'गुल मकई', यानी कि मक्के का फूल। नोबेल शांति पुरस्कार जीत चुकीं मलाला यूसुफजई इसी नाम से बीबीसी (ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेज) पर आतंकवाद के खिलाफ अपना ब्लॉग लिखती थीं। अब मलाला की बायोपिक इसी नाम से रिलीज होने जा रही है। इस कहानी को फिल्माने का बीड़ा किसी पाकिस्तानी निर्देशक ने नहीं बल्कि भारतीय निर्देशक अमजद खान ने उठाया है। पिछले आठ साल से वह इस फिल्म को लेकर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इस महीने के आखिरी शुक्रवार को रिलीज होने जा रही गुल मकई को लेकर अमजद ने अमर उजाला से ये खास बातचीत की।
EXCLUSIVE: पाकिस्तान की मलाला पर इस निर्देशक ने बनाई फिल्म, मिल रहीं जान से मारने की धमकियां
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लोग यह नहीं देखते कि एक लड़की को नोबेल का शांति पुरस्कार मिला है बल्कि वह यह देखते हैं कि यह एक पाकिस्तानी लड़की की कहानी है। इस फिल्म की घोषणा मैंने तब की थी जब मलाला को नोबेल भी नहीं मिला था। मैंने पाकिस्तानी पत्रकारों से लेकर लंदन में रहने वाले पत्रकारों, लेखकों और कुछ और लोगों के सहयोग से मलाला से संपर्क किया। मलाला की कहानी में हमें करीब तीन साल का वक्त लगा। मलाला के किरदार के लिए बांग्लादेश की एक लड़की फातिमा का चयन किया गया। उसने अपने स्कूल में ये बता दिया और उसके घर पर पथराव हो गया। बाद में हमने इस किरदार के लिए रीम शेख का चुनाव किया।
लंदन में मैंने उन्हें और उनके परिवार को यह फिल्म दिखाई। यह फिल्म देखने के दौरान सभी कई बार भावुक हो गए। उनकी मां और भाई तो कई दफा चिल्ला भी दिए। करीब चार बार हमें वह फिल्म रोकनी पड़ी। यह घटना उनके साथ बीती थी इस वजह से उनका हर एक दर्द उभर कर सामने आ रहा था। मैंने संयुक्त राष्ट्र में संपर्क किया और विश्व के कुछ चुंनिदा लोगों को फिल्म देखने के लिए आमंत्रित किया जिसमें लंदन से करीब 60 लोग और भारत के भी छह लोग मौजूद थे। सभी ने इस फिल्म को स्टैंडिंग ओवेशन दिया।
फिल्म को रिलीज करने का यही वक्त क्यों चुना?
यह फिल्म साल 2019 में ही बनकर तैयार हो गई थी लेकिन फिर आम चुनाव आ गया जिस वजह से फिल्म की रिलीज रोकनी पड़ी। उसके बाद पुलवामा हो गया फिर बालाकोट, 370 जिसके चलते फिल्म की रिलीज लगातार आगे बढ़ती गई। सीएए आने से पहले ही हमने इस फिल्म की घोषणा कर दी थी और हमें लगता है कि फिल्म रिलीज करने का अब यह मुनासिब समय है।
इस फिल्म को चयन करने की पीछे क्या वजह रही?
मुझे समझना था कि आखिर यह कौन सी विचारधारा है जिस पर आतंकवादी काम करते हैं। मैं जानना चाह रहा था कि इस्लाम की ऐसी कौन सी सोच है जिसे लेकर ये आंतकवादी काम कर रहे हैं और इस्लाम की ही ऐसी कौन सी विचारधारा है जिसपर मलाला जैसी लड़की चल रही है। आतंकवाद में सबसे बड़े समूह की बात करें तो वह इस्लाम में हैं। वहीं दूसरी तरफ सबसे बड़े शांति के दूतों की बात करें तो वह भी इस्लाम में हैं। मुझे यही साहस फिल्म के जरिए लोगों को दिखानी थी।
यह फिल्म पाकिस्तान में रिलीज नहीं हो रही है। यह फिल्म पाकिस्तान की हकीकत को उजागर करती है। यह उन पर सवालिया निशान लगा देता है कि आखिर कैसे एक आंतकवादी को रेडियो स्टेशन चलाने की अनुमति मिल जाती है जिससे वह लड़कियों के ना पढ़ने जैसे फरमान जारी करता है। संयुक्त राष्ट्र में भी पाकिस्तान की ओर से आए हुए सदस्यों ने इसे रिलीज नहीं होने देने की बात कही थी। तकरीबन रोज ही मुझे मार देने की धमकी मिलती रहती है।
यह फिल्म दिवंगत अभिनेता ओम पुरी की आखिरी फिल्म है, कैसे याद करना चाहेंगे उन्हें?
मुझे तो वह अब्बा कहकर बुलाते थे। फिल्म में उनका एक छोटा सा किरदार है जिसमें वह जनरल कय्यानी का रोल निभा रहे हैं। मेरे एक बार कहने पर ही वह इस किरदार को करने के लिए राजी हो गए थे। वह हमें बहुत याद आते हैं।