पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर बनी फिल्म 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' के ट्रेलर लांच के मौके पर इस फिल्म को लेकर चर्चा में रहीं तमाम विरोधाभासों पर विराम लग गया है। फिल्म में लीड किरदार कर रहे अनुपम खेर, संजय बारू का किरदार कर रहे अक्षय खन्ना फिल्म के निर्देशक विजय गुट्टे और निर्माता व वितरक जयंती लाल गडा ने इस मौके पर खुलकर बातें की। जयंती लाल गडा ने शाहरुख खान की फिल्म जीरो के मार्केटिंग राइट्स भी खरीदे थे।
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अनुपम खेर बोले-मैं यह फिल्म करना नहीं चाहता था,
'मेरे पास जब इस फिल्म का प्रस्ताव आया तो मैं इसे कतई करने के मूड में नहीं था। मुझे लग रहा था कि ये एक सियासी फिल्म होगी और इसे करना मेरे लिए उचित नहीं होगा। फिर फिल्म के निर्माताओं में से कुछ लोग मुझसे मिलने आए और मुझसे इसे पढ़ लेने को कहा। फिर एक दिन मैं टेलीविजन देख रहा था और मुझे मनमोहन सिंह जी किसी कार्यक्रम में दिखाई दिए। मुझे ख्याल आया कि क्या मैं इनकी तरह चल सकता हूं। तो मैंने अपने घर में ही उनकी तरह चलने की कोशिश की और मेरी ये कोशिश बहुत खराब थी। बस यही चुनौती मेरे मन पर असर कर गई और मैंने ये फिल्म एक चुनौती के तौर पर स्वीकार की।
अक्षय खन्ना- संजय बारू बनना एक माइलस्टोन रहा
'मैं वैसे तो फिल्मो के मामले में जल्दी हां नहीं करता लेकिन यह फिल्म जब मेरे पास आई और मैंने इसकी स्क्रिप्ट पढ़ी तो मुझे लगा कि किसी प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार का किरदार करना एक अलग तरह का रोमांच है। मैंने फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़ते ही इसे करने के लिए हां कर दिया था।
विजय गुट्टे- फिल्म बनाना पीएमओ में जीने जैसा रहा-
इस फिल्म के लिए संजय बारू की किताब के अधिकार हमने 2014 में खरीद लिए थे। फिर किताब को फिल्म की स्क्रिप्ट में बदलना भी चैलेंजिंग रहा। पूरी फिल्म को प़ढ़ने-लिखने और बनाने के दौरान मुझे ऐसा लगता रहा कि मैं प्रधानमंत्री कार्यालय का हिस्सा बन गया हूं। मेरे लिए ये फिल्म पीएमओ में जीने जैसा रहा।
जयंती लाल गडा- सितारे पिट रहे हैं कहानियां हिट हो रही हैं
पहले ये फिल्म दिसंबर में रिलीज होने वाली थी फिर इसकी तारीख खिसककर जनवरी हो गई। दिसबंर महीना वैसा ही मसाला फिल्मों और बड़े सितारों के लिए इस साल अच्छा नहीं गया। बड़ी-बड़ी फिल्में पिट रही हैं। हमारी कंपनी को कंटेंट ड्रिवेन सिनेमा पर शुरू से भरोसा रहा है और इसीलिए हमने इस फिल्म का जिम्मा उठाने का फैसला किया। फिल्म के प्रोड्यूसरों में से एक सुनील बोरा के पिता मेरे अच्छे दोस्त रहे हैं। उनकी जिद पर मैं ये फिल्म देखने को तैयार हुआ। मुझे लगा कि ये डॉक्यूमेंट्री टाइप फिल्म होगी और मैं 10 मिनट में इसे छोड़कर बाहर आ जाऊंगा पर फिल्म ने मुझे आखिर तक बांधे रखा और इसी के बाद हमने ये फिल्म खरीदी।'
