जॉन अब्राहम की फिल्म बाटला हाउस ने कमाई के मामले में उनके करियर का नया मील का पत्थर पा लिया है। अपनी फिल्म की इस कामयाबी से वह खुश हैं और आगे भी ऐसी फिल्में करते रहना चाहते हैं जो एक भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा कर सके।
इस वजह से देशभक्ति फिल्में कर रहे जॉन अब्राहम, इंटरव्यू में नई फिल्म पर भी खोले राज
पहले परमाणु, फिर सत्यमेव जयते और अब बाटला हाउस। लगता है आप हिंदी सिनेमा के नए भारत कुमार बनते जा रहे हैं?
नहीं, ऐसा कोई इरादा लेकर तो कभी ये फिल्म मैंने बनाई नहीं। लोग ये भी कहते हैं कि मैं देशभक्त हीरो बनना चाहता हूं लेकिन मैं अपनी बात इस तरह से कहता हूं कि मैंने कहानियां चुनी हैं। ये कहानियां ऐसी हैं जो आज की पीढ़ी को बताना जरूरी है। इन कहानियों को कहने की कोशिश मैं आगे भी करता रहूंगा।
ऐसा क्या लगता है आपको नई पीढ़ी की आदतों में कि सिनेमा ही ये कहानियां कहने का इकलौता माध्यम बचा रह गया है?
आपकी हमारी पीढ़ी किताबें पढ़ती रही है। अखबार भी हम आप पढ़ते रहे हैं लेकिन नई पीढ़ी का इन सबसे नाता टूट रहा है। जरूरत है हिंदुस्तान की कहानियों को हिंदुस्तान के दर्शकों तक पहुंचाने की। नए युवा हर तरफ दिलचस्प कहानियां खोज रहे हैं। वे हॉलीवुड का सिनेमा देख रहे हैं। ओटीटी देख रहे हैं। ऐसे में इन दर्शकों को वापस हिंदी सिनेमा तक लाने का एक ही जरिया है और वह है हमारे आपके बीच की ऐसी अनसुनी कहानियां जो दिलचस्प हैं, मनोरंजक और अपनेपन की भावना जगाती हैं।
तो ये कहानियां आप चुनते कैसे हैं और कहानियां आप तक पहुंचती कैसे हैं?
कहानियां चुनने का तो मेरा बस एक ही तरीका है। कहानी सीधे मेरे दिमाग को झकझोरती है तो मैं समझ जाता हूं कि ये सही कहानी है। जैसे मैं कहीं भी रहूं, दुनिया के किसी भी कोने में मैं तिरंगा लहराता देखता हूं तो मेरे रोएं खड़े हो जाते हैं। दर्शक को पुलकित, प्रफुल्लित और प्रभावित करने वाली कहानियां मैं बनाना चाहता हूं। रही कहानियों को मेरे तक पहुंचने की तो मैं लेखकों के लिए हमेशा उपलब्ध रहता हूं। अभी दिल्ली में एक न्यूज चैनल में मुझे एक कहानी सुनने को मिली, हम इस पर काम कर रहे हैं।
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निखिल आडवाणी और आपका साथ रंग ला रहा है, इस साथ का अगला इंद्रधनुष कब खिलेगा?
हम लोग कहानी तय कर चुके हैं। ये 1911 में हुए एक ऐसे फुटबॉल मैच की कहानी है जिसने देश की राजधानी कलकत्ता से बदलकर दिल्ली कर दी। इसमें ब्राह्मणों की एक फुटबॉल टीम की कहानी है जो अपने धर्म के चलते जूते नहीं पहन सकते। नंगे पांव फुटबॉल खेलने वालों को परेशान करने के लिए अंग्रेजों ने पूरे मैदान में कंकड़ बिछा दिए थे।