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Guru Dutt: अभिनेता-निर्देशक गुरुदत्त को बेंगलुरु का सम्मान, इस दिन होगा दो दिवसीय फिल्म महोत्सव का आगाज
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: रुपाली रामा जायसवाल
Updated Fri, 03 May 2024 10:18 PM IST
सार
प्रतिष्ठित फिल्म निर्माता गुरु दत्त को भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, बेंगलुरु इस सप्ताह के अंत में दो दिवसीय फिल्म महोत्सव और गुरु दत्त के हिट गानों की संगीतमय शाम की मेजबानी करेगा।
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गुरु दत्त
- फोटो : सोशल मीडिया
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प्रतिष्ठित फिल्म निर्माता गुरु दत्त को भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है। 'प्यासा', 'कागज के फूल', 'साहब बीबी और गुलाम' और 'चौदहवीं का चांद' जैसी सर्वकालिक बेहतरीन हिंदी फिल्में बनाने वाले अभिनेता और निर्देशक का जन्म 9 जुलाई, 1925 को बेंगलुरु में हुआ था। हालांकि, रंगमंच के इस दिग्गज खिलाड़ी ने महज 39 की उम्र में दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी सदाबहार फिल्में उन्हें आज भी एक किंवदंती, प्रेरणा का स्रोत बनाती हैं।
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एक रिपोर्ट के मुताबिक, बेंगलुरु इस सप्ताह के अंत में दो दिवसीय फिल्म महोत्सव और गुरु दत्त के हिट गानों की संगीतमय शाम की मेजबानी करेगा। डिस्ट्रिक्ट 3190 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रोटेरियन राजेंद्र राय ने कहा, 'यह कार्यक्रम रोटरी नीडी हार्ट फाउंडेशन (आरएनएचएफ) द्वारा आयोजित किया जा रहा है।' संगीत संध्या 4 मई को शाम 6 बजे भारतीय विद्या भवन में होगी।
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राय के अनुसार, 'यह फाउंडेशन रोटेरियन ओपी खन्ना के आग्रह पर स्थापित हुआ, जिन्होंने खुद दिल की सर्जरी करवाई और महसूस किया कि वंचित लोग इसका खर्च नहीं उठा सकते। टिकटों की बिक्री से प्राप्त आय आरएनएचएफ के जीवनरक्षक हृदय सर्जरी प्रदान करने के प्रयासों में खर्च की जाएगी। फाउंडेशन की स्थापना 2001 में खन्ना के पर्याप्त दान से गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) परिवारों के रोगियों के लिए हृदय शल्य चिकित्सा की सुविधा के लिए की गई थी।' जानकारी हो कि इस साल गुरु दत्त की 100वीं जयंती है।
गुरु दत्त ने मुख्यधारा की हिंदी फिल्म निर्माण के व्याकरण में कुछ प्रमुख तकनीकी क्रांतियां भी लाईं, जैसे, फिल्म के गीतों को कहानी में एकीकृत करना और गीत के माध्यम से ही कहानी को आगे बढ़ाना। उन्होंने कविता और रोमांस रचने के लिए प्रकाश और छाया के प्रभाव का उपयोग किया। उनकी विरासत असंदिग्ध है और उस समय के कई प्रमुख निर्देशकों ने इसे स्वीकार किया है।
भारतीय सिनेमा में मिसाल बन चुके गुरुदत्त एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने अपने जीवन को सिनेमा का पर्दा समझा और उसमें ही अपना सब कुछ झोंक दिया। उनके अंदर एक अजीब सी बेचैनी थी। पर्दे पर कुछ अद्भुत और अद्वितीय रचने की बेचैनी। गुरुदत्त अपने आप में सिनेमा का महाविद्यालय थे। उनकी तीन क्लासिक फिल्में 'साहिब बीवी और गुलाम', 'प्यासा' और 'कागज के फूल' को टेक्स्ट बुक का दर्जा प्राप्त है।
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