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बाइस्कोप: इस फौजी की असल प्रेम कहानी पर बनी गदर एक प्रेमकथा, बनाया ये अनोखा रिकॉर्ड

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Mon, 15 Jun 2020 01:57 PM IST
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Gadar ek prem katha this day that year series by pankaj shukla 15 june 2001 bioscope sunny deol
गदर एक प्रेमकथा - फोटो : अमर उजाला

19 साल पहले न मल्टीस्क्रीन्स वाले सिनेमाघर होते थे और न ही इतने शोज कि जितने लोग भी किसी फिल्म को पहले दिन ही देखना चाहें तो सबको टिकट मिल ही जाए। तो तय हुआ कि गदर एक प्रेमकथा का पहला शो सुबह छह बजे से शुरू होगा। पूरे देश में उस दिन उत्सव का माहौल था। सनी देओल के दीवाने ढोल ताशे लेकर ये फिल्म देखने पहुंचे और साथ में ही लोगों को लगान भी देखनी थी। मैंने ये दोनों फिल्में एक ही दिन नई दिल्ली में देखीं। पहले शीला थिएटर में लगान देखी और फिर वहां से भागकर पहुंचे कनॉट प्लेस के प्लाजा सिनेमाघर, जहां हमारी सीटें बुक होने के बावजूद सिनेमाहॉल के भीतर घुसने तक को जगह नहीं बची थी। जैसे तैसे धक्का मुक्की करते हॉल के भीतर पहुंचे तो वहां सिर्फ भीड़ दिख रही थी, जितने लोग सीटों पर बैठे थे, उतनी ही पब्लिक सिनेमाघर के भीतर खड़े होकर सिनेमा देख रही थी। खड़े होकर फिल्म देखने वाले इन दर्शकों की गिनती तो नहीं ही हुई होगी, लेकिन तब भी फिल्म गदर एक प्रेम कथा ने भारत में सबसे ज्यादा टिकटें बेचने का रिकॉर्ड बना दिया था। 15 जून 2001 को रिलीज हुई गदर एक प्रेम कथा ही हमारे आज के इस बाइस्कोप की फिल्म है।

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Gadar ek prem katha this day that year series by pankaj shukla 15 june 2001 bioscope sunny deol
गदर एकप्रेमकथा - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्म गदर एक प्रेमकथा रिलीज होने से पहले ही इतनी चर्चा में आ चुकी थी कि लोग फिल्म का इंतजार महीने भर पहले से कर रहे थे। दिल्ली में गर्मियां 19 साल पहले भी इतनी ही बेरहम हुआ करती थीं। एक दिन फिल्म वितरक गिन्नी चड्ढा का फोन आया कि सनी देओल से शाम को मीटिंग फिक्स हुई है। मैं और तब दिल्ली टाइम्स के लिए लिखने वाले पंकज कपूर साथ साथ सनी देओल की बहन के घर सैनिक फॉर्म पहुंचे। वहां देर तक हम लोगों ने गदर को लेकर बातें की। मुझसे सनी बोले, “आपके मथुरा के अनिल शर्मा ही फिल्म के निर्देशक हैं।” फिल्म की कहानी का भी हल्का सा इशारा उन्होंने दिया। लेकिन तब बायोपिक शब्द फैशन में नहीं था, नहीं तो सनी देओल इसका भी जिक्र जरूर करते बातचीत में।

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Gadar ek prem katha this day that year series by pankaj shukla 15 june 2001 bioscope sunny deol
गदर एकप्रेमकथा - फोटो : अमर उजाला मुंबई

जी हां, कम लोगों को ही पता है कि गदर एक प्रेमकथा एक सच्ची कहानी का फिल्मी रूपांतरण है। ये फिल्म आधारित है द्वितीय विश्व युद्द के दौरान बर्मा (अब म्यांमार) में ब्रिटिश सेना में नौकरी करने वाले फौजी बूटा सिंह की प्रेम कहानी पर। बंटवारे के वक्त जब सांप्रदायिक दंगे शुरू हुए तो उसने एक मुस्लिम लड़की की जान बचाई थी। दोनों में प्यार हुआ और दोनों ने शादी कर ली। बाद में लड़की की शिनाख्त होने पर उसे नए नए बने पाकिस्तान भेज दिया गया। बूटा सिंह अपनी पत्नी को लाने पाकिस्तान चला गया बिना जरूरी कागजात के। लड़की पर घर वालों का दबाव पड़ा तो उसने वापस भारत आने से मना कर दिया। कहते हैं कि बूटा सिंह ने पाकिस्तान में ही एक चलती ट्रेन के आगे छलांग लगाकर खुदकुशी कर ली।

Gadar ek prem katha this day that year series by pankaj shukla 15 june 2001 bioscope sunny deol
गदर एकप्रेमकथा - फोटो : अमर उजाला मुंबई

फिल्म गदर एक प्रेमकथा का विचार सबसे पहले इसके लेखक शक्तिमान को आया। शक्तिमान ने ही बूटा सिंह की प्रेमकथा अनिल शर्मा को सुनाई। अनिल शर्मा उन दिनों कोई ऐसी कहानी तलाश रहे थे जिसमें देशप्रेम तो हो लेकिन वह मनोज कुमार जैसी फिल्म न हो। कारगिल युद्ध के चलते देश में पाकिस्तान के खिलाफ लोगों में नफरत फैल ही रही थी और ऐसे में अनिल शर्मा को मिल गई ये कहानी। अनिल शर्मा ने मुंबई में ही पढ़ाई के बाद निर्देशक बी आर चोपड़ा के सहायक के रूप में बरसों काम किया। शुरुआती फिल्में भी उन्होंने श्रद्धांजलि और बंधन कच्चे धागों का के रूप में सोशल ड्रामा ही बनाईं। लेकिन, उनको एक्शन का चस्का लगा धर्मेंद्र की फिल्म हुकूमत से।

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Gadar ek prem katha this day that year series by pankaj shukla 15 june 2001 bioscope sunny deol
गदर - फोटो : Social Media

हुकूमत की जबर्दस्त कामयाबी ने अनिल शर्मा के सिनेमा का रंग, रूप सब बदल दिया। इसके बाद अनिल शर्मा ने धर्मेंद्र के साथ लगातार एलान ए जंग, फरिश्ते, तहलका और पुलिस वाला गुंडा जैसी फिल्में बनाईं। लेकिन फरिश्ते के बाद अनिल शर्मा और धर्मेंद्र की जोड़ी का असर कम होने लगा था। अनिल शर्मा ने जीतेंद्र के साथ फिल्म मां बनाई और गोविंदा के साथ महाराजा। गोविंदा को ही अनिल शर्मा ने सबसे पहले शक्तिमान की कहानी सुनाई थी। गोविंदा को पसंद भी बहुत आई। लेकिन, फिल्म में पैसा लगाने वाली कंपनी को गोविंदा इस फिल्म की कहानी के हिसाब से फिट नहीं लगे। ये हुआ कि इसके लिए सनी देओल से बात की जाए। अनिल शर्मा ने इसके लिए धर्मेंद्र की मदद ली और धर्मेंद्र के कहने पर ही सनी देओल ने ये कहानी सुनी।

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