निर्देशक अमित शर्मा की फिल्म ‘मैदान’ के बाद अब निर्देशक हरीश शर्मा ने भी एक फुटबॉल कोच की जिंदगी के बारे में दुनिया को बताने की ठानी है। अमित की फिल्म 1952 से 1962 के बीच भारतीय फुटबॉल को बुलंदियों पर ले जाने वाले सैयद अब्दुल रहीम की कहानी कहती हैं, वहीं हरीश शर्मा की फिल्म के हीरो हैं भैरव दत्त, जिन्हें गरीब बच्चे फुटबॉल का मसीहा कहते हैं। और, ऐसा इसलिए क्योंकि उनकी फुटबॉल की पाठशाला में फुटबॉल सीखने आने वाले बच्चों में कोई रेहड़ी लगाता है, कोई फुटपाथ पर सब्जी बेचता है तो कोई कुछ और काम..।
Maidaan 2.0: ‘अमर उजाला’ की खबर से शुरू हुई फिल्म, फुटबॉल कोच भैरव दत्त की कहानी अब दुनिया घूमेगी
निर्देशक हरीश शर्मा ने भी एक फुटबॉल कोच की जिंदगी के बारे में दुनिया को बताने की ठानी है। हरीश शर्मा की फिल्म के हीरो हैं भैरव दत्त, जिन्हें गरीब बच्चे फुटबॉल का मसीहा कहते हैं।
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वाराणसी के डीएलडब्ल्यू के बरेका फुटबॉल मैदान में ये कहानी रोज कही जाती है। यहां फुटबॉल कोच भैरव दत्त पिछले 15 वर्षों से गरीब बच्चों का भविष्य संवारने में जुटे है। तमाम लड़के, लड़कियों को उन्होंने राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बना दिया। यहां फुटबॉल खेलने की एक ही शर्त है पढ़ाई करोगे तो खेलने को मिलेगा। भैरव दत्त की फुटबॉल नर्सरी में किसी भी बच्चे से फीस नहीं ली जाती है और एडमिशन होता है सात-आठ साल की उस मासूम उम्र में जब बच्चे पहली कक्षा में जाने की तैयारी कर सकते हैं।
भैरव दत्त बताते हैं, “मैं इतने छोटे बच्चों को इसलिए लेता हूं कि उन्हें अपने हिसाब से गढ़ सकूं। 12वीं कक्षा से पहले सभी परिपक्व खिलाड़ी बन जाते है मेरा काम उन्हें मार्ग दिखाना होता है चलना उन्हें ही है। मैं इन्हें स्पोर्ट्स किट देता हूं, जूते देता हूं। कई बार मैंने देखा कि बच्ची के जूते फटे हैं। मैं पैसे देता हूं तो उस गांव के सभी बच्चे एक जोड़ी जूते खरीदने के जश्न में शामिल होते है।”
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अपने फुटबॉल के जुनून का जिक्र चलने पर वह कहते हैं, “1970-72 की बात होगी पिथौरागढ़ के चंडाक के पास के गांव में मैं कपड़ों की लुगदी से बनी गेंद से खेलता था। नंगे पैर दौड़ना। 10-12 किलोमीटर पहाड़ पर दौड़ना रोज की बात थी। एक दिन ऐसी ही दौड़ के दौरान देखा कि एक जगह बहुत भीड़ थी। स्पोर्ट्स कॉलेज लखनऊ के फॉर्म मिल रहे थे। ट्रायल देने लखनऊ के स्टेडियम में पहुंचे। बहुत मुश्किल से यहां टिक पाए। खेल अच्छा था तो फीस भी माफ हो गई। सात बार लगातार सीनियर संतोष ट्रॉफी खेली। कप्तान भी रहा, कोच भी बना, रुहेलखंड यूनिवर्सिटी में खेला। नेशनल खेला, महिला पुरुष टीमों का कोच, मैनेजर रहा, रैफरी भी रहा। जूनियर, सीनियर फुटबॉल टीमों का चयनकर्ता भी रहा कई बार।”
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भैरव दत्त पर फिल्म बना रहे निर्देशक हरीश शर्मा कहते हैं, “कुछ समय पहले ‘अमर उजाला’ अखबार में खबर छपी जिसकी हेडिंग थी, पहाड़ी में बसा छोटा सा ब्राजील। पता चला ये तो अपने भैरव दा की खबर है। उसी दिन निश्चित कर लिया उन पर डॉक्यूमेंट्री बनानी है। पहाड़ी दरअसल वाराणसी के उस गांव का नाम है जहां डीएलडब्ल्यू के बरेका इण्टर स्कूल में भैरव दा फुटबॉल नर्सरी चलाते हैं। मेरी ये फिल्म करीब करीब पूरी हो चुकी है। जल्द ही हम इसका प्रिव्यू आयोजित करेंगे और इसे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में ले जाएंगे।”