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नेहरू की मुखालिफत में इस गीतकार ने काटी जेल, बाद में भारत सरकार से मिला दादा साहब फाल्के पुरस्कार
Fri, 24 May 2019 12:33 PM IST
भावना शर्मा
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: भावना शर्मा
Updated Fri, 24 May 2019 12:33 PM IST
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majrooh sultanpuri
- फोटो : social media
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एक शायर जिसने कभी फिल्मों के लिए काम करने के लिए सोचा ही नहीं और जब काम करना शुरू किया तो हिंदी संगीत का एक अलग इतिहास रच डाला। हम बात कर रहे हैं हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध गीतकार, शायर और कवि मजरूह सुल्तानपुरी की। हिंदी सिनेमा की सबसे मजबूत शख्सीयत में गिने जाने वाले मजरूह सुल्तानपुरी ने अपनी रचनाओं से लगभग चार दशक तक लोगो के दिलों पर राज किया। आज उनकी पुण्यतिथि है। मजरूह सुल्तानपुरी की 19वीं पुण्यतिथि पर आइए जानते है उनके बारे में 10 रोचक तथ्य।
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सुल्तानपुर के नहीं फिर भी सुल्तानपुरी
गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी का असली नाम असरार अल हसन खान है। मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के निजामाबाद गांव में हुआ। उनके अब्बा पुलिस महकमे में काम करते थे। बाद में मजरूह सुल्तानपुरी सुल्तानपुर में आकर मुशायरे करने लगे और इसके बाद उन्होने अपने नाम के आगे सुल्तानपुरी जोड़ लिया। तब से लोग इन्हें मजरूह सुल्तानपुरी के नाम से जानने लगे।
गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी का असली नाम असरार अल हसन खान है। मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के निजामाबाद गांव में हुआ। उनके अब्बा पुलिस महकमे में काम करते थे। बाद में मजरूह सुल्तानपुरी सुल्तानपुर में आकर मुशायरे करने लगे और इसके बाद उन्होने अपने नाम के आगे सुल्तानपुरी जोड़ लिया। तब से लोग इन्हें मजरूह सुल्तानपुरी के नाम से जानने लगे।
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पेशे से हकीम
मजरूह सुल्तानपुरी के अब्बा नहीं चाहते थे कि उनका बेटा अंग्रेजी सीखे, इसलिए उन्हें मदरसे में भेज दिया गया। यहां उन्होंने अरबी और फारसी जबान सीखी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से आलिम बनने के बाद वह लखनऊ पहुंचे यहां उन्होंने यूनानी चिकित्सा पद्धति सीखी और हकीम बन गए। एक दिन इस असफल हकीम की किस्मत ने करवट ली और वह सुल्तानपुर के एक मुशायरे में अपनी गजल सुना बैठे। यही से इनके नए सफर की शुरुआत हुई।
मजरूह सुल्तानपुरी के अब्बा नहीं चाहते थे कि उनका बेटा अंग्रेजी सीखे, इसलिए उन्हें मदरसे में भेज दिया गया। यहां उन्होंने अरबी और फारसी जबान सीखी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से आलिम बनने के बाद वह लखनऊ पहुंचे यहां उन्होंने यूनानी चिकित्सा पद्धति सीखी और हकीम बन गए। एक दिन इस असफल हकीम की किस्मत ने करवट ली और वह सुल्तानपुर के एक मुशायरे में अपनी गजल सुना बैठे। यही से इनके नए सफर की शुरुआत हुई।
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पहला गाना
सुल्तानपुर में मुशायरों की सफलता से प्रभावित होकर मजरूह ने मुशायरों में आमद बढ़ा दी और 20वीं सदी के सबसे सफल उर्दू कवि और शायर जिगर मुरादाबादी के साथ बड़े शहरों में भी पैठ बनाना शुरू कर दिया। 1945 में मजरूह एक मुशायरे के लिए मुंबई आए। लोगों ने उनकी गजलों और नज्मों को खूब पसंद किया। इन सुनने वालों में फिल्म निर्माता ए आर कारदार भी थे। मजरूह के मिसरे सुनकर कारदार उनके गुरु जिगर मुरादाबादी के पास पहुंच गए और फिल्मों के लिए गीत लिखने की सिफारिश करने को कहा। लेकिन मजरूह ने फिल्मों के लिए गीत लिखने से मना कर दिया, उस वक्त अदबी तबके में इस तरह के काम को हल्का माना जाता था। फिर बहुत समझाने पर मजरूह माने और कारदार की फिल्म 'शाहजहां' के लिए लिखा, 'जब उसने गेसू बिखराए, बादल आए झूम के'
सुल्तानपुर में मुशायरों की सफलता से प्रभावित होकर मजरूह ने मुशायरों में आमद बढ़ा दी और 20वीं सदी के सबसे सफल उर्दू कवि और शायर जिगर मुरादाबादी के साथ बड़े शहरों में भी पैठ बनाना शुरू कर दिया। 1945 में मजरूह एक मुशायरे के लिए मुंबई आए। लोगों ने उनकी गजलों और नज्मों को खूब पसंद किया। इन सुनने वालों में फिल्म निर्माता ए आर कारदार भी थे। मजरूह के मिसरे सुनकर कारदार उनके गुरु जिगर मुरादाबादी के पास पहुंच गए और फिल्मों के लिए गीत लिखने की सिफारिश करने को कहा। लेकिन मजरूह ने फिल्मों के लिए गीत लिखने से मना कर दिया, उस वक्त अदबी तबके में इस तरह के काम को हल्का माना जाता था। फिर बहुत समझाने पर मजरूह माने और कारदार की फिल्म 'शाहजहां' के लिए लिखा, 'जब उसने गेसू बिखराए, बादल आए झूम के'
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फाल्के पुरस्कार पाने वाले पहले गीतकार
मजरूह सुल्तानपुरी भारत सरकार से मिलने वाले हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े पुरस्कार दादा साहब फाल्के पुरस्कार पाने वाले पहले गीतकार थे। वर्ष 1993 में मजरूह सुल्तानपुरी को दादा साहब फाल्के अवॉर्ड दिया गया। 50 और 60 के दशक में फैज अहमद फैज के साथ मजरूह गजल गायिकी में शीर्ष पर थे। मजरूह सुल्तानपुरी को 1964 में आई फिल्म दोस्ती के गाने 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे' गाने के लिए फिल्मफेयर बेस्ट लिरिसिस्ट के खिताब से भी नवाजा गया। इसके अलावा उन्हें 1980 में गालिब अवॉर्ड और 1992 में इकबाल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
मजरूह सुल्तानपुरी भारत सरकार से मिलने वाले हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े पुरस्कार दादा साहब फाल्के पुरस्कार पाने वाले पहले गीतकार थे। वर्ष 1993 में मजरूह सुल्तानपुरी को दादा साहब फाल्के अवॉर्ड दिया गया। 50 और 60 के दशक में फैज अहमद फैज के साथ मजरूह गजल गायिकी में शीर्ष पर थे। मजरूह सुल्तानपुरी को 1964 में आई फिल्म दोस्ती के गाने 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे' गाने के लिए फिल्मफेयर बेस्ट लिरिसिस्ट के खिताब से भी नवाजा गया। इसके अलावा उन्हें 1980 में गालिब अवॉर्ड और 1992 में इकबाल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।