अमरीश की पहली फिल्म थी 1970 में आई प्रेम पुजारी। आखिरी फिल्म थी 2006 में आई कच्ची सड़क। उनका सबसे यादगार रोल था मिस्टर इंडिया के लिए मोगैंबो का। जिसका डायलॉग आज भी फेमस है। उन्होंने ज्यादातर विलेन की भूमिकाएं ही निभाईं। नकारात्मक भूमिकाओं को वो इस ढंग से निभाते थे कि एक वक्त ऐसा आया जब हिंदी फिल्मों में 'बुरे आदमी' के रूप में लोग उन्हें पहचानने लगे। हिंदी सिनेमा के इतिहास में मोगैंबो को उनका सबसे लोकप्रिय किरदार माना जाता है।
अमरीश पुरी असल जीवन में बहुत ही अनुशासन वाले व्यक्ति थे। उन्हें हर काम सही तरीके से करना पसंद था। चाहे फिल्में हो या निजी जीवन का कोई भी काम। अमरीश पुरी हिंदी फिल्मों के सबसे महंगे विलेन थे। उनकी फीस उस दौर के अभिनेताओं को भी हैरान करती थी। कहा जाता है कि एक फिल्म के लिए वह 1 करोड़ रुपये तक फीस ले लेते थे। लेकिन जहां मामला जान पहचान का होता था वहां अपनी फीस कम करने में भी उन्हें कोई गुरेज नहीं था। हालांकि ये आकंड़ा उन फिल्मों का है जिनका बजट ज्यादा होता था।
बताया जाता है एक बार एन.एन. सिप्पी की फिल्म उन्होंने साइन की लेकिन किसी वजह से 2-3 साल तक शूटिंग शुरू नहीं हो पाई। जब फिल्म शुरू हुई तो अमरीश पुरी ने उस समय के रेट के हिसाब से फीस मांग ली। लेकिन जब एन.एन. सिप्पी ने उन्हें इतनी फीस देने से इनकार किया तो उन्होंने फिल्म ही छोड़ दी।
इस बारे में अमरीश पुरी ने एक इंटरव्यू में कहा था- जब मैं अपने अभिनय से समझौता नहीं करता तो मुझे फीस कम क्यों लेनी चाहिए। निर्माता को अपने वितरकों से पैसा मिल रहा है क्योंकि मैं फिल्म में हूं। लोग मुझे एक्ट करते हुए देखने के लिए थियेटर में आते हैं। फिर क्या मैं ज्यादा फीस का हकदार नहीं हूं? सिप्पी साहब ने अपनी फिल्म के लिए मुझे बहुत पहले से साइन किया था, इस वादे के साथ कि फिल्म पर एक साल में काम शुरू होगा। अब तीन साल हो गए हैं, और मेरी फीस बाजार के रेट के हिसाब से बढ़ गई है। अगर वह मुझे मेरे काम जितनी फीस नहीं दे सकते तो मैं उनकी फिल्म में काम नहीं कर सकता।
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Amrish Puri
- फोटो : Amar Ujala
परदे पर विलेन बनकर भी हर किसी के दिलों में बसने वाले अमरीश पुरी को अपनी किसी भी फिल्म के लिए बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड नहीं मिला। कुछ एक फिल्मों के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का अवॉर्ड जरूर मिला। एक्टिंग को प्रोफेशन मानकर गंभीर रहने वाले अमरीश पुरी ने भारतीय रंगमंच और सिनेमा को अपनी जिंदगी के 35 साल दिए और हिंदी सिनेमा में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है।