{"_id":"5c42c828bdec222720372be4","slug":"director-abhishek-chaubey-special-interview-with-amar-ujala","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"अभिषेक चौबे बोले- मुनाफे के लिए फिल्मों में गालियां नहीं डालता, कई बार अपनी फिल्म देखकर आती है शर्म","category":{"title":"Bollywood","title_hn":"बॉलीवुड","slug":"bollywood"}}
अभिषेक चौबे बोले- मुनाफे के लिए फिल्मों में गालियां नहीं डालता, कई बार अपनी फिल्म देखकर आती है शर्म
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: अपूर्वा राय
Updated Sat, 19 Jan 2019 12:28 PM IST
विज्ञापन
abhishek chaubey
विशाल भारद्वाज के शागिर्द रहे निर्देशक अभिषेक चौबे (Abhishek Chaubey) की हर फिल्म सामाजिक मुद्दों पर गहरी चोट करती है। फिल्म ओंकारा से बतौर सहायक अपना करियर शुरू करने वाले अभिषेक को हिंदी सिनेमा के संवादों में बोलियां और गालियां लाने के लिए भी जाना जाता है। अमर उजाला से इस खास बातचीत में अभिषेक बता रहे हैं अपनी नई फिल्म सोनचिड़िया की उड़ान और इसके किरदारों के मचान के बारे में।
Trending Videos
abhishek chaubey
अभिषेक चौबे को अपराध में जज्बात महकाने का मास्टर माना जाता है, फिल्म सोनचिड़िया इस बारे में क्या नया कहती है?
-मैंने एक एक्शन फिल्म बनाई है क्योंकि आज की पीढ़ी को रोमांच पसंद है। इस फिल्म की अंतर्धारा है जाति व्यवस्था को लेकर बीते 70 साल से चला आ रहा सामाजिक संघर्ष। हम सब पढ़े लिखे लोग चाहते हैं कि जातिप्रथा बंद होनी चाहिए। जाति के आधार पर भेदभाव बंद होना चाहिए। लेकिन, जिस दौर की ये फिल्म है उस दौर के लोगों का सोचना अलग था। ये बागी जाति व्यवस्था में यकीन रखते हैं, उस जाति व्यवस्था में जो हजारों साल से हमारे देश में चली रही है। यही इसके किरदारों का भीतरी संघर्ष है और ये संघर्ष तब और मार्मिक हो जाता है जब इन्हें समझ आता है कि जो कुछ ये अब तक करते आए, क्या वह सही था?
-मैंने एक एक्शन फिल्म बनाई है क्योंकि आज की पीढ़ी को रोमांच पसंद है। इस फिल्म की अंतर्धारा है जाति व्यवस्था को लेकर बीते 70 साल से चला आ रहा सामाजिक संघर्ष। हम सब पढ़े लिखे लोग चाहते हैं कि जातिप्रथा बंद होनी चाहिए। जाति के आधार पर भेदभाव बंद होना चाहिए। लेकिन, जिस दौर की ये फिल्म है उस दौर के लोगों का सोचना अलग था। ये बागी जाति व्यवस्था में यकीन रखते हैं, उस जाति व्यवस्था में जो हजारों साल से हमारे देश में चली रही है। यही इसके किरदारों का भीतरी संघर्ष है और ये संघर्ष तब और मार्मिक हो जाता है जब इन्हें समझ आता है कि जो कुछ ये अब तक करते आए, क्या वह सही था?
विज्ञापन
विज्ञापन
Abhishek Chaubey
- फोटो : social media
सोनचिड़िया का टीजर देख लगा कि फिल्म के हीरो तो मनोज बाजपेयी हैं, लेकिन ट्रेलर बताता है कि कहानी जितनी मानसिंह की है, उतनी ही लखना और वकील सिंह की भी है और ये सब चंबल के ठाकुर हैं तो फिर संघर्ष क्या है?
- फिल्म के हीरो को पारंपरिक तौर पर परिभाषित करेंगे तो हीरो तो सुशांत सिंह ही हैं। मनोज बाजपेयी का किरदार मान सिंह फिल्म की आत्मा है। सुशांत का किरदार लखना और रणवीर शौरी का किरदार वकील दोनों का संघर्ष एक दूसरे पर अविश्वास का भी है। सुशांत को जब इस किरदार के लिए मैंने लिया तो वह थोड़ा डरे हुए थे कि उनसे ये किरदार होगा भी कि नहीं। एक तो उनके सामने डकैत बनने की चुनौती थी, दूसरी चुनौती थी वहां की बोली की। हम लोगों ने मिलकर इस पर बहुत ज्यादा काम किया है। रणवीर सिंह का किरदार अगर आपको चौंका रहा है तो यही इस कास्टिंग की जीत है। रणवीर शौरी मुंबई या दिल्ली के मिडिल क्लास फैमिली के शहरी किरदार ही करते आए हैं। उनके भीतर के अभिनेता को मैंने इस फिल्म में पहली बार दूसरे तरीके से पेश किया है। रणवीर की अदाकारी की कूवत को अब तक ज्यादा पहचाना ही नहीं गया। मेरे लिए यह बोली पकड़ना मुश्किल इसलिए नहीं रहा क्योंकि मैं उत्तर प्रदेश में पैदा हुआ, झारखंड में पला बढ़ा और हैदराबाद तक पढ़ाई करने गया तो मेरे लिए हिंदी का अलग अलग लहजा समझना आसान है।
- फिल्म के हीरो को पारंपरिक तौर पर परिभाषित करेंगे तो हीरो तो सुशांत सिंह ही हैं। मनोज बाजपेयी का किरदार मान सिंह फिल्म की आत्मा है। सुशांत का किरदार लखना और रणवीर शौरी का किरदार वकील दोनों का संघर्ष एक दूसरे पर अविश्वास का भी है। सुशांत को जब इस किरदार के लिए मैंने लिया तो वह थोड़ा डरे हुए थे कि उनसे ये किरदार होगा भी कि नहीं। एक तो उनके सामने डकैत बनने की चुनौती थी, दूसरी चुनौती थी वहां की बोली की। हम लोगों ने मिलकर इस पर बहुत ज्यादा काम किया है। रणवीर सिंह का किरदार अगर आपको चौंका रहा है तो यही इस कास्टिंग की जीत है। रणवीर शौरी मुंबई या दिल्ली के मिडिल क्लास फैमिली के शहरी किरदार ही करते आए हैं। उनके भीतर के अभिनेता को मैंने इस फिल्म में पहली बार दूसरे तरीके से पेश किया है। रणवीर की अदाकारी की कूवत को अब तक ज्यादा पहचाना ही नहीं गया। मेरे लिए यह बोली पकड़ना मुश्किल इसलिए नहीं रहा क्योंकि मैं उत्तर प्रदेश में पैदा हुआ, झारखंड में पला बढ़ा और हैदराबाद तक पढ़ाई करने गया तो मेरे लिए हिंदी का अलग अलग लहजा समझना आसान है।
abhishek chaubey
और, मुंबई में रहते हुए कितना आसान है ये मान लेना कि फैजाबाद का नाम अब अयोध्या हो गया है?
- क्या कह सकता हूं, किसी जगह का नाम बदलने से पहले वहां रहने वालों की राय तो ली नहीं जाती। फैजाबाद क्या है, इसकी ताकत क्या है, इसकी विरासत क्या है, कितने लोगों का पता है आज? बेगम अख्तर वहां की थी, कबाब की शुरूआत फैजाबाद से होती है। जब लखनऊ नहीं था तब अवध की राजधानी फैजाबाद ही थी। तो अगर आप किसी स्थान की संस्कृति मिटाना चाहते हैं तो वह ऐसे तो नहीं मिटने वाली। नाम बदल देने से कहीं की संस्कृति या विरासत नहीं बदल जाती।
- क्या कह सकता हूं, किसी जगह का नाम बदलने से पहले वहां रहने वालों की राय तो ली नहीं जाती। फैजाबाद क्या है, इसकी ताकत क्या है, इसकी विरासत क्या है, कितने लोगों का पता है आज? बेगम अख्तर वहां की थी, कबाब की शुरूआत फैजाबाद से होती है। जब लखनऊ नहीं था तब अवध की राजधानी फैजाबाद ही थी। तो अगर आप किसी स्थान की संस्कृति मिटाना चाहते हैं तो वह ऐसे तो नहीं मिटने वाली। नाम बदल देने से कहीं की संस्कृति या विरासत नहीं बदल जाती।
विज्ञापन
abhishek chaubey
आपकी अपनी विरासत जो है फिल्मों की, उसे कभी बदलने का ख्याल आया? पुनरावलोकन करते हैं अपनी पिछली फिल्मों का?
- मेरे लिए ये बहुत दर्दनाक होता है। खाना खाते वक्त टेलीविजन देखने की मेरी आदत है। तो जब भी अपनी बनाई फिल्म दिख जाती है तो देखता हूं, पूरी फिल्म देखना मेरे लिए मुश्किल है। लेकिन, दोबारा अपनी फिल्में देखता हूं तो खामियां खामियां ही नजर आती हैं। कई बार तो देखकर शर्म भी आती है। शर्म इस बात पर आती है कि ये मैंने कैसे कर दिया। अब उस समय क्या हालात रहे होंगे ये तो याद नहीं क्योंकि रात गई बात गई लेकि ज्यादातर यही फीलिंग आती है कि ये मैंने क्या कर दिया। हां, अच्छा सीन दिख जाए तो कभी कभी खुशी भी मिलती है।
- मेरे लिए ये बहुत दर्दनाक होता है। खाना खाते वक्त टेलीविजन देखने की मेरी आदत है। तो जब भी अपनी बनाई फिल्म दिख जाती है तो देखता हूं, पूरी फिल्म देखना मेरे लिए मुश्किल है। लेकिन, दोबारा अपनी फिल्में देखता हूं तो खामियां खामियां ही नजर आती हैं। कई बार तो देखकर शर्म भी आती है। शर्म इस बात पर आती है कि ये मैंने कैसे कर दिया। अब उस समय क्या हालात रहे होंगे ये तो याद नहीं क्योंकि रात गई बात गई लेकि ज्यादातर यही फीलिंग आती है कि ये मैंने क्या कर दिया। हां, अच्छा सीन दिख जाए तो कभी कभी खुशी भी मिलती है।
