अपनी टीचर को बहते पानी के किनारे कपड़े उतारते देख किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाने वाला फिल्म मेरा नाम जोकर का बुद्धू सा लेकिन चित्ताकर्षक राजू इस फिल्म के सिर्फ तीन साल बाद ही राजा बनकर जमाने से कहता मिला कि मैं शायर तो नहीं। इसके चेहरे पर अब तक मोहब्बत की तासीर समझ न आने का भरम बाकी था। माशूक के इश्क में पागल होकर इसे मजनू बनना अभी बाकी था। और, साल 1980 में जब इसने शालीनता उतारकर किनारे रखी और दुनिया से चिल्लाकर पूछा, तुमने कभी किसी से प्यार किया? तो जमाने को पता चला कि आखिर प्यार करना किसे कहते हैं?
श्रद्धांजलि: 50 हीरोइनों से मोहब्बत करने वाले ऋषि कपूर के लिए इसलिए कहते थे लोग, वे किसी से कम नहीं
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ऋषि कपूर को रोमांस का राजकुमार इसलिए भी कहा गया कि उन्होंने डिंपल कपाड़िया से शुरू करके नीतू सिंह, मौसमी चटर्जी, शोमा आनंद, संगीता बिजलानी, विनीता गोयल, राधिका, अश्विनी भर्वे हेमा मालिनी, श्रीदेवी, जया प्रदा और दिव्याभारती तक करीब 50 हीरोइनों के साथ परदे पर रोमांटिक गाने गाए हैं। इसमें तीन पीढ़ियों की वे अभिनेत्रियां भी शामिल हैं जो अपने अपने समय में हिंदी सिनेमा की नंबर वन हीरोइन कहलाईं। ऋषि कपूर की फिल्मों के शौकीनों के लिए एक खास बात जो हमेशा नोट करने लायक रही, वह था उनका किसी वाद्य यंत्र के साथ शूटिंग करना। कर्ज में जब वह बार बार अतीत याद दिलाने वाली गिटार की ट्यून बजाते हैं तो उनकी अंगुलियां गिटार के तारों पर बिल्कुल किसी साजिंदे जैसी ही चलती हैं, या फिर सरगम का वो गाना, ढपली वाले ढपली बजा। इस गाने के शुरू होने से पहले जया प्रदा कन्हैया की प्रतिमा से एक माला निकालकर ऋषि कपूर के गले में डालती हैं। ऋषि कपूर की सिनेमा में बरसों की मेहनत को जानने, समझने और समझाने का सारा काम निर्देशक के विश्वनाथ ने बस 30 सेकंड में कर दिखाया। बॉबी से लेकर दीवाना तक वो हिंदी सिनेमा के कन्हैया ही बने रहे।
और, जब कंस बनने की चुनौती सामने आई तो ऋषि कपूर ने वो भी करके दिखाया। अपने पिता यश जौहर की अमिताभ बच्चन के साथ बनाई फिल्म अग्निपथ का करण जौहर ने जब रीमेक किया तो उसमें एक नए किरदार का प्रवेश हुआ, रऊफ लाला। आंखों में सुरमा, पठानी सूट और हाथ में लंबा रूमाल, कोई सोच भी नहीं सकता था कि शाहरुख खान जैसे सितारों को बाहें फैलाकर और शरीर को एक तरफ झुकाकर संवाद बोलने वाली अदाएं सिखाने वाला कलाकार ऋषि कपूर, लोगों के मन में अपने लिए नफरत भी जगा सकता है। क्योंकि, ऋषि कपूर को तो लोगों ने एक चादर मैली सी में भी प्यार किया और जहरीला इंसान में भी।
लेकिन, हिंदी सिनेमा का ये वो भंवरा रहा जिसने पूरा जीवन सिर्फ फूल खिलाने पर फोकस किया, फूल को राजकंवर ले जाए या कोई और, उसने न परवाह की और न ही कभी इस बात का गम किया। तब भी जब कॉमेडी के तमाम दृश्यों में बराबर की साझेदारी के बावजूद तालियां अमिताभ बच्चन को मिलीं और तब भी जब 102 साल के पिता के जिद्दी बेटे के रूप में शानदार काम करने के बावजूद पुरस्कारों की लिस्ट में उनका नाम तक न दिखा।
हिंदी सिनेमा के जिस दौर में ऋषि कपूर ने तमाम मेनकाओं को संन्यासिन बना दिया, उस दौर में अभिनेता गानों पर होंठ चलाने में आनंद भी उठाते थे और उन्हें इसमें मज़ा भी आता था। ट्रेन की छत पर चढ़कर गाने की शुरुआत करना हो या फिर कव्वाली में महफिल लूट लेना, अकबर इलाहाबादी के किरदार में रच जाने वाले ऋषि कपूर ने हर बार कहा, हम किसी से कम नहीं।

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