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बाइस्कोप: संगीनों के नहीं फाइटर जेट्स के साये में शूट हुई अमिताभ बच्चन की ये फिल्म, हर किस्सा हैरान कर देगा

पंकज शुक्ल, मुंबई Published by: प्रतीक्षा राणावत Updated Fri, 08 May 2020 08:33 PM IST
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khuda gawah movie this day that year series by pankaj shukla 8 may 1992 bioscope Amitabh bachchan
khuda gawah

साल 2018 की जनवरी में एक हॉलीवुड फिल्म रिलीज हुई, 12 स्ट्रॉन्ग। ये कहानी है उन 12 जाबांज अमेरिकी सैनिकों की जिन्होंने 11 सितंबर के हमले के बाद अफगानिस्तान की सीमा से मजार ए शरीफ तक घोड़ों से और पैदल जाकर तालिबान के एक बड़े गुट का सफाया कर दिया था। और, इसी मजार ए शरीफ के इलाके में कभी शूट हुई थी अमिताभ बच्चन- श्रीदेवी की फिल्म खुदा गवाह। इस फिल्म की शूटिंग के लिए अमिताभ बच्चन जब अफगानिस्तान पहुंचे थे तो वहां के राष्ट्रपति नजीबुल्ला अहमदजई ने उनकी खातिरदारी अपने निजी मेहमान की तरह की थी।



अमिताभ बच्चन ने इस फिल्म को याद करते हुए कुछ साल पहले अपने ब्लॉग पर लिखा था, 'मुझे नहीं पता कि अब मेरे मेजबान कहां है? अक्सर मेरे दिल में ये ख्याल आता है कि वे कहां होंगे?' अमिताभ बच्चन की हिफाजत के लिए लड़ाई में इस्तेमाल होने वाले सैन्य हेलीकॉप्टर और अपना निजी सुरक्षा दस्ता मुहैया कराने वाले नजीबुल्ला 1987 से 1992 तक अफगानिस्तान के राष्ट्रपति रहे। सितंबर 1996 में तालिबान ने उनका बहुत क्रूरता के साथ कत्ल कर दिया। खुदा गवाह कई मायनों मे हिंदी सिनेमा के इतिहास में मील का एक ऐसा पत्थर है जिसे बरसों बरस याद किया जाएगा। खुदा गवाह ही हमारी आज के बाइस्कोप की फिल्म है जो 8 मई 1992 को रिलीज हुई। फिल्म में अमिताभ का ये मोनोलॉग सुनिए, आपको ज़रूर पसंद आएगा।

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खुदा गवाह - फोटो : Social Media

ये तो आप जानते ही हैं ऋषि कपूर और अमिताभ बच्चन ने एक साथ पहले निर्माता निर्देशक यश चोपड़ा की फिल्म कभी कभी में काम किया। ये बात है सन 1977 की। इसके अगले साल दोनों निर्देशक मनमोहन देसाई की फिल्म अमर अकबर एंथनी में साथ दिखे, यहां विनोद खन्ना ने इन दोनों के साथ तिकड़ी बनाई। बाद में दोनों नसीब, कुली और अजूबा जैसी फिल्मों में भी साथ दिखे। खुदा गवाह नाम की एक फिल्म पहले पहल सिलसिला और अमर अकबर एंथनी के बीच में ही कहीं बननी शुरू हुई थी।

मनमोहन देसाई ने अपनी फिल्म खुदा गवाह में अमिताभ बच्चन का डबल रोल रखा था और फिल्म में उनके साथ थे ऋषि कपूर और परवीन बाबी। फिल्म की शूटिंग भी कुछ दिनों चली लेकिन देसाई को मामला कुछ जमता दिखा नहीं तो उन्होंने ये फिल्म बीच में ही रोक दी। बाद में इसी कहानी को थोड़ा रगड़ घिसकर और चमकाकर मनमोहन देसाई के बेटे केतन देसाई ने अपनी डेब्यू फिल्म में इस्तेमाल किया। इस फिल्म का नाम था अल्ला रखा और फिल्म के हीरो थे, जैकी श्रॉफ। मुकुल आनंद ने चूंकि फिल्म का टाइटल मनमोहन देसाई की फिल्म का ही लिया था, लिहाजा फिल्म खुदा गवाह शुरू भी मनमोहन देसाई के नाम के साथ ही होती है, खुद मनमोहन देसाई परदे पर आते हैं, स्टाइल में पोज लेते हैं, और बोलते हैं, एक्शन।

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खुदा गवाह - फोटो : Social Media

एक्शन इस फिल्म में टीनू वर्मा का था लेकिन, बीच में किसी ने हवा उड़ा दी कि फिल्म में अमिताभ का तो एक्शन ही नहीं है। वह तो पूरी फिल्म बस जेल में बंद रहते हैं। और, वहीं अपने बैरक में गाने गाते रहते हैं। दरअसल फिल्म खुदा गवाह जब दोबारा बननी शुरू हुई तो इसके निर्माता, निर्देशक सब बदल गए।, बस बाकी रहे तो सुपरस्टार अमिताभ बच्चन। तब फिल्म का नाम था, कैदी नंबर 786। 786 नंबर का बिल्ला अमिताभ बच्चन के पास फिल्म दीवार में भी रहता है जो दरअसल कुली का काम करते समय विजय का बिल्ला नंबर होता है। अमिताभ बच्चन और मुकुल आनंद ने एक साथ तीन फिल्में बनाने की योजना बनाई थी। तय ये हुआ था कि पहले अग्निपथ बनेगी, फिर हम पर काम शुरू होगा और उसके बाद बनेगी कैदी नंबर 786। बीच में फिल्म का नाम कुछ दिनों के लिए बादशाह खान भी पड़ा लेकिन आखिर में फिल्म बनी और रिलीज हुई खुदा गवाह के नाम से।

अगर आपने कार्तिक आर्यन की फिल्म सोनू के टीटू की स्वीटी देखी है तो उसमें कार्तिक आर्यन और नुसरत भरूचा की नजरें टकराते ही बैकग्राउंड में जो म्यूजिक बजता है, वह दरअसल फिल्म खुदा गवाह में उस वक्त बजने वाला म्यूजिक है जब अमिताभ बच्चन फिल्म में श्रीदेवी को पहली बार देखते हैं। फिल्म में अमिताभ बच्चन, श्रीदेवी के अलावा डैनी, नागार्जुन और शिल्पा शिरोडकर की अहम भूमिकाएं हैं। नागार्जुन की एंट्री फिल्म में कैसे हुई, इसकी भी कई कहानियां हैं। लेकिन, पहले आपको बताते हैं वो एहसास जो अमिताभ बच्चन को इस फिल्म की शूटिंग करते हुए। सोशल मीडिया पर अफगानिस्तान के हालात पर अपने एक लेख में खुद अमिताभ बच्चन लिखते हैं, 'सोवियत के लोग देश छोड़कर जा चुके थे और सत्ता आ चुकी थी नजीबुल्ला अहमदजई के हाथों जो खुद लोकप्रिय हिंदी सिनेमा के बड़े वाले प्रशंसक थे। वह मुझसे मिलना चाहते थे और हमारा आदर सत्कार बिल्कुल शाही अंदाज में हूआ। हमारा मजार ए शरीफ में वीवीआईपी स्वागत हुआ और हमने उस बेहद खूबसूरत देश को एयरफोर्स के जहाजों के साये में करीब करीब पूरा मथ डाला था। हमें कहा गया कि हम होटल में नहीं रुकेंगे। हमारे लिए किसी ने अपना पूरा महल खाली कर दिया और जब तक हम रहे वह पास में ही किसी दूसरे घर में रहता रहा...।'

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KHUDA GAWAH MOVIE
अफगानिस्तान की कुछ लोकेशंस ऐसी भी थी जहां सिर्फ घोड़ों के जरिए पहुंचा जा सकता था और तब अमिताभ बच्चन और उनके काफिले को छोटे छोटे हवाई जहाजों से नेपाल की सीमा तक पहुंचाया जाता और वहां से पूरी यूनिट घोड़ों की पीठ पर लोकेशन तक पहुंचती। कुछ रातें अमिताभ बच्चन ने लोकेशन पर ही मिट्टी के बने ऐसे घरों में बिताईं, जहां वे खड़े हो जाएं तो सिर छत से टकरा जाता था। ऐसे भी मौके आए जब पूरी यूनिट पानी के सिर्फ एक नलके से काम चलाती थी और सारा दिशा मैदान सब खुले में ही जाना होता था। और, दूसरी तरफ जब ये लोग वापस बस्ती पहुंचते थे तो हेलीकॉप्टर या जहाज से रुकने की जगह तक किसी को भी पैदल चलकर नहीं जाने दिया जाता। जो भी कबीले का सरदार वहां मौजूद होता, वह अमिताभ बच्चन को गोदी में उठाकर ले जाता। और, इस दौरान 24 घंटे अमिताभ के सिर पर रहता पहरा अफगानिस्तान एयरफोर्स के फाइटर जेट्स का।

जबर्दस्त आवभगत के बीच बनी इस फिल्म की कहानी भी कबीले की ही है। घोड़ों पर चढ़कर खेले जाने वाले खेल बुजकाशी के एक खेल में बादशाह खान यानी अमिताभ बच्चन की आंखें बेनजीर को देखती हैं। बादशाह का प्यार भी उसे कुबूल है। पर, शर्त वह ये लगाती है कि बादशाह खान को उस कातिल का सिर काटकर लाना होगा जिसने उसके पिता की हत्या कर दी। बादशाह खान इसके लिए हिंदुस्तान आता है। कातिल का पता लगाता है और बेनजीर से किया अपना वादा पूरा करके हिंदुस्तान के कानून के हिसाब से सजा काटने फिर भारत लौट आता है। कहानी इसके बाद अगली पीढ़ी तक पहुंचती है। श्रीदेवी अब मेहंदी के किरदार में नजर आती है और कहानी यहीं से नया ट्विस्ट भी लेती है। मेहंदी से रजा मिर्जा को प्यार है और रजा मिर्जा है उसी कातिल का बेटा जिसे मारने बादशाह खान हिंदुस्तान आया था।

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खुदा गवाह - फोटो : Social Media

फिल्म खुदा गवाह एक बहुत मेहनत से बनाई गई फिल्म है और मुकुल आनंद ने इसके लिए अपने जीवन के कई साल लगा दिए। फिल्म के साथ दिक्कत बस एक थी कि ये तीन घंटे से भी लंबी फिल्म थी और संतोष सरोज की लिखी इसकी पटकथा चुस्त नहीं थी। फिल्म में श्रीदेवी और अमिताभ बच्चन की कमाल की अदाकारी थी। आनंद बक्षी ने गाने ठीक ठाक लिखे थे और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ इसकी म्यूजिक सिटिंग पर अमिताभ बच्चन खुद कई रात बैठे थे।

इस रजा मिर्जा के रोल के लिए भी बहुत ड्रामा हुआ। इस रोल के लिए पहले संजय दत्त को साइन किया गया था। लेकिन फिल्म के निर्देशक मुकुल आनंद और संजय दत्त के बीच कुछ तो गड़बड़ हुआ कि वह फिल्म से बाहर हो गए। मुकुल आनंद का कहना था कि संजय दत्त के तौर तरीके उन्हें पसंद नहीं आए। संजय दत्त का कहना था कि मुकुल आनंद ने उनके 70 दिन खराब कर दिए, वगैरह वगैरह। नागार्जुन के बाद ये रोल जैकी श्रॉफ, चंकी पांडे से होता हुआ अजय देवगन तक पहुंचा।

अजय देवगन भी किसी वजह से फिल्म का हिस्सा नहीं बन सके, इसे लेकर वह बहुत बरसों तक अपसेट भी रहे। कहा गया कि श्रीदेवी ने अजय देवगन के नाम पर एतराज जता दिया था। हालांकि श्रीदेवी ने सफाई दी थी कि उन्हें पता ही नही था कि इस रोल के लिए अजय देवगन का नाम भी चल रहा था। उन्होंने तो बस निर्माता और निर्देशक की मदद के लिए उनकी मुलाकात नागार्जुन से करवा दी थी। रामगोपाल वर्मा की शिवा तब तक रिलीज हो चुकी थी और नागार्जुन के प्रशंसक भी हिंदी पट्टी में काफी बन चुके थे। नागार्जुन को लेने से निर्माताओं को ये भी लगा कि इससे फिल्म दक्षिण में भी अच्छा कारोबार करेगी।

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