एक अलग ही दुनिया है, जहां गोली है, खून है, पैसा है, रूतबा है और रिश्ता भी है, लेकिन कानून के खिलाफ है। इस दुनिया की अपनी सत्ता रही है और हर तरह की बेईमानी का काम बेहद ईमानदारी से करने की कहानियां सामने आती रही हैं। उन कहानियों को जब सिनेमा ने रंग दिया तो खूब तालियां बजीं और खूब पैसे बरसे। सफलता के नए फार्मूले सामने आए। यह फार्मूला आज भी जिंदा है और अंडरवर्ल्ड के असली किरदारों की कहानियां नए सिरे से ढूंढी जा रही हैं। खबर है कि फिल्म 'रईस' के बाद और लगभग दो साल के सन्नाटे के बाद चार ऐसी फिल्में आ रही हैं, जो किसी न किसी देसी डॉन की जिंदगी पर आधारित है। वैसे बॉलीवुड में अंडरवर्ल्ड के किरदार हमेशा से सफलता की गारंटी देते रहे हैं।
बॉलीवुड में हमेशा हिट की गारंटी रहे हैं अंडरवर्ल्ड के किरदार, सबूत हैं ये 10 फिल्में
चार दशक से ज्यादा समय पहले, पटकथा लेखक सलीम जावेद की जोड़ी ने ‘दीवार’ जैसी फिल्मों के जरिए हिंदी फिल्मों में डॉन या गिरोह के सरगना के जीवन को जिस तरह महिमा मंडित किया है, उससे फिल्म निर्माता बॉक्स ऑफिस पर इस थीम के सफल होने के प्रति आश्वस्त हो गए और ऐसी फिल्में बहुतायत से बनने लगीं। या यूं भी कहा जा सकता है कि एक तरह से गैंगस्टर फिल्मों बॉक्स ऑफिस पर सफलता की गारंटी हो गईं।
कला तो कला है। वह हमेशा जिंदगी की नकल करती है। अंडरवर्ल्ड जब समाज का एक अभिन्न अंग हो गया, तो उसका प्रतिबिंब फिल्मों में भी झलकने लगा। जिस फिल्म ने अमिताभ बच्चन को महानायक बनाया, उसी का उदाहरण लें। ‘दीवार’ फिल्म में अमिताभ बच्चन का किरदार सत्तर के दशक में पनपे माफिया डॉन हाजी मिर्जा मस्तान से प्रेरित है। वह शुरू में मुम्बई की गोदी पर कुली का काम करता था और वहां से उठकर सोने चांदी की तस्करी करने लगा। यह और बात है कि मस्तान का अंत फिल्म के नायक जैसा नहीं हुआ। फिल्मी पंडितों का कहना है कि फिल्मों में अंडरवर्ल्ड के चरित्रों का प्रवेश इसी फिल्म से हुआ। इसके बाद तो यह सिलसिला चल निकला।
‘डैडी’ और ‘हसीना पारकर’ इस शृंखला की नवीनतम फिल्में थीं। दोनों 2017 में रिलीज हुईं। ‘डैडी’ मुंबई के डॉन और दगड़ी चाल के बादशाह अरुण गवली पर बनी है। एक बार फिर दर्शकों ने एक ‘गैंगस्टर’ को देखा, जो बाद में राजनीति में आया और मुंबई के चिंचपोकली इलाके से विधायक भी चुना गया। हालांकि, यह एक अलग मुद्दा है वास्तविक जीवन में अरुण गवली कहीं से कहीं तक भी गैंगस्टर नहीं लगता। अर्जुन रामपाल ने उसका किरदार बखूबी निभाया है। केंद्रीय मुंबई के ऊबड़-खाबड़ रास्तों और छोटी-छोटी गलियों से शुरू होती है अरूण गवली की दास्तान, जो अपनी तकदीर खुद लिखता हुआ भारत का सर्वाधिक खतरनाक गैंगस्टर बन जाता है। कामगार वर्ग के अपने आस-पास के लिए वह एक आधुनिक रॉबिनहुड है। उसका और एक पुलिस इंस्पेक्टर का संघर्ष उसे चार दशकों में कहां से कहां ले जाता है, यह इस फिल्म में बखूबी दर्शाया गया है।
दूसरी ओर ‘हसीना पारकर’ दाऊद इब्राहीम की बड़ी बहन हसीना पारकर के जीवन पर आधारित है, जो दाऊद की गैर मौजूदगी में लोगों के संपत्ति से संबंधित झगड़े निपटाया करती है। 2007 में हसीना पारकर के खिलाफ एक गिरफ्तारी वारंट जारी होता है, जिसके बाद वह गायब हो जाती है। सुनवाई के दिन वह कोर्ट में आत्मसमर्पण कर देती है। हसीना पर एक बिल्डर से पैसा ऐंठने और दुबई में जा बसे अपने भाई के अवैध व्यापार की देखभाल करने का आरोप है, जिससे वह इनकार करती है। चूंकि कोई गवाह सामने नहीं आता इसलिए जज उसे जमानत दे देता है।