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आम जिंदगी में कानूनी पचडों में फंसे लोगों के लिए कोर्ट के अंदर चल रही कार्यवाही, वकीलों के दांव-पेंच और जज के बजते हथौडे किसी बुरे सपने से कम नहीं होते। लेकिन जब यही अदालत फिल्मी पर्दे पर अपने रोमांच के साथ उतरती है, तो दर्शक तालियों की बौछार कर देते हैं।
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- फोटो : bbc
1960 में बनी बीआर चोपडा की फिल्म 'कानून' से लेकर हालिया रिलीज 'रुस्तम' तक की कामयाबी बताती है कि कोर्ट रूम ड्रामा में दर्शकों की दिलचस्पी बनी हुई है। बीआर चोपडा की ट्रेंडसेटर फिल्म 'कानून' के बाद फिल्मों में अदालत के दृश्य एक तरह से जरूरी मान लिए गए।
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1983 में आई अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी और रजनीकांत स्टारर 'अंधा कानून' से अदालत एक बार फिर फिल्मों में छा गई। इस फिल्म की कामयाबी के बाद कानून, फिल्मी सीन से आगे बढकर फिल्मों के नाम में भी शामिल हो गया और ऐसे नाम वाली फिल्मों की बाढ आ गई।
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1985 में सुभाष घई के निर्देशन में बनी अनिल कपूर, मीनाक्षी शेषाद्री स्टारर फिल्म 'मेरी जंग' भी अदालत के सीन से दर्शकों को अपनी ओर खीचने में कामयाब रही।
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लेकिन इसी दौर की 'आज का अंधा कानून', 'फर्ज और कानून', 'कानून अपना-अपना', 'कानून क्या करेगा', 'कायदा-कानून' और 'कुदरत का कानून' जैसी करीब दर्जन भर फिल्में बॉक्स ऑफिस पर पिट गईं और इस सब्जेक्ट से निर्माताओं का भरोसा उठने लगा।
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