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EXCLUSIVE: चीनी सेना की ज्यादतियों पर बोले राहुल बोस- 'किसी की हरकतों पर उंगली उठाना अभी ठीक नहीं'

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sun, 05 Jul 2020 05:29 AM IST
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Grandson of army general Actor Rahul bose speaks to Pankaj Shukla on acts of people Liberation Army
राहुल बोस - फोटो : Social Media

अभिनेता राहुल बोस का जीवन किसी फिल्मी कहानी जैसा ही है। रगबी और क्रिकेट वह बेहतरीन खेलते हैं। अभिनय उनका लाजवाब होता है और निर्देशन करते समय वह जिंदगी के अनुभवों के रेशे समेट उनकी कूंची से एक नई कहानी कैनवस पर खींच देते हैं। राहुल बोस के फिल्म बुलबुल में निभाए गए दोहरे किरदारों की इन दिनों खूब चर्चा हो रही है। उनसे ये खास मुलाकात की पंकज शुक्ल ने।



दुनिया एक अलग ही तरह के समय से गुजर रही है और लोगों के मन में इन दिनों तरह तरह की चिंताएं, अवसाद और परेशानियां हैंकैसे इन से लोग बच सकते हैंआपकी एक फिल्म लॉकडाउन में बहुत याद आती रही, एवरीबडी सेज आई एम फाइन।
मैंने बहुत सोच विचार कर इस फिल्म के लिए कुछ वाक्य लिखे थे। अंग्रेजी में ही कहता हूं,  एवरीबडी सेज आई एम फाइन बट नोबडी इस फाइन। द ओनली वे यू कैन भी फाइन इज टू एडमिट दैट यू ऑर नॉट। मतलब आप किसी से भी पूछिए कि आप कैसे हैं, तो जवाब यही मिलेगा, ठीक हूं। जबकि हर कोई ठीक नहीं है। हम ठीक तब हो सकते हैं जब पहले हम मानें कि हम ठीक नहीं हैं। यही हमारे आसपास हो रहा है।

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राहुल बोस - फोटो : Social Media

आप मंझे हुए अभिनेता हैं, खुद लिखते हैं, एक निर्देशक भी हैं, ऐसे में जब कोई नया निर्देशक आपको किसी कहानी के किरदार में ढालना चाहता है तो आपके लिए कहीं कोई दिक्कत आती है?
जब मैं एक अभिनेता के रूप में काम करने जा रहा होता हूं तो मैं निर्देशक की टोपी उतारकर सेट पर आता हूं। फिल्म बुलबुल के दौरान मैंने इसकी निर्देशक अन्विता दत्त से मैंने एक भी बार भी ये नहीं पूछा कि फिल्मिंग क्या है? या फिर इस सीन को क्या हम इस तरह से ले सकते हैं? कुछ नहीं। मैं किसी भी निर्देशक के काम में दखलंदाजी नहीं करता हूं। मैं पूरी जिम्मेदारी निर्देशक पर छोड़ देता हूं। क्योंकि, मुझे पता है कि इस कहानी को लेकर उनका नजरिया कुछ अलग होगा और अन्विता को देखकर तो मुझे कभी लगा ही नहीं कि यह किसी भी फिल्म को पहली बार निर्देशित कर रही हैं।

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राहुल बोस - फोटो : Social Media

फिर भी कभी तो कुछ ऐसा होता होगा कि जो आपको अच्छा नहीं लगता होगा, तो आप उसे कहने का आपका तरीका क्या होता है?
आप शायद मानेंगे नहीं लेकिन मैं परदे पर कैसा दिख रहा हूं, कैसा लग रहा हूं और क्या कर रहा हूं, मैं कभी गौर ही नहीं करता। ये काम निर्देशक का है। आप मेरे निर्देशक से पूछ लीजिए। मैं शॉट देने के बाद वीडियो असिस्ट (शूटिंग को रिवाइंड करके फिर से देखने के लिए लगा प्लेयर और स्क्रीन) पर कभी नहीं जाता हूं। मेरे लिए निर्देशक का ओके बोलना काफी है। हां, फिल्म बुलबुल में अन्विता ने एक दो बार ये जरूर कहा कि आप जरा आकर वीडियो असिस्ट देख लीजिए क्योंकि ये जो आप कर रहे हैं, वह अच्छा नहीं लग रहा। इसे आप दूसरी तरह से कर सकते हैं क्या?

Grandson of army general Actor Rahul bose speaks to Pankaj Shukla on acts of people Liberation Army
राहुल बोस - फोटो : Social Media

यानी कि नए निर्देशक आपके सामने खुलकर बोल सकते हैं और अच्छा न लगे तो आपसे फिर से सीन शूट करने के लिए कह सकते हैं, ये तो बहुत अच्छी बात है।
1993 में देव बेनगल के साथ इंगलिश अगस्त में शूटिंग करने से लेकर 2020 में अन्विता दत्त की बुलबुल तक मैंने करीब 10-12 ऐसे निर्देशकों के साथ काम किया है जो अपनी पहली फिल्म बना रहे होते हैं। मैं कभी किसी निर्देशक के काम में दखल नहीं देता। मेरा ऐसा मानना होता है कि सिनेमा एक निर्देशक की सोची कल्पना है। उसे अपनी कल्पना में अपनी तरह के स्केचेज और रंग भरने की आजादी देना उसके कलाकार का धर्म है।

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तृप्ति डिमरी, राहुल बोस - फोटो : नेटफ्लिक्स

आप बहुभाषी और बहुप्रतिभावान कलाकार हैं। परदे पर जब खलनायक का किरदार निभाना होता है जिसकी दुष्टता ही उसकी सफलता है तो ऐसे भाव आप जैसा सज्जन पुरुष अपने भीतर कहां से लाता है?
मैं जब किसी भी किरदार को निभाता हूं तो मैं यह नहीं देखता कि यह किरदार नेगेटिव है या पॉजिटिव। मेरे लिए वह किरदार सिर्फ एक किरदार है। फिल्म बुलबुल में भी मैं यही दिखाना चाह रहा हूं कि मेरे अंदर कोई कमी नहीं है। जो भी है वह हालात ऐसे हैं जो मुझसे करवा रहे हैं। मैं तो अपनी जगह ठीक हूं। आपने बीच में एक सीन का जिक्र किया जिसमें मैं बुलबुल को बाथटब से निकालकर पीट रहा हूं और मेरे पीछे दीवार पर बने रावण के चित्र से मेरे भावों की तुलना आपने की। एक अभिनेता के हिसाब से तो ये मेरे लिए एक बड़ा कॉम्प्लीमेंट हैं लेकिन ऐसा मुझे याद नहीं कि मैंने उस तस्वीर को शूटिंग के वक्त या उससे पहले भी देखा हो।

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