हिंदी सिनेमा में तमाम ऐसे निर्देशक हुए हैं जिनकी दिलो जान से बनाई चंद फिल्मों की गिनती क्लासिक फिल्मों में होती हैं, लेकिन जो रिलीज के वक्त उस दौर के दर्शकों ने पूरी तरह से नकार दी थीं। राज कपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ से लेकर आर माधवन की फिल्म ‘रहना है तेरे दिल में’ तक के बाद भी और उससे पहले भी ऐसी फिल्मों की ठीक ठाक लिस्ट है। इस लिस्ट से जिस खास फिल्म का जिक्र आज के बाइस्कोप में है, उसका नाम है ‘जाने भी दो यारो’। अपनी रिलीज के वक्त कहीं हाशिये में सिमट गई ये फिल्म भी सिनेमाघरों से उतरने के बाद ही हिंदी सिनेमा की क्लासिक फिल्म बनी। फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ के निर्देशक कुंदन शाह तब जिंदा थे, जब इस फिल्म के प्रिंट को ठीक ठाक करके फिर से इसे सिनेमाघरों में रिलीज किया गया। फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ को दोबारा सिनमाघरों में रिलीज हुए भी आठ साल होने को आए। कुंदन शाह से तब खूब बातें हुई थीं। उन्होंने खूब किस्से फिल्म की मेकिंग के सुनाए थे। वह ये भी कहते थे कि उनका बड़ा मन है इस फिल्म का सीक्वेल बनाने का। लेकिन, ‘एक था टाइगर’, ‘दबंग 2’ और ‘राउडी राठौर’ के एक्शन पर झूम रहे दर्शकों को साल 2012 में भी ‘जाने भी दो यारो’ का सीक्वेल भाएगा, किसी ने यकीन नहीं किया। कुंदन शाह सीक्वेल की वह स्क्रिप्ट अपने सिरहाने रखकर महीनों सोते रहे और एक दिन अपने इस सपने को लिए हुए ही ऊपर चले गए।
Bioscope S2: इस मामूली बजट में बनी ‘जाने भी दो यारो’, नसीरुद्दीन शाह की फीस जानकर हैरान रह जाएंगे
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एनएफडीसी के पैसे से बनी फिल्म
मूल रूप से 12 अगस्त 1983 को रिलीज हुई फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ साल 2012 में फिर से रिलीज होने के वक्त कुंदन शाह के चेहरे पर बच्चों जैसी खुशी दिखाई दे रही थी। ये खुशी इस बात की थी कि मीडिया की जो चमक दमक कुंदन को साल 1983 में नसीब नहीं हुई थी, वह सब उनके सामने था। फिल्म की पहली रिलीज तो कब हुई और कब पिक्चर सिनेमाघरों से उतर गई, आधे हिंदुस्तान को तो पता भी नहीं चला और ये इसके बावजूद कि फिल्म को बनाया था राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम यानी एनफडीसी ने। सरकारी दफ्तर में काम सरकारी तरीके से ही होता हैं। हालांकि, कुंदन शाह ने इस बात पर कभी गिला नहीं किया कि उनकी फिल्म को अच्छे प्रचार प्रसार के साथ रिलीज नहीं किया गया। कुंदन का मानना था कि फिल्म अपनी पहली रिलीज में भी अपने बजट के हिसाब से अच्छा कारोबार करने में सफल रही थी। फिल्म में कोई गाना नहीं था, कोई आइटम नंबर नहीं था, हीरोइन जो थी फिल्म की वह वैम्प टाइप की थी और इसके बावजूद लोगों को ये कहानी अपनी जैसी लगी।
ईमानदार फोटोग्राफरों की कहानी
‘जाने भी दो यारो’ की कहानी थी भी उन लाखों, करोड़ों जैसी जो कुछ बन पाने की जुगत में दिन रात लगे रहते हैं। ये कहानी है एक अखबार के लिए काम करने वाले दो भोले भाले लेकिन ईमानदार फोटोग्राफरों की जिनके कैमरे में एक कत्ल कैद हो जाता है। असली कातिल को पकड़ने के चक्कर में दोनों खुद बिल्डरों के काले धंधे के दलदल में आ गिरते हैं और जितना इससे निकलने की कोशिश करते हैं, उतना ही और अंदर धसते जाते हैं। कुंदन शाह ने इन दोनो को आम आदमी का नुमाइंदा बनाकर सिस्टम मे करप्शन के कपड़े बीच चौराहे उतारने की तब कोशिश की, जब सिनेमा के दर्शक श्रीदेवी को कम कपड़ों में देखकर आहें भरने की तैयारी करने में लगे रहते थे। फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ की चुस्त कथा पटकथा कुंदन शाह ने सुधीर मिश्रा के साथ मिलकर लिखी और इसके जबर्दस्त संवाद लिखने का काम किया बाद में कैलेंडर बनकर मशहूर हुए अभिनेता निर्देशक सतीश कौशिक ने अपने जोड़ीदार रंजीत कपूर के साथ। रंजीत और सतीश अपने कमरे पर फिल्मों के किरदार बन जाते और खूब एक दूसरे से मजे लेते। और, बाद में इसी सब को कागज पर उतारकर अगले दिन कुंदन शाह को दे आते। कुंदन शाह को ये संवाद पढ़कर मजा भी खूब आता लेकिन वह चाहकर भी इन संवादों पर ठट्ठा मारकर हंस नहीं पाते थे।
कुंदन शाह ने गिनाई थीं मुश्किलें
खुद कुंदन शाह ने तब बातचीत में कहा था, ‘साल 1983 में ‘जाने भी दो यारो’ जैसी फिल्म बनाना और रिलीज करना आसान नहीं था। फिल्म के निर्देशन में मुझे बहुत दिक्कतें आईं लेकिन अब देखो तो लगता है कि किसी फिल्म का निर्देशक बन पाना ही अपने आप में किसी दिक्कत से कम नहीं है।’ ध्यान रखने वाली बात यहां ये है कि ये बात साल 2012 में वो शख्स कह रहा है जो हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में से एक शाहरुख खान के साथ तब तक ‘कभी हां कभी ना’ बना चुका है और नसीरुद्दीन शाह को लेकर ‘खामोश’ बना चुका है। शादी के पहले ही गर्भवती हो जाने के मुद्दे पर फिल्म ‘क्या कहना’ कुंदन शाह साल 2000 में बना चुके थे। ऐसी फिल्मों का निर्देशक ऐसा क्यों कहता है कि अब निर्देशक बन पाना ही मुश्किल है, पूछने पर कुंदन ने कहा, ‘असली निर्देशक कभी सितारों की चापलूसी नहीं करेगा। चापलूस निर्देशक कभी अच्छा सिनेमा नहीं बना सकता और चापलूसी पसंद करने वाला सितारा कभी जमाने का नायक नहीं बन सकता।’
जब चोरी हो गया नसीर का कैमरा
‘जाने भी दो यारो’ फिल्म में जिस एक शख्स को सबसे ज्यादा पैसा मिला था वह थे नसीरूद्दीन शाह और साल 1983 में उनकी इस फिल्म के लिए फीस थी कुल 15 हजार रुपये। और, वह भी इस शर्त के साथ फिल्म की शूटिंग के लिए कपड़े वह घर से पहनकर आएंगे और अपना निकोन कैमरा भी साथ लेकर आएंगे, जिसे गले में लटकाकर उन्हें फिल्म में फोटोग्राफर दिखना था। नसीन ने तब तो उफ नहीं की लेकिन जब शूटिंग के आखिरी दिनों में उनका कैमरा चोरी हो गया तो बेचारे बहुत दुखी हुए। सबसे अपना दर्द कहते लेकिन सेट पर कोई भी ऐसा दिलदार नहीं था जो कहता, कोई बात नहीं चलो मैं दूसरा कैमरा दिला देता हूं। नसीर को अपना वह कैमरा अब भी याद दिलाओ तो चेहरे पर दर्द बनकर उभर आता है।

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