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Chef Vikas Khanna: रोटी मैं सबसे तेज बेलता था, 11 साल की उम्र में इस शहर में लगा लिया था छोले भटूरे का ठेला

Tue, 31 Oct 2023 07:25 AM IST
पलक शुक्ला अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई Published by: पलक शुक्ला Updated Tue, 31 Oct 2023 07:25 AM IST
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Chef Vikas Khanna Know about Master Chef Judge he started cooking Chole Bhature at the age of 11 his journey
विकास खन्ना - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

मास्टरशेफ इंडिया सीजन आठ का प्रसारण इन दिनों ओटीटी प्लेटफार्म सोनी लिव पर हो रहा है। इस शो के जज शेफ विकास खन्ना ने एक खास बातचीत में बदलते खानपान, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की श्रीअन्न (मोटा अनाज) योजना और किचन में पुरुषों की बढ़ती भागीदारी को लेकर खुलकर अपने विचार साझा किए। विकास खन्ना का मानना है कि दो जून की रोटी कमाने में अब भले ही संघर्ष नहीं रहा, लेकिन अब शांति से परिवार के साथ बैठकर खाना खाना मुश्किल हो गया है। 

Chef Vikas Khanna Know about Master Chef Judge he started cooking Chole Bhature at the age of 11 his journey
विकास खन्ना - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

बड़ी पुरानी कहावत है कि दो जून की रोटी आदमी बड़ी मुश्किल से कमाता हैइस कहावत के मायने आज कितना बदल गए है?
मायने तो वहीं हैं, लेकिन आज डिमांड ज्यादा बढ़ गई है। पहले बड़ी साधारण जिंदगी थी। भले ही पहले आर्थिक रूप से बहुत संघर्ष था, लेकिन एक साथ परिवार के साथ बैठकर खाना खाने में बहुत सुकून था। आज की तारीख में तारीख में कमाना  मुश्किल नहीं है, बल्कि खाना खाते वक्त अब सुकून नहीं रहा। पहले एक घर में एक टीवी होता था तो सब साथ में बैठकर टीवी देखते थे। मैं अमृतसर का रहने वाला हूं, मुझे याद है, शाम को साढ़े आठ बजे एक पाकिस्तानी सीरियल आता था उसे देखने के बाद नौ बजे परिवार के सभी लोग एक साथ डायनिंग टेबल पर बैठकर खाना खाते थे।  लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। एक साथ घर में रहने के बावजूद सब अलग अलग खाना खा रहे हैं।

Chef Vikas Khanna Know about Master Chef Judge he started cooking Chole Bhature at the age of 11 his journey
विकास खन्ना - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

पहले की अपेक्षा में अब खान पान में क्या बदलाव आया है?
बहुत बदलाव आया है। पहले लोग घर पर ही खाना खाना ज्यादा पसंद करते थे, अब लोग रेस्टोरेंट में ज्यादा खा रहे हैं। जब भारत से अमेरिका 2000 में गया तब से लेकर भारत में कितने तरह के अलग अलग रेस्टोरेंट खुल गए हैं। हमारे जमाने में रेस्टोरेंट में जाकर खाना खाना बहुत बड़ी बात थी। लेकिन अब तो लोग रेस्टोरेंट में ही घुसे रहते हैं। अब बहुत सारे रेस्टोरेंट खुल गए हैं, उसमें हर तरह के व्यंजन परोसे जा रहे हैं  और सब में खाने वालों की भीड़ होती है। कहीं न कहीं इससे हमारे स्वास्थ्य पर भी अब फर्क पड़ने लगा है।

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विकास खन्ना - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

प्रधानमंत्री की मोटा अनाज की जो योजना चल रही हैउससे कितने तरह के पकवान बनाए जा सकते हैं?
बहुत सारे पकवान बनाए जा सकते हैं। मैं तो लोगों को सलाह देता हूं कि मोटे अनाजों को अपने खाद्य बास्केट में शामिल करें। यह संतुलित आहार के साथ-साथ एक सुरक्षित वातावरण में भी योगदान देता है। लेकिन कुछ लोगों को लगता है कि यह विदेशी  अनाज है। और, इसे नाइजर, सूडान और नाइजीरिया में पैदा किया जाता है। यह अनाज तो हमारी देश की संस्कृति और सभ्यता का वर्षों से हिस्सा है। व्रत में हम जो अनाज खाते है, उससे हमें भरपूर ऊर्जा मिलती है। यह सोच हमारे पूर्वजों की रही है क्योंकि जब आप व्रत कर रहे हैं तो भी आपको भरपूर ऊर्जा चाहिए।

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विकास खन्ना - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

पुरुषों की किचन में भागीदारी कितनी बढी है?
किचन में पुरुषों की भागीदारी तो रही ही है लेकिन कोविड के बाद से तो 40 प्रतिशत पुरुषों की भागीदारी किचन में बढ़ी है और अपनी रुचि का खाना बना रहे हैं। यूट्यूब से खाने की रेसिपी सीख कर अब तो हर किसी के लिए खाना बनाना बहुत आसान हो गया है। अब लोगो की सोच में यह बदलाव आया है कि किचन में औरतों का हाथ बटाना चाहिए।

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