भोजपुरी फिल्मों में गायिकी से लेकर अभिनय और राजनीति तक पहुंचकर सफलता पाने वाले मनोज तिवारी ने जीवन में कई उतार चढ़ाव देखे। मनोज तिवारी को बचपन से ही गायिकी का बड़ा शौक था। अपने इसी शौक के चलते उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों से ही गायन शुरू कर दिया था। मनोज ने हिंदी में एम ए बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से किया है। अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए मनोज कहते हैं कि उन्हें चार किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाना और प्लेटफॉर्म पर सोना सब याद आता है।
जिया हो बिहार के लाला: मजदूरी से रेलवे स्टेशन पर सोने तक, कभी पढ़े हैं मनोज तिवारी के संघर्ष के किस्से
घर बनाने के लिए किया मजदूरों की तरह काम
अपने घर को बनाने के लिए मनोज ने खुद ट्रॉली से पत्थर उतारकर कारीगरों को पकड़ाया था। इस तरह अपने सपनों के घर को बनाने के लिए उन्होंने खुद मजदूरों की तरह काम किया। अपने संघर्ष के दिनों में मनोज सिर्फ प्रोग्राम और एल्बम गाया करते थे। इसके बाद वह धीरे- धीरे गायिकी से फिल्मों में आए।
साल 2004 में आई पहली फिल्म
उन्होंने साल 2004 में 'ससुरा बड़ा पईसावाला' से भोजपुरी फिल्मों में डेब्यू किया था। मनोज की पहली ही फिल्म सुपरहिट रही और उन्हें घर-घर में पहचान मिल गई। 30 लाख के बजट में बनी इस फिल्म ने करीब 9 करोड़ रुपये की कमाई की थी। इसमें उनके अपोजिट रानी चटर्जी ने लीड रोल प्ले किया था। एक्ट्रेस उस वक्त महज 15 साल की थीं।
गायन- अभिनय के बाद राजनीति में आजमाया हाथ
गायन और अभिनय में जड़े जमाने के बाद मनोज तिवारी राजनीति में भी उतरे। साल 2009 में उन्होंने सपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा। उन्होंने वर्तमान में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ गोरखपुर से चुनाव लड़ा और हार गए थे। इसके बाद साल 2013 में मनोज भाजपा में शामिल हो गए थे।
पिछले साल की दूसरी शादी
जो लोग थोड़ी बहुत भी भोजपुरी समझते हैं, उनकी जुबान पर मनोज के गाए हुए 'रिंकिया के पापा...', 'जिया हो बिहार के लाला...', 'गोरिया चांद के अंजोरिया...' और 'हाफ पैंट वाली से...' गाने जरूर आते होंगे। मजोन तिवारी आए दिनों सुर्खियों में बने रहते हैं। बीते दिनों वह 50 साल की उम्र में एक बार फिर पिता बनने के बाद चर्चा में आए थे। दरअसल, उन्होंने साल 2020 में ही उन्होंने दूसरी शादी की थी, जिसके बाद वह दोबारा पिता भी बने।

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