्फ अंग्रेज ही करते थे। आम भारतीय को तो पैदल, साइकिल, रिक्शा से ही यात्रा करनी होती थी। अदालतों का ज्यादातर कामकाज उर्दू में होता था। अब्दुल के सिर्फ तीन-चार ओरिजनल फोटो मिलते हैं। फिल्म साइन करके जब मैं लंदन गया तो एक महीने होटल में रहा। उस दौर को समझने के लिए इतिहास की 10-12 किताबें पढ़ीं। शरबानी बसु की किताब पढ़ी? जिस पर फिल्म आधारित थी।
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उस वक्त मैंने सबसे झूठ बोला कि पढ़ी है, लेकिन स्क्रिप्ट को खूब ध्यान से पढ़ा। उसमें काफी फैंटेसी थी। कहानी जटिल थी, क्योंकि महारानी और अब्दुल के बीच आध्यात्मिक-आत्मीय संबंध थे। प्रेम था, दोस्ती थी। अब्दुल महारानी से मिले थे, तो वह 67 साल की थीं और अब्दुल 30 के थे। 82 की उम्र में महारानी की मृत्यु हुई। फिल्म में अब्दुल के जीवन को अधिक नहीं दिखाया। इसकी वजह? फिल्ममेकर कहानी को विक्टोरिया और अब्दुल की रिलेशनशिप के बुलबुले तक सीमित रखना चाहते थे। वह फूटा तो उनके लिए कहानी खत्म हो गई। अब्दुल के लिए वह वक्त मुश्किलों भरा था। आगरा में उन्हें गद्दार की तरह देखा जा रहा था और ब्रिटेन में महारानी की वजह से लोग उनके दुश्मन बने थे। विक्टोरिया की मृत्यु के बाद अब्दुल आगरा में उनकी प्रतिमा के पास जाकर बैठते थे। वहीं 1909 में उनकी मौत हुई।
मनीषा कोइराला मेरी मां के रोल में हैं। जैकी श्रॉफ भी हैं। हॉलीवुड में काफी काम कर रहे हैं, क्या बॉलीवुड में आपके साथ अन्याय हो रहा है? मुझे छलांग लगाने का मौका नहीं मिला। मैं कदम-कदम आगे बढ़ा हूं। कुछ फिल्में तो मैंने उत्साह में कर ली थीं। 'थ्री इडियट्स' मैंने सेकेंड ईयर कॉलेज में की थी। फिर मास्टर्स भी किया। एक्टिंग भी करता रहा। 'फुकरे' मिली तो सोचा कर लेते हैं। जब तिग्मांशु ने मुझे 'मिलन टॉकीज' के लिए फोन पर कहा कि फैंटम के ऑफिस के पास मेरा ऑफिस है, वहां आ जाना। मैंने कहा कि सर मुझे उनका ऑफिस नहीं मालूम, क्योंकि वहां से मुझे कॉल्स नहीं आते।
ऐसा क्यों...? आर्ट फिल्म वाले मुझे नहीं बुलाते, क्योंकि मेरा लुक आर्ट वाला नहीं है। मुझे नहीं पता कि उनके लिए कैसा दिखना चाहिए। वहीं, कमर्शियल वालों के लिए मैं उतना कमर्शियल नहीं हूं। मैं इसी सोच-विचार के भेद में फंस गया हूं। प्रोड्यूसर सोचता है कि मैं इस पर क्यों पैसा लगाऊं। लेकिन अब धीरे-धीरे हॉलीवुड के बाद मुझे यहां भी पहचान मिल रही है। अब लोग मुझसे कह रहे हैं कि हम आपके साथ काम करना चाहते हैं। 'मिर्जापुर' भी शायद ऐसे ही मिली। मैंने इसके लिए 12 किलो वजन बढ़ाया और गंजा होकर ठेठ यूपी के आदमी जैसा दिखा। हॉलीवुड में और कौन सी फिल्में कर रहे हैं?
दो फिल्में हैं। अगले हफ्ते इनकी शूटिंग शुरू करने जा रहा हूं। यह एक नॉन-फिक्शन किताब पर आधारित बायोपिक है। फिल्म में इराक युद्ध की पृष्ठभूमि है। दूसरी फिल्म के बारे में मुझे बात करने की इजाजत नहीं है। बात की तो फिल्म हाथ से निकल जाएगी।