किरदार में ढल जाने की तड़प को इरफान अब तक सीने से लगाए घूमते रहे। पर्दे पर उन्होंने जो जीया, वह लोगों के दिलों में उतर गया। शायद यही वजह है कि लाखों लोग उनकी खबर जानना चाहते हैं...
लोगों को क्यों परेशान कर रही है इरफान खान की बीमारी, फैन-फॉलोविंग का है असर या वजह कुछ और?
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लगभग पंद्रह साल पहले की बात है, विख्यात निर्देशक विशाल भारद्वाज भोपाल में 'मकबूल' फिल्म बना रहे थे। इसी बीच संजीदा कास्टिंग डायरेक्टर अमिता सहगल का मुम्बई से फोन आया और उन्होंने तिग्मांशु धूलिया की फिल्म 'हासिल' के बारे में बतलाया। अमिता ने बताया कि वह एक बहुत अच्छी फिल्म बनी है और इरफान से बात करने की बात कही। इरफान से यह पहली मुलाकात थी। वे मेकअप में थे। वहां बिना व्यवधान के हमारी एक घंटे से अधिक समय बातचीत हुई। उस बातचीत में इस सितारे से जिस तरह मैं अभिभूत हुआ, वह प्रभाव आज भी कायम रखने की सार्थक वजहें हैं। जो इरफान के व्यक्तित्व और उनके काम के साथ ही जुड़ी हुई हैं। 'हासिल' का प्रदर्शन होने को था और 'मकबूल' में वे काम कर रहे थे।
'मकबूल' के सेट पर तीन बड़े अभिनेता नसीर, ओम और पंकज कपूर अपनी-अपनी अंतर्मुखीयता में लीन थे। इधर इरफान से बात करते हुए लग रहा था कि इस शख्स में किरदार में ढलने की कैसी तड़प है। फिल्म 'पान सिंह तोमर' ने दो दशक पहले बनी शेखर कपूर की फिल्म 'बैण्डिट क्वीन' के असर को प्रतिबिंबित करने का काम किया था। उद्विग्न सतहों पर भले खूब सारे हादसों, खून-खराबे के बाद उस तरह का सन्नाटा स्थापित हो जाए। जिसे व्यवस्था शांति और हम सहमा हुआ मौन समझते हैं, लेकिन जो कहानियां खत्म होती हैं, उनके अवसाद उन जमीनों से कभी नहीं मिटते। चंबल का दस्यु क्षेत्र अब भले उस तरह की घटनाओं के साथ हमें भयभीत या रोमांचित न करता हो, लेकिन सच्चाइयां, घटनाओं के बाद भी जीवित हैं। 'पान सिंह तोमर' को आलोचकों ने ही सबसे पहले निष्पक्ष रूप से सराहा, तभी दर्शक भी फिल्म के पक्ष में हुआ।
एक धावक, जिद और धुन के पक्के इंसान का दस्यु जीवन भी उसी रोमांच का जीता-जागता दस्तावेज बना, जैसा वह पहले था। एक सामाजिक आदमी, समाज की मुख्यधारा में रहने-जीने वाला इंसान। आम आदमी की तरह ही सपने देखने और साकार करने की कोशिश करने वाला फौजी। दर्शकों का मनोरंजन करने वाली आम फिल्मों में इरफान ने नाहक रुचि नहीं दिखाई। वे भरोसा उन्हीं फिल्मों पर करते हैं, जिनके किरदारों ने उनको खुद चुनौती दी।
उनके निभाए किरदारों को देखकर लगता है कि वे बड़ी सहजता के साथ उनको जी रहे हैं। कुछ सहज और दिलचस्प किरदारों की बात करें, तो जैसे 'पीकू' का कार चालक, जिसकी पूरे समय फिल्म के केंद्रीय पात्र अमिताभ बच्चन और उनकी बेटी की भूमिका निभा रहीं दीपिका से नोक-झोंक होती रहती है। एक दूसरी फिल्म 'लंच बॉक्स' जो दृश्य दर दृश्य बड़ी सहजता से हमारे सामने घटित होती है, एक अनदेखे प्रेम और आकर्षण की फिल्म जिसके मूल में टिफिन है और उसमें रखा भोजन।
पिछले दिनों की उनकी फिल्में 'हिन्दी मीडियम' और 'करीब करीब सिंगल' भी अपनी अपनी विषय वस्तु और उनके चरित्र के साथ रोचक बनती है। इसके विपरीत आने वाली फिल्म 'ब्लैकमेल' में उनकी अचम्भित कर देने वाली भूमिका। इरफान, हमारे सिनेमा और सपनों का एक मनभावन सुकुमार है। वह टक्कर यहां भी देंगे। दुआ है वे यहां भी जीतकर उसी सम्मोहक, मारक मुस्कान के साथ हम सबकी ओर मुखातिब हों। ये कुहासा तो हट जाएगा...।