मशहूर फिल्म निर्माता और निर्देशक जेपी दत्ता को ज्यादातर पुलिस और सेना पर आधारित फिल्में बनाने के लिए जाना जाता है। जब भी उनका जिक्र होता है तो लोगों के जेहन में सबसे पहले फिल्म आती है 'बॉर्डर'। लेकिन यही बात जेपी दत्ता को बहुत खटकती भी है। उनका मानना है कि उन्होंने अपनी जिंदगी में कई बेहतरीन फिल्में की हैं लेकिन उनकी सिर्फ एक ही फिल्म की बातें होती हैं। एक फिल्म निर्माता और निर्देशक के रूप में यह उनके लिए सम्मान नहीं, बल्कि अपमान जैसा प्रतीत होता है। उनके जन्मदिन के मौके पर आज हम आपको उनकी फिल्मों के कुछ किस्से सुनाते हैं।
'बॉर्डर' के डायरेक्टर की ये हैं अनसुनी कहानियां, पहली फिल्म ही हो गई थी डिब्बाबंद पर दे गई जीवनसंगिनी
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पहली फिल्म से जेपी को मिली पत्नी
जेपी दत्ता ने फिल्म निर्देशन में अपनी शुरुआत वर्ष 1985 में आई फिल्म 'गुलामी' से की है। इस फिल्म में धर्मेंद्र, मिथुन चक्रवर्ती, नसीरुद्दीन शाह, कुलभूषण खरबंदा, रीना रॉय, स्मिता पाटिल, अनीता राज और रजा मुराद मुख्य भूमिकाओं में हैं। वैसे उनकी शुरुआत तो पहले ही हो जाती अगर उनकी फिल्म 'सरहद' पूरी होकर सिनेमाघरों तक पहुंचती। इस फिल्म को वह विनोद खन्ना, मिथुन चक्रवर्ती और बिंदिया गोस्वामी के साथ बना रहे थे। यह दो दोस्तों की कहानी थी जो बचपन में ही एक दूसरे से बिछड़ जाते हैं। उनकी मुलाकात अगली बार तब होती है जब वे युद्ध की दहलीज पर खड़े होते हैं और दोनों ही अलग-अलग सेनाओं में शामिल हैं। इस फिल्म को विनोद खन्ना ने बीच में छोड़ दिया था और वह अमेरिका चले गए थे। इस वजह से यह फिल्म पूरी नहीं हो पाई। हालांकि, यहां से जेपी की पहचान बिंदिया गोस्वामी से जरूर हो गई थी जो आगे जाकर उनकी पत्नी बनीं।
आर्थिक तंगी के बावजूद बनी पहली फिल्म
जेपी दत्ता मशहूर फिल्म निर्देशक और लेखक ओपी दत्ता के बेटे हैं। जेपी की पहली फिल्म 'गुलामी' को लिखने का काम ओपी ने ही किया। फिल्म के बनाने के दौरान का एक किस्सा बहुत मशहूर रहा। इस फिल्म का निर्माण एचए नाडियाडवाला ने किया है। जब यह फिल्म बन रही थी उसी दौरान नाडियाडवाला के पिता चल बसे। इस वजह से निर्माता पर आर्थिक विपदा आई और इसका सीधा असर जेपी की फिल्म पर पड़ा। नाडियाडवाला ने जेपी को राजस्थान में शूटिंग करने के लिए तीन लाख रुपये दिए और काम जारी रखने के लिए कहा। अब इतने कम पैसे में वह फिल्म कैसे बनाते हैं? हालांकि जेपी की इस परेशानी को फिल्म के अभिनेता धर्मेंद्र ने समझा और वह बिना पैसे के काम करने के लिए तैयार हो गए। जब यह बात दूसरे कलाकारों ने जानी तो उन्होंने भी जेपी का साथ दिया। तब जाकर यह पहली फिल्म बन सकी। यहां से ही धर्मेंद्र और जेपी बहुत अच्छे दोस्त बन गए थे।
मुश्किल में आया सनी देओल का करियर
जेपी दत्ता ने अपनी दूसरी फिल्म 'यतीम' की घोषणा वर्ष 1985 में ही कर दी थी। लेकिन, धीरे-धीरे फिल्म कुछ कारणों की वजह से आगे सरकती गई और तीन साल बाद सिनेमाघरों में रिलीज हुई। फिल्म फ्लॉप रही और इसका सबसे बड़ा असर सनी देओल के करियर पर पड़ा। इस फिल्म के साथ वह चार फिल्में फ्लॉप दे चुके थे। यह उनके करियर की शुरुआत तो नहीं थी लेकिन फिर भी शुरुआती दिनों में चार फिल्में असफल होना सोचनीय था। इसके लिए सनी के पिता धर्मेंद्र बहुत चिंतित हो गए। तब उन्होंने अपने बेटे के लिए एक बड़ी फिल्म की जुगाड़ लगाई। वह सीधे मिथुन चक्रवर्ती के पास पहुंचे और उनसे राजकुमार संतोषी की फिल्म 'घायल' को छोड़ने की बात की। मिथुन के पास उस समय फिल्मों की भरमार थी इसलिए उन्होंने कहा कि 20 फिल्मों में से अगर एक फिल्म हाथ से चली भी जाती है तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी। तब सनी को 'घायल' मिली और साथ ही मिला सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार।
धर्मेंद्र और जेपी की दोस्ती में पड़ी गांठ
जेपी दत्ता और धर्मेंद्र के बीच दोस्ती तो पहली ही फिल्म से हो गई थी। लेकिन, जब धर्मेंद्र जेपी की फिल्म 'बंटवारा' में काम रहे थे और अक्सर शूटिंग पर देरी से आया करते थे और सेट पर मौजूद लोगों की मानें तो उस वक्त वह होश में भी कम ही होते थे। इस बात को लेकर धर्मेंद्र और जेपी के बीच कई बार बहस हुई। आलम यह था कि एक बार तो फिल्म के दूसरे मुख्य अभिनेता विनोद खन्ना के साथ धर्मेंद्र की असली धक्का-मुक्की भी हो गई। हालांकि, बाद में दोनों ने मीडिया में इन खबरों को अफवाह बताया। धर्मेंद्र के इस बर्ताव का नतीजा यह निकला कि फिल्म के निर्माता सलीम अख्तर ने पोस्टर में धर्मेंद्र की तस्वीर छोटी जबकि दूसरे कलाकार मोहसिन खान की तस्वीर को बड़ा दिखाया। मोहसिन अभिनेत्री रीना रॉय के पति थे। धर्मेंद्र की तस्वीर छोटी करने पर सलीम ने तर्क दिया था कि धर्मेंद्र तो पहले से ही एक बड़े अभिनेता हैं लेकिन मोहसिन को प्रचार की जरूरत है।