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आयुष्मान खुराना ने EXCLUSIVE इंटरव्यू में की मन की बात, बोले- यहां हर फ्राइडे सबकुछ बदल जाता है
Tue, 23 Apr 2019 11:52 AM IST
Mishra Mishra
अक्षित त्यागी, अमर उजाला, मुंबई
अक्षित त्यागी, अमर उजाला, मुंबई
Published by: Mishra Mishra
Updated Tue, 23 Apr 2019 11:52 AM IST
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Ayushmann Khurrana
- फोटो : social media
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आयुष्मान, पहले तो आपको इस कामयाबी के लिए बधाई। पिछले साल आपकी फिल्में हिंदी सिनेमा में सबसे ज्यादा कारोबार करने वाली फिल्मों में शामिल रहीं। शीर्ष पर आकर कुछ बदला है?
आयुष्मान खुराना
- फोटो : सोशल मीडिया
आपकी फिल्मों से लोगों को अब ये उम्मीद रहती है कि इसमें कुछ वाकई हटके कहानी होगी, कैसे चुनते हैं अपनी फिल्मों की कहानियां?
मेरा बस एक पैमाना है कि हर कहानी आम इंसान से जुड़ी हुई होनी चाहिए। मौलिक होनी चाहिए। मैं ऐसी कोई फिल्म नहीं करना चाहता जिसकी कहानी सुनकर लोग कहें कि ये तो पहले कहीं देखा है। मैं हर बार कुछ नया करना चाहता हूं। हमारा देश कहानियों से भरा पड़ा है। सामाजिक कलंकों और सामाजिक अंधविश्वासी की सैकड़ों कहानियां हैं। हमारे देश में बहुत मसाला है।
इसे थोड़ा और समझाइए।
हर फिल्म की स्क्रिप्ट सुनते ही मेरे दिमाग में उसका ट्रेलर चलने लगता है। फिर सोचता हूं की क्या लोग इस ट्रेलर को देखने के बाद फिल्म देखेंगे या नहीं। कहीं ऐसी कहानी पहले तो नहीं बनीं। यही सब खयाल आते हैं मन में। मैं हमेशा अपने मन की सुनता हूं और तुरंत प्रतिक्रिया भी देता हूं। स्क्रिप्ट को ज्यादा पढ़ने से इसे लेकर निष्पक्षता खत्म हो जाती है।
मेरा बस एक पैमाना है कि हर कहानी आम इंसान से जुड़ी हुई होनी चाहिए। मौलिक होनी चाहिए। मैं ऐसी कोई फिल्म नहीं करना चाहता जिसकी कहानी सुनकर लोग कहें कि ये तो पहले कहीं देखा है। मैं हर बार कुछ नया करना चाहता हूं। हमारा देश कहानियों से भरा पड़ा है। सामाजिक कलंकों और सामाजिक अंधविश्वासी की सैकड़ों कहानियां हैं। हमारे देश में बहुत मसाला है।
इसे थोड़ा और समझाइए।
हर फिल्म की स्क्रिप्ट सुनते ही मेरे दिमाग में उसका ट्रेलर चलने लगता है। फिर सोचता हूं की क्या लोग इस ट्रेलर को देखने के बाद फिल्म देखेंगे या नहीं। कहीं ऐसी कहानी पहले तो नहीं बनीं। यही सब खयाल आते हैं मन में। मैं हमेशा अपने मन की सुनता हूं और तुरंत प्रतिक्रिया भी देता हूं। स्क्रिप्ट को ज्यादा पढ़ने से इसे लेकर निष्पक्षता खत्म हो जाती है।
आयुष्मान खुराना
- फोटो : सोशल मीडिया
इन किरदारों को परदे पर निभाने की प्रेरणा कहां से आती है?
यह सब कहानी पर निर्भर करता है। कई चीजें जिंदगी में हम देख चुके होते हैं तो उन्हें निभाने में आसानी होती है। लेकिन, बधाई हो की कहानी मेरे साथ कभी नहीं हुई। हां, लेकिन वैसे एक व्यक्ति को मैं जानता हूं। अंधाधुन की बात करें तो मैं किसी अंधे व्यक्ति या संगीतकार को नहीं जानता। ऐसे किरदारों के लिए वर्कशॉप्स की जरूरत पड़ती है। हम उनकी जगह जाकर उनका रहन सहन सीखते हैं। हर जगह की एक अपनी खासियत होती है। मैं उन्हीं से प्रेरणा लेता हूं।
अंधाधुन जैसी फिल्म जब चीन में दो सौ तीन सौ करोड़ रुपये की कमाई करती है, तो आपके लिए ये क्या चुनौती लेकर आती है?
मुझे लगता है कि आगे की राह इससे कठिन ही होगी क्योंकि मैंने खुद के लिए एक पैमाना तय कर दिया है। मेरे लिए आसानी ये होगी क्योंकि जिस तरह पहले मैने फिल्मों का चयन किया है, वैसे ही अब आगे भी करूंगा।
यह सब कहानी पर निर्भर करता है। कई चीजें जिंदगी में हम देख चुके होते हैं तो उन्हें निभाने में आसानी होती है। लेकिन, बधाई हो की कहानी मेरे साथ कभी नहीं हुई। हां, लेकिन वैसे एक व्यक्ति को मैं जानता हूं। अंधाधुन की बात करें तो मैं किसी अंधे व्यक्ति या संगीतकार को नहीं जानता। ऐसे किरदारों के लिए वर्कशॉप्स की जरूरत पड़ती है। हम उनकी जगह जाकर उनका रहन सहन सीखते हैं। हर जगह की एक अपनी खासियत होती है। मैं उन्हीं से प्रेरणा लेता हूं।
अंधाधुन जैसी फिल्म जब चीन में दो सौ तीन सौ करोड़ रुपये की कमाई करती है, तो आपके लिए ये क्या चुनौती लेकर आती है?
मुझे लगता है कि आगे की राह इससे कठिन ही होगी क्योंकि मैंने खुद के लिए एक पैमाना तय कर दिया है। मेरे लिए आसानी ये होगी क्योंकि जिस तरह पहले मैने फिल्मों का चयन किया है, वैसे ही अब आगे भी करूंगा।
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Ayushmann Khurrana
आपका अपना म्यूजिक बैंड भी है, तो संगीत का शौक आपको कैसे लगा?
संगीत मेरे जीवन का हमेशा से हिस्सा रहा है। मेरी जिंदगी में हमेशा बैकग्राउंड म्यूजिक चलता रहता है। पापा बांसुरी बजाते हैं। दादी गाया करती थीं। बड़ी म्यूजिकल फैमिली थी हमारी शुरू से। मैं स्कूल में होने वाले म्यूजिकल कंपटीशन्स में हिस्सा लिया करता था। स्कूल में जब म्यूजिक और थिएटर में से एक को चुनने का मौका आया तो मैंने थिएटर चुना। यहां हर लिखने की, गाने की, खुद गाने बनाने की आजादी हासिल थी।
स्कूल के दिनों के संगीत के साथी अब कहां हैं?
मेरी पहली फिल्म विकी डोनर में गाया मेरा गाना, पाणी दा रंग.. ही मेरा पहला गाना है। इस गाने को बनाने में संगीतकार रोचक कोहली का बहुत बड़ा हाथ है। मैं और रोचक साथ पढ़े हैं। स्कूल के दिनों में हमारा ग्रैविटी नाम का बैंड भी हुआ करता था। हम दोनों ने स्कूल के दिनों में खूब सारे शोज किए साथ में। साडी गली आजा, गाना भी हम दोनों ने मिलकर ही बनाया।
संगीत मेरे जीवन का हमेशा से हिस्सा रहा है। मेरी जिंदगी में हमेशा बैकग्राउंड म्यूजिक चलता रहता है। पापा बांसुरी बजाते हैं। दादी गाया करती थीं। बड़ी म्यूजिकल फैमिली थी हमारी शुरू से। मैं स्कूल में होने वाले म्यूजिकल कंपटीशन्स में हिस्सा लिया करता था। स्कूल में जब म्यूजिक और थिएटर में से एक को चुनने का मौका आया तो मैंने थिएटर चुना। यहां हर लिखने की, गाने की, खुद गाने बनाने की आजादी हासिल थी।
स्कूल के दिनों के संगीत के साथी अब कहां हैं?
मेरी पहली फिल्म विकी डोनर में गाया मेरा गाना, पाणी दा रंग.. ही मेरा पहला गाना है। इस गाने को बनाने में संगीतकार रोचक कोहली का बहुत बड़ा हाथ है। मैं और रोचक साथ पढ़े हैं। स्कूल के दिनों में हमारा ग्रैविटी नाम का बैंड भी हुआ करता था। हम दोनों ने स्कूल के दिनों में खूब सारे शोज किए साथ में। साडी गली आजा, गाना भी हम दोनों ने मिलकर ही बनाया।
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ayushmann khurrana
- फोटो : अमर उजाला
ट्विटर पर जो कविताएं लिखते हैं, वे क्या हैं?
कभी कभी बैठे बैठे दिमाग में कुछ आ जाता है और मैं लिख देता हूं। मेरी कविताएं या शायरी दिल टूटने की होती हैं और लोग इन्हें खूब पसंद भी करते हैं। लेकिन, राज की बात ये है कि मेरा दिल कभी नहीं टूटा है, मेरा ये मानना है कि हर चीज को जीना जरूरी नहीं होता।
फिल्म निर्देशकों में से ऐसे भी कोई निर्देशक है, जिनके साथ काम करने की आपकी दिली तमन्ना हो?
सच पूछें तो मैं निर्देशक से ज्यादा पटकथा पर ध्यान देता हूं। बड़े निर्देशकों में मैंने अभी सिर्फ श्रीराम राघवन और शूजीत सरकार के साथ ही काम किया है। इनके अलावा जिनके साथ काम किया वे फिल्म रिलीज होने के बाद ही बड़े बने। रही बात विश लिस्ट की तो मैं शिमित अमीन और शकुन बत्रा के साथ काम करने का ख्वाहिशमंद हूं।
कभी कभी बैठे बैठे दिमाग में कुछ आ जाता है और मैं लिख देता हूं। मेरी कविताएं या शायरी दिल टूटने की होती हैं और लोग इन्हें खूब पसंद भी करते हैं। लेकिन, राज की बात ये है कि मेरा दिल कभी नहीं टूटा है, मेरा ये मानना है कि हर चीज को जीना जरूरी नहीं होता।
फिल्म निर्देशकों में से ऐसे भी कोई निर्देशक है, जिनके साथ काम करने की आपकी दिली तमन्ना हो?
सच पूछें तो मैं निर्देशक से ज्यादा पटकथा पर ध्यान देता हूं। बड़े निर्देशकों में मैंने अभी सिर्फ श्रीराम राघवन और शूजीत सरकार के साथ ही काम किया है। इनके अलावा जिनके साथ काम किया वे फिल्म रिलीज होने के बाद ही बड़े बने। रही बात विश लिस्ट की तो मैं शिमित अमीन और शकुन बत्रा के साथ काम करने का ख्वाहिशमंद हूं।