फिल्मों में अपना करियर बनाने का सपना देखने वाले अभिनेता हर्षवर्धन राणे जब ग्वालियर से भागे, तब उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि आगे चलकर उन्हें क्या क्या काम करने पड़ सकते हैं? तेलुगू फिल्मों के वह बड़े सितारे हैं। लेकिन, एक वक्त उनकी जिंदगी में ऐसा भी रहा जहां उनके पास न तो खाने के पैसे थे और न ही सोने के लिए छत। इस खास बातचीत में ‘अमर उजाला’ ने हर्षवर्धन से उनके पूरे संघर्ष पर विस्तार से चर्चा की।
Exclusive Interview: घर से भागे, फुटपाथ पर सोए और फिर हैदराबाद जाकर यूं स्टार बन गए हर्षवर्धन राणे
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आपका बचपन कहां बीता? और क्या वहां पर अभिनय की शुरुआत करने जैसा माहौल था?
16 से 17 साल की उम्र तक मैं ग्वालियर में था लेकिन फिर उसे छोड़कर दिल्ली भाग गया था। मुझे पर्दे पर आना था और ग्वालियर में यह बात किसी को समझ में आ नहीं रही थी। वैसे आनी भी नहीं चाहिए। वह समय ऐसा था जब अभिनय को एक पेशे के रूप में नहीं देखा जाता था। लोग मजाक उड़ाते थे और कहते थे कि क्या यह अभिनेता बनना भी कोई करियर बनाना है क्या? उस समय ग्वालियर से सिर्फ एक ही अभिनेता निकले जिनका नाम है शरद केलकर। मिसाल के तौर पर उनका नाम दिया जा सकता था लेकिन वह तो पहले से ही एक बड़े अभिनेता बन गए थे। उनका फोन नंबर वगैरह था नहीं। इस वजह से उनसे बातचीत करने का या कुछ पूछने का मौका ही नहीं मिला।
अब आप भी एक पहचान रखते हैं तो क्या शरद केलकर से आपकी कभी मुलाकात हुई?
जी हां! एक बार मेरी मुलाकात हुई थी उनसे। और मेरे बात करने के तरीके से वह अचानक आश्चर्य में आ गए। उनका कहना था कि मैं इतना सभ्य कैसे हूं जबकि मैं ग्वालियर से हूं? दरअसल, क्या है कि ग्वालियर के लोगों का जो स्वभाव है, वह थोड़ा कड़क माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि भिंड, मुरैना और चंबल का जो क्षेत्र है, वहां पर थोड़े सख्त स्वभाव के लोग रहते हैं। फिर मैंने उन्हें बताया कि मैं थोड़ा जल्दी निकल गया था इस चक्कर में अलग-अलग शहरों का मैंने दौरा किया है। मैंने बताया कि उनका ही नाम लेकर मैं एक अभिनेता बनने की हिम्मत जुटा पाया तो वह बहुत खुश हुए।
ग्वालियर से भागने के बाद फिर आगे बढ़ने के लिए आपको किस घटना ने प्रेरित किया?
मैं कुछ इंटरव्यूज पढ़कर अपने आप को दिलासा दे रहा था कि दिल्ली से तो बहुत लोग इस इंडस्ट्री में आए हैं। आयुष्मान खुराना हैं, शाहरुख सर भी दिल्ली से ही आए हैं। वह भी किसी को नहीं जानते थे। अक्षय कुमार सर शेफ थे। इन सबके बारे में इंटरव्यूज पढ़-पढ़कर ही जाना है। इंटरव्यूज की ही ये ताकत होती है जो दूसरों को प्रभावित कर जाती है। फिर मैंने फैसला किया कि दुनिया को मैं अब बोलकर अपनी बात नहीं समझाऊंगा, करके दिखाऊंगा। दिल्ली जाकर मैंने बहुत से काम किए। वेटर बना। एसटीडी बूथ पर नौकरी की। 2002 के आसपास मेरा थोड़ा प्रमोशन हुआ और मुझे 20 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से एक साइबर कैफे में नौकरी मिली। महीने का 500- 600 रुपये कमाना मेरे लिए तब बहुत बड़ी बात थी। फिर मैं एक डिलीवरी ब्वॉय बना।
और फिर आपकी जॉन अब्राहम से मुलाकात हुई?
ये 2004 की बात है। मैं एक दिन एक यामाहा के शोरूम से हेलमेट की डिलीवरी लेकर एक श्रुति नाम की लड़की के यहां देने जाने वाला था। जब मैं हेलमेट लेकर उसके वहां पहुंचा तो उसने मुझसे कहा कि क्या मैं जानता हूं कि यह हेलमेट किसके लिए है? मैंने कहा कि नहीं, मुझे नहीं पता। तो उसने कहा कि यह जॉन अब्राहम के लिए है। यह सुनकर मैं तो पागल हो गया था। उसने मुझे रोका और कहा कि रुको, जॉन मुझसे कुछ कहना चाहते हैं। यह सुनकर मैं थोड़ा डर गया। मुझे लगा कि कहीं मुझसे कोई गलती हो गई शायद! लेकिन, थोड़ी देर में वह लॉबी में आए और उन्होंने मुझे सिर्फ धन्यवाद कहने के लिए रुकवाया था। मैं इतना खुश हो गया कि मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं किस तरह से प्रतिक्रिया दूं और उन्हें क्या बोलूं? उन्होंने एक डिलीवरी ब्वॉय के प्रति इतनी दयालुता दिखाई।