साल 1939 में लिखे गए उपन्यास "ब्लैक नार्सिसस" पर कुछ साल बाद फिल्म बनी थी। अब वही कहानी टीवी पर दिखाई जा रही है।" रूमर गॉडेन के उपन्यास "ब्लैक नार्सिसस" की शुरुआत में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे लगे कि इस पर बनी फिल्म को सेंसर किया गया होगा, पाबंदी लगाई गई होगी और दुनिया के महान निर्देशकों में से एक मार्टिन स्कॉर्सेस ने उसे "सही मायनों में कामुक फिल्म" माना होगा। उस फिल्म को अंग्रेज निर्देशक माइकल पॉवेल और हंगरी में पैदा हुए लेखक-निर्माता एमरिक प्रेसबर्गर ने बनाया था।
वो फिल्म जिसे अश्लीलता के नाम पर कर दिया गया था सेंसर, लेकिन अब दी जाती है मिसाल
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यह गॉडेन की तीसरी किताब और पहली बेस्टसेलर थी। आलोचकों ने इसे सुंदर, सूक्ष्म और ताजगी भरा बताया था। अब तीन भाग में बने टीवी संस्करण की लेखिका अमांडा कोए का कहना है कि वह इसे "दि शाइनिंग विद नन्स" समझती हैं। 90 साल की उम्र में गॉडेन का निधन 1998 में हुआ था। वह इंग्लैंड में जन्मी थीं लेकिन बचपन का बड़ा हिस्सा उन्होंने भारत में बिताया था। उनके पिता यहां एक स्टीमर कंपनी का प्रबंध करते थे। गॉडेन ने 60 से ज्यादा किताबें लिखीं जिनमें कई पर फिल्में बनीं। "ब्लैक नार्सिसस" गॉडेन की सबसे मशहूर किताब है। इसकी एक वजह इस पर 1947 में बनी फिल्म की लोकप्रियता है।
पहाड़ी महल में कैथोलिक ननें
यह कुछ एंग्लो-कैथोलिक ननों की कहानी है जिनको दूरदराज के हिमालय पर 8,000 फीट (2,400 मीटर) की ऊंचाई पर बने महल में भेजा गया था। उनको देसी लोगों के लिए एक स्कूल और दवाखाना खोलने के लिए कहा गया था भले ही वे लोग चाहें या न चाहें। युवा मगर कम तजुर्बेकार सिस्टर क्लोडग को इस मिशन की प्रमुख बनाया गया था। ननों में सिस्टर रूथ को संभालना सबसे मुश्किल था।
यह महल एक गहरी खाई के किनारे पर बना था। वहां तेज हवाएं चलती थीं। स्थानीय लोग इस महल को महिलाओं के घर के रूप में जानते थे, क्योंकि यहां पहले उस जगह के राजा ने अपना हरम रखा था। वहां कई आत्माएं भटकती थी। इस महल में रहते-रहते वे सांसारिक इच्छाओं से घिर जाती हैं। एक नन सब्जियों की जगह फूल के पौधे लगाती है और उसे बगीचे से प्यार हो जाता है। बच्चों को संभालने वाली एक नन अपने खुद के बच्चे के लिए तरसती है। सिस्टर क्लोडग युवा प्रेम संबंध की यादों से परेशान रहती है और सिस्टर रूथ गांव में रहने वाले एक लंपट अंग्रेज मिस्टर डीन के लिए वासना से भर जाती है।
गांव की एक सुंदर लड़की कांची जब ननों द्वारा शिक्षित युवाओं का दिमाग फेर देती है तो उनकी दमित लालसा और जोर मारती है। आखिरकार यह दबी हुई लालसा सैलाब बन जाती है और बांध तोड़ देती है।
कहानी में मसाला
उपन्यास में यौन प्रसंगों को विस्तार नहीं दिया गया, लेकिन जब पॉवेल ने इसे पढ़ा तो उन्हें लगा कि फिल्मी पर्दे पर यह कहानी बेहद कामुक लगेगी। पॉवेल के क्रिएटिव पार्टनर प्रेसबर्गर, गॉडेन को लंच पर ले गए और फिल्म बनाने की अपनी योजना के बारे में बताया। गॉडेन की जीवनी के मुताबिक उनको लगा कि "अगर वे सेंसर की मंजूरी हासिल कर लेते हैं तो ब्लैक नार्सिसस की सही कहानी पर्दे पर आएगी।" 1946 में जब पॉवेल और प्रेसबर्गर ने फिल्म पर काम शुरू किया तब तक उनकी टीम पहले से ही कामयाब थी। वे "दि लाइफ एंड डेथ ऑफ कर्नल ब्लिंप" (1943) और "अ कैंटरबरी टेल" (1944) बना चुके थे।
"ए मैटर ऑफ दि लाइफ एंड डेथ" की रिलीज वाले साल में ही उन्हें पहली बार रॉयल फिल्म परफॉर्मेंस के लिए चुना गया। उन्होंने तुरंत ही फैसला किया कि "ब्लैक नार्सिसस" की शूटिंग भारत में करना बहुत महंगा और मुश्किल होगा।
ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सारा स्ट्रीट का कहना है कि पॉवेल ने इसे सकारात्मक तरीके से लिया। उन्हें लगा कि स्टूडियो के नियंत्रित वातावरण में वह शानदार फिल्म बना पाएंगे। हिमालय दिखाने के लिए उन्होंने पश्चिमी ससेक्स में होरशाम के लियोनार्डली में चीड़ के जंगल को चुना। क्लोडग की भूमिका के लिए डेबोरो केर और रूथ के लिए कैथरीन बायरन को चुना गया। पॉवेल के दोनों अभिनेत्रियों से संबंध थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा में दावा किया है कि एक बार बायरन ने उन पर बंदूक तान दी थी- "नग्न महिला और भरी हुई बंदूक प्रेरक चीजें हैं।" बायरन ने इस कहानी को खारिज कर दिया था। उनके मुताबिक "जब मुझे ब्लैक नार्सिसस ऑफर किया गया तब माइकल पॉवेल ने मुझे एक तार भेजा था जिसमें लिखा था कि हम आपको सिस्टर रूथ का रोल दे रहे हैं, मुश्किल यह है कि आपको ऐसी भूमिका आगे कभी नहीं मिलेगी।वह कमोबेश सही थे।" फिल्म रिलीज के कई साल बाद लोग आज भी बायरन को "सनकी नन" के रूप में याद करते हैं। स्ट्रीट ने पता लगाया कि 44 दिन के काम के लिए बायरन को सिर्फ 900 पाउंड का भुगतान किया गया था। 55 दिनों की शूटिंग के लिए केर को 16 हजार पाउंड मिले थे।
क्लासिक फिल्म
ब्रिटेन के दर्शकों ने फिल्म को बहुत पसंद किया। आलोचक इसे लेकर उधेड़बुन में थे (हालांकि सिनेमेटोग्राफर जैक कार्डिफ को ऑस्कर मिला था) और रूमर गॉडेन को इससे नफरत थी। अमरीकी कैथोलिक लीजन ऑफ डीसेंसी की नाराजगी दूर करने के लिए सिस्टर क्लॉडग के नन बनने से पहले की जिंदगी के फ्लैशबैक का हिस्सा हटा दिया गया। कुछ और दृश्य भी काटे गए। फिल्म को शुरुआत में आयरलैंड में प्रतिबंधित किया गया क्योंकि सेंसर बोर्ड को लगता था कि यौन माहौल से भरी फिल्म से कॉन्वेंट जीवन का मजाक बनेगा।
1970 के दशक में इसी दोबारा समीक्षा हुई और अब इसे क्लासिक माना जाता है। स्कॉर्सेस और फ्रांसिस फोर्ड कोपोला इसके कद्रदानों में शामिल हैं। स्कॉर्सेस को बचपन से ही पॉवेल और प्रेसबर्गर की फिल्मों से प्यार है। उनका कहना है कि जब भी वे फिल्म की शुरुआत में दि आर्चर्स (पॉवेल और प्रेसबर्गर की प्रोडक्शन कंपनी) का लोगो देखते थे उनको लगता था कि अब वे कुछ बहुत ही खास चीज देखने जा रहे हैं। स्कॉर्सेस ने एक डीवीडी रिलीज की ऑडियो कमेंट्री में "ब्लैक नार्सिसस" को "पहली सच्ची कामुक फिल्मों में से एक" करार दिया।
जिसे भी इसमें शक हो उसे फिल्म के अंत का वह सीन देखना चाहिए जिसमें सिस्टर क्लोडग उन्माद से भरी सिस्टर रूथ के कमरे में जाती है जहां वह अपनी आदत के मुताबिक सुर्ख लाल रंग की लिबास में है।

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