दुनिया भर में अपनी गायकी और संगीत का लोहा मनवा चुके संगीतकार ए. आर. रहमान 6 जनवरी को अपना 53वां जन्मदिन मना रहे हैं। ए. आर रहमान की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। उनके नसीब में जितनी बड़ी कामयाबी आई, उतना ही बड़ा और कठिन संघर्ष भी आया है। अपनी रचनाओं से रहमान ने ना सिर्फ देश में बल्कि दुनिया में भी नाम कमाया और तिरंगे का मान बढ़ाया है। ऐसे में आज के खास दिन के मौके पर जानिए उनसे जुड़े 10 दिलचस्प किस्से।
विशेष: फिल्मी कहानी सी है ए आर रहमान की जिंदगी, ये 10 किस्से आपको हैरान कर देंगे
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दिलीप कुमार से रहमान
ए.आर रहमान हिंदू परिवार में पैदा हुए। बचपन में उनका नाम दिलीप कुमार रखा गया। उनके पिता दिलीप कुमार के बड़े प्रशंसक थे तो उन्हीं के नाम पर उन्होंने अपने बेटे का नाम रखा, लेकिन 23 साल की उम्र में उन्होंने अपने गुरू कादरी इस्लाम से प्रभावित होकर इस्लाम कबूल कर लिया। अब ए आर रहमान के नाम का पूरा नाम अल्लाह रखा रहमान है।
बचपन में बेचे बाजे
ए. आर. रहमान को संगीत अपने पिता से विरासत में मिला। उनके पिता आर. के. शेखर मलयाली फिल्मों में संगीत देते थे। रहमान जब नौ वर्ष के ही थे तब उनके पिता का देहांत हो गया। घर की माली हालत ठीक ना होने के कारण अपने परिवार के वाद्ययंत्र को बेचना पड़ा।
पढ़ाई के लिए नहीं थे पैसे
अब देश के प्रख्यात संगीतकार बन चुके ए. आर. रहमान के पास स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के लिए भी पैसे नहीं थे। 15 वर्ष की उम्र में रहमान को कम उपस्थिति के कारण स्कूल छोड़ना पड़ा था। अपने हुनर को उन्होंने अपना हथियार बनाया और आज दुनिया के तमाम बड़े संगीत स्कूलों में रहमान को पढ़ाया जाता है।
अवसाद का भी शिकार हुए
एक साक्षात्कार के दौरान ए. आर. रहमान ने कहा कि वह 25 साल की उम्र तक खुदखुशी के बारे में सोचा करते थे। पिता की मौत के कारण वह काफी अकेले हो गए थे। इसके अलावा भी उनकी जिंदगी कई तरह से विचलित थी। लेकिन, संगीत के शौक ने रहमान को इन हालात से उबारा और अपने शौक को ही रहमान ने अपना पेशा बना लिया।
पहला वेतन 50 रुपये
रहमान ने गुरबत के दिनों में रिकॉर्ड बजाने का काम संभाला। इसी से उनका और घर का गुजारा चलने लगा। रिकॉर्ड बजाने के लिए रहमान को पहली बार 50 रुपये मिले, यही उनकी जिंदगी का पहला मेहनताना है। बाद में सुभाष घई की फिल्म ताल का संगीत टिप्स म्यूजिक कंपनी ने छह करोड़ रुपये में खरीदा। किसी हिंदी फिल्म के संगीत की यह अब तक की सबसे बड़ी कीमत है।
रोजा ने तोड़े भाषाओं के बंधन
साल 1991 में रहमान ने फिल्मों के लिए म्यूजिक बनाना शुरू किया। फिल्मकार मणि रत्नम ने अपनी फिल्म 'रोजा' में उन्हें संगीत देने का मौका दिया। यह पहली दक्षिण भारतीय फिल्म है जिसके गाने हिंदी में डब हुए और सुपरहिट हुए। फिल्म के गाने दिल है छोटा सा, छोटी सी आशा के मूल गीत चिन्न चिन्न आसई के लिए गीतकार वैरामुथु को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला और रहमान को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।
सबसे महंगे कंसर्ट टिकट का रिकॉर्ड
साल 2013 आते आते रहमान का नाम पूरी दुनिया में मशहूर हो चुका था। वह दुनिया के तमाम बड़े कंसर्ट स्थलों पर अपने कार्यक्रम कर चुके थे। रहमान के नाम किसी कंसर्ट के सबसे महंगे टिकट बिकने का रिकॉर्ड भी शामिल है। कनाडा के राज्य ओंटारियो मार्खम में एक सड़क का नाम उनके नाम पर रखा गया है।
पुरस्कारों की खान
रहमान को अब तक छह राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, दो ऑस्कर पुरस्कार, दो ग्रैमी पुरस्कार, एक गोल्डन ग्लोब पुरस्कार, 15 फिल्मफेयर पुरस्कार और दक्षिण भारतीय फिल्मों के लिए 17 साउथ फिल्म फेयर पुरस्कार मिल चुके हैं। फिल्म '127 आवर्स' में संगीत के लिए रहमान को बाफ्टा पुरस्कार मिला। फिल्म स्लमडॉग मिलिनेयर के गाने जय हो के लिए वह ऑस्कर से सम्मानित किए गए। वैसे कम लोगों को ही पता होगा कि ये गाना रहमान ने सुभाष घई की सलमान खान स्टारर फिल्म युवराज के लिए बनाया था।