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लाहौर में जन्मे अमरीश पुरी ने बॉलीवुड पर कई साल किया राज, बेटे को क्यों रखा फिल्मों से दूर?
बीबीसी हिंदी
Published by: anand anand
Updated Sat, 22 Jun 2019 01:57 PM IST
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Amrish Puri
- फोटो : file photo
दिग्गज अभिनेता अमरीश पुरी का शनिवार को 87वां जन्मदिन है, इस मौके पर गूगल ने डूडल बनाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी है। मिस्टर इंडिया, त्रिदेव, मेरी जंग, घायल जैसी फ़िल्मों के जरिए अपने अभिनय का लोहा मनवाने वाले अमरीश पुरी का जन्म 22 जून, 1932 में लाहौर पाकिस्तान (तब अविभाजित भारत) में हुआ था। 400 से ज़्यादा फ़िल्मों में काम करने वाले अमरीश पुरी का 12 जनवरी, 2005 में निधन हुआ।
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उनकी रौब भरी आवाज में बोला गया डायलॉग- मोगैंबो खुश हुआ आज भी लोगों की ज़ुबान पर छाया है। लंबा चौड़ा क़द, दमदार आवाज़, डरावने गेटअप और ज़बरदस्त शख़्सियत के ज़रिए सालों तक फ़िल्म प्रेमियों के दिल में ख़ौफ़ पैदा करने वाले अभिनेता अमरीश पुरी के 87वें जन्मदिन पर उनके बेटे राजीव पुरी ने बीबीसी की सहयोगी मधु पाल से खास बातचीत में उनसे जुड़ी यादों को साझा किया था।
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amrish puri
- फोटो : file photo
राजीव ने बताया कि पर्दे पर खलनायक के तमाम यादगार किरदार निभाने वाले अमरीश पुरी की अदाकारी का असर ऐसा था कि घर आने वाले दोस्त तक उनके पिता से डरते थे। राजीव ने कहा, "मैं और मेरा पूरा परिवार उन्हें कई सालों से थिएटर करते देख चुके थे। हमें पता था कि वो सिर्फ किरदार निभाते हैं थिएटर में। लेकिन मेरे दोस्त जब मेरे घर आया करते थे, तब वो मेरे पिता की मौजूदगी में हमेशा सहमे हुए रहते थे। लगातार मिलने के बाद वो उन्हें बेहतर तरीके से समझने लगे और धीरे-धीरे उनका डर ख़त्म हो गया।"
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परदे पर कठोर दिखने वाले अमरीश पुरी क्या निजी ज़िन्दगी में भी ऐसे ही थे?बकौल राजीव, "नहीं, मेरे पिता कठोर नहीं थे। वो एक हिम्मती इंसान थे। वो एक पारिवारिक आदमी थे। उन्हें अनुशासन में रहना पसंद था। उन्हें हर काम सही तरीके से करना पसंद था।" राजीव के मुताबिक अमरीश पुरी ने उन पर कभी अपनी मर्जी नहीं थोपी। राजीवने बताया, "उस वक्त बॉलीवुड की स्थिति अच्छी नहीं थी तो उन्होंने मुझे कहा कि यहां मत आओ और जो अच्छा लगता है वो करो। तब मैं मर्चेंट नेवी में गया।"
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Amrish Puri
- फोटो : file photo
अमरीश पुरी ने 30 सालों से भी ज़्यादा समय तक हिंदी फिल्मों में काम किया। उन्होंने ज्यादातर खलनायक की भूमिकाएं ही निभाईं। नकारात्मक भूमिकाओं को वो इस ढंग से निभाते थे कि हिंदी फिल्मों में 'बुरे आदमी' का पर्याय बन गए। राजीव पुरी बताते हैं, "पापा को 40 साल की उम्र में फ़िल्मों में पहचान मिली। उनके जैसे किरदार और जिस तरह से वो अपने किरदार के चहरे बदलते थे वो अब तक कोई नहीं कर पाया हैं। आज के दौर में एक खलनायक के तौर पर किसी में इस तरह के एक्सपेरिमेंट करने की हिम्मत नहीं हैं।"
