पांच साल में रिलीज हुई सात फिल्मों से छह सुपरहिट और तीन तो अब भी सिनेमाघरों में चल रही हैं। साल 2019 की शुरुआत 'सोनचिड़िया' की इंदुमती तोमर के तौर पर करने वालीं भूमि पेडनेकर ने साल के आखिर तक आते आते चंद्रो तोमर, लतिका और वेदिका त्रिपाठी के किरदारों के जरिए धूम मचा दी। हिंदी सिनेमा की टॉप थ्री हीरोइनों में शुमार हो चुकीं भूमि से अमर उजाला के लिए पंकज शुक्ल ने की ये एक्सक्लूसिव बातचीत।
EXCLUSIVE: अभिनेत्री बनने से पहले ये काम करती थीं भूमि, मां की एक्टिंग पर दिया भावुक जवाब
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पांच साल में ही आप हिंदी सिनेमा की चोटी की तीन अभिनेत्रियों में शुमार हो चुकी हैं, इसके लिए किस बात को आप सबसे ज्यादा श्रेय देना चाहेंगी?
मेरी समझ से मेरी सफलता का श्रेय एक तो मेरी फिल्मों के निर्देशकों को जाता है जिन्होंने मुझे अलग अलग तरह के किरदारों के लायक समझा और मुझे पर भरोसा किया। दूसरा, मैं श्रेय देना चाहती हूं हिंदी सिनेमा के दर्शकों की बदलती सोच का। मोबाइल के चलते दुनिया भर का सिनेमा उनकी मुट्ठी में हैं। वह अब सिनेमा के बदले रूप को समझ रहे हैं। अलग तरह की कहानियां पसंद कर रहे हैं।
हिंदी सिनेमा में इन दिनों कथानक आधारित सिनेमा का बड़ा हल्ला है, आपके हिसाब से इसकी परिभाषा क्या है?
कथानक आधारित सिनेमा में हीरो इसकी कहानी होती है। पिछले आठ साल में जिस तरह से इंटरनेट ने हमारी दुनिया बदली है, उसमें लोगों का नजरिया बदल रहा है। कथानक आधारित सिनेमा जिसे मुंबई में कंटेंट ड्रिवेन सिनेमा कहते हैं, मेरे हिसाब से वह सिनेमा है जिसे देखते हुए लोगों का मनोरंजन भी हो और वह दर्शकों के सोच विचार में भी बदलाब लाए। मेरी जैसी अभिनेत्री इस इंडस्ट्री में इसीलिए अपने पैर जमा सकी क्योंकि अब हिंदी सिनेमा में हीरो और हीरोइन की परिभाषा भी बदल चुकी हैं। दम लगाके हईशा जैसी कहानी को वो प्यार दे रहे हैं, जिसका नायक एक विफल इंसान है और जिसकी नायिका 90 किलो मोटी लड़की है।
सोनचिड़िया की शूटिंग से पहले आप अज्ञातवास में चली गईं थी, क्या हर किरदार की तैयारी का आपका तरीका खुद को दुनिया से अलग करके कुछ समय किरदार के साथ बिताने का ही है?
नहीं, हर फिल्में तो नहीं होता लेकिन हां मुझे किरदार की तैयारियों के लिए समय की जरूरत तो होती ही है। सोनचिड़िया में मैंने बलात्कार पीड़ित एक युवती का किरदार निभाया। नाबालिग होते हुए भी उसकी शादी हो जाती है। वह 27 साल की है और उसका बेटा 15 साल का तो उस मनोस्थिति के लिए मुझे अज्ञातवास में जाना पड़ा। लेकिन, सांड की आंख में ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैंने अपनी दादी और नानी के भाव अपने किरदार में डाले और बागपत जाकर दोनों दादियों से मिलीं। क्या जीवन जिया है दोनों ने! वह अपनी बेटियों के लिए लड़ीं और पूरे समाज की बेटियों की किस्मत बदल डाली उन्होंने।
एक फोटो देखी है मैंने आपके बचपन की, मांग टीका लगाए, कानों में झुमके और खूब सारा मेकअप! तो ये अभिनय आपको मां से विरासत में मिला या फिर बचपन से ही इसकी तैयारी करती रहीं?
मम्मी (सुमित्रा पेडनेकर) शायद अभिनेत्री बनना चाहती थीं। एक फिल्म भी की उन्होंने बचपन में। फिर शादी हो गई उनकी और शादी के बाद का समाज ही कुछ अलग होता है। आपने ध्यान दिलाया तो कह सकती हूं कि मैं मम्मी का ही सपना जी रही हूं। लेकिन यहां एक बात ये भी कि उन्होंने कभी मेरे ऊपर हीरोइन बनने का दबाव नहीं डाला। उनकी जिद रही कि मैं पहले अपनी पढ़ाई पूरी करूं और फिर कुछ और करूं। वह मेरे काम का बहुत बड़ा हिस्सा है। मैं खुशनसीब हूं कि मुझे मौके मिले ऐसे और अपनी फिल्मों से मैं उन सारी लड़कियों के लिए एक उम्मीद बनना चाहती हूं जो अपने लिए कुछ करना चाहती हूं।