हिंदी सिनेमा में मरहूम गीतकार एवं उर्दू शायर नक्श लायलपुरी का नाम बहुत अदब से लिया जाता है। अपने करियर में 132 संगीत निर्देशकों के साथ काम करने वाले नक्श लायलपुरी का वास्तविक नाम जसवंत राय शर्मा था। साल 1928 में उनका जन्म पाकिस्तान के लायलपुर ;अब फैजलाबाद में हुआ था। 1947 में जब भारत का विभाजन हुआ तो वे परिवार के साथ भारत आ गए।
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डाक विभाग में काम करने के बाद ऐसे शुरू हुआ था नक्श लायलपुरी का फिल्मी सफर
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: अपूर्वा राय
Updated Tue, 22 Jan 2019 06:51 AM IST
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नक्श लायलपुरी
- फोटो : द हिंदू
हमने क्या पा लिया हिंदू या मुसलमां होकर
हिंदी सिनेमा में मरहूम गीतकार एवं उर्दू शायर नक्श लायलपुरी का नाम बहुत अदब से लिया जाता है। अपने करियर में 132 संगीत निर्देशकों के साथ काम करने वाले नक्श लायलपुरी का वास्तविक नाम जसवंत राय शर्मा था। साल 1928 में उनका जन्म पाकिस्तान के लायलपुर ;अब फैजलाबाद में हुआ था। 1947 में जब भारत का विभाजन हुआ तो वे परिवार के साथ भारत आ गए।
हिंदी सिनेमा में मरहूम गीतकार एवं उर्दू शायर नक्श लायलपुरी का नाम बहुत अदब से लिया जाता है। अपने करियर में 132 संगीत निर्देशकों के साथ काम करने वाले नक्श लायलपुरी का वास्तविक नाम जसवंत राय शर्मा था। साल 1928 में उनका जन्म पाकिस्तान के लायलपुर ;अब फैजलाबाद में हुआ था। 1947 में जब भारत का विभाजन हुआ तो वे परिवार के साथ भारत आ गए।
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नक्श लायलपुरी
- फोटो : हिंदुस्तान टाइम्स
शरणार्थियों के एक काफिले के साथ पैदल सफर करते हुए वे लखनऊ पहुंचे। विभाजन के दर्द को उन्होंने अपनी आंखों से देखा और यह उनकी शायरी में बखूबी नजर भी आया। उन्होंने लिखा, 'हम ने क्या पा लिया हिंदू या मुसलमां होकर, क्यूं न इंसां से मोहब्बत करें इंसां होकर'। कहा जाता है कि साहित्य में उनकी दिलचस्पी उनके स्कूल के दिनों में ही दिख गई थी, जब उनकी स्कूल की टीचर साल के अंत में उनकी कॉपी इसलिए खरीदती थीं,क्योंकि उनमें उनकी कविताएं लिखी होती थीं।
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नक्श लायलपुरी
- फोटो : एनबीटी
रोजगार की चाहत में नक्श मुंबई पहुंचे। अपने संघर्ष के शुरुआती दिनों में उन्होंने दैनिक जरूरतें पूरी करने के लिए कुछ समय डाक विभाग में भी काम किया। फिर एक दिन किसी ने उन्हें फिल्मकार जगदीश सेठी से मिलवाया और यूं फिल्म इंडस्ट्री में उनका सफर चल पड़ा। उन्हें गीतकार के रूप में पहला मौका 1952 में मिला, लेकिन 1970 के दशक के प्रारंभ तक उन्हें खास सफलता नहीं मिल पाई। बाद में उन्होंने कई शीर्ष फिल्म निर्देशकों, संगीत निर्देशकों और गायकों के साथ काम किया और सुमधुर, रूमानी और भावनात्मक गीत लिखेए जो लाखों दिलों को छू गए।
नक़्श लायलपुरी
- फोटो : file photo
लायलपुरी के लिखे कुछ सर्वश्रेष्ठ गीतों में 'मैं तो हर मोड़ पर जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया, उल्फत में जमाने की हर रस्म को ठुकरा और दो दीवाने शहर में शामिल हैं।' अपने करियर में उन्होंने 132 संगीत निर्देशकों के साथ काम किया था। बाद के दिनों में गीतों में सतही बातें शामिल करने की मांग से दुखी लायलपुरी ने 1990 के दशक में बॉलीवुड से संन्यास ले लिया और टेलीविजन के लिए गीत लिखने लगे। उन्होंने 2005-06 में संक्षिप्त समय के लिए फिल्मों में वापसी की थी और नौशाद के साथ ताजमहल और खय्याम के साथ यात्रा जैसी फिल्मों के लिए गीत लिखे थे।
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नक्श लायलपुरी
- फोटो : file photo
नक्श लायलपुरी कहते थे कि गीतकार के रूप में उन्हें बुलंदी बीआर इशारा की फिल्म श्चेतना से मिली और उसमें उनकी नज्म मैं तो हर मोड़ पर तुमको दूंगा सदा को अधिक सराहा गया। नक्श लायलपुरी ने काफी अरसा मुंबई के ओशिवारा में एक गुमनाम जिंदगी के तौर पर बिताया। मौत से कुछ समय पहले उनके फिल्मी गीतों का एक संकलन आया-आंगन-आंगन बरसे गीत। यह किताब उर्दू में है। इसे हिंदी में भी रूपांतरित किया गया है। 22 जनवरी 2017 को वह दुनिया से ओझल हो गएए लेकिन अपनी खूबसूरत शायरी और दिलकश गीतों के रूप में वे आज भी हमारे बीच मौजूद हैं।
