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बाइस्कोप: टीना मुनीम, देव आनंद की फिल्म में बासु चटर्जी ने महमूद पर फिल्मा दिया ये आइटम गाना, फिर...

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Thu, 11 Jun 2020 08:44 PM IST
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man pasand this day that year series by pankaj shukla 9 june 2000 bioscope basu Chatterjee dev anand
मन पसंद - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला

साल 1980 हिंदी सिनेमा का वो साल है जब इसमें काम करने वाले फिल्ममेकर्स समझ नहीं पा रहे थे कि इसकी दशा और दिशा आने वाले समय में क्या होगी। फिल्में सिनेमाघरों तक पहुंचने से पहले वीएचएस के जरिए घर घर पहुंच जा रही थीं और शोले जैसी कालजयी फिल्म बनाने वाले निर्देशक रमेश सिप्पी की फिल्म शान रिलीज के पहले वीकएंड में ही फ्लॉप हो जा रही थी। राज खोसला अमिताभ बच्चन के साथ दोस्ताना से लेकर ऋषि कपूर के साथ दो प्रेमी तक में बिजी थे और प्रकाश मेहरा बना रहे थे देश द्रोही और ज्वालामुखी जैसी फिल्में जबकि उनके असिस्टेंट रहे राकेश कुमार अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना के साथ दो और दो पांच बना रहे थे। जे ओमप्रकाश की आशा समेत टी रामाराव की जुदाई, दासरी नारायण राव की ज्योति बने ज्वाला, के राघवेंद्र राव की निशाना और के बापैया की टक्कर में जीतेंद्र अपनी अलग ही दुनिया बसाना शुरू कर चुके थे।



इस साल गोविंद निहलानी ने आक्रोश, अनिल गांगुली ने सिंगर शैलेंद्र सिंह और रेखा के साथ एग्रीमेंट, सईद मिर्जा ने अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है, मणि कौल ने सतह से उठता आदमी, विनोद पांडे ने एक बार फिर, सई परांजपे ने स्पर्श और बासु चटर्जी ने अपने पराए और मन पसंद जैसी फिल्में बनाईं। निर्देशक के तौर पर इसी साल गायक किशोर कुमार की फिल्म दूर वादियों में कहीं, असरानी निर्देशित फिल्म हम नहीं सुधरेंगे और डैनी निर्देशित फिर वही रात भी रिलीज हुईं। बापू तब हम पांच और बी आर चोपड़ा इंसाफ का तराजू बना रहे थे और सुभाष घई की शोमैनगिरी पुनर्जन्म की कहानी कर्ज में भी खूब पैसे बटोर रही थी। आर्ट और कमर्शियल फिल्मों की इस समानांतर चलती पटरियों के बीच की दो फिल्में इस साल गौर करने लायक रही हैं, पहली ऋषिकेश मुखर्जी की रेखा के साथ बनी फिल्म खूबसूरत और दूसरी देव आनंद के साथ बनी बासु चटर्जी की फिल्म मनपसंद।


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मनपसंद - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

अशोक कुमार से लेकर किम तक के इस साल में टीना मुनीम जिस फिल्म मन पसंद में ट्रेन में दातुन बेचती नजर आईं, वह फिल्म मनपसंद ही हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है। बासु चटर्जी को अमोल पालेकर के साथ तीन हिट फिल्में बनाने के साथ ही ये समझ आ गया था कि फिल्म में जब तक मौजूदा दौर का बड़ा सितारा न हो, फिल्म बेचने में बहुत दिक्कत आती है। जीतेंद्र, धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी, जया बच्चन, मिथुन चक्रवर्ती, संजीव कुमार से होते हुए वह वापस अपने चितचोर यानी अमोल पालेकर के पास बातों बातों में पहुंचे तो लेकिन इतने लंबे समय तक फिल्म बनाने के बावजूद बासु चटर्जी की गिनती ऐसे फिल्मकार के रूप में होती रही जो या तो किसी मशहूर कहानी पर फिल्म बनाते हैं या फिर किसी चर्चित फिल्म की रीमेक। और, यही पहचान उनकी फिल्म मनपसंद में भी कायम रही।

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का 1912 का लिखा एक नाटक है पिगमैलिऑन। 1956 में आई फिल्म माई फेयर लेडी उसी पर आधारित है। बाद में मराठी के मशहूर लेखक पुरुषोत्तम लक्ष्मण देशपांडे ने शॉ के नाटक पर मराठी नाटक लिखा ती फुलराणी। बासु चटर्जी ने इसी नाटक पर बनाई फिल्म मन पसंद। पुराने फिल्म समीक्षक इंदर मोहन पन्नू बताते हैं कि एक जैसी इस कहानी पर उन दिनों हिंदी में मनपसंद और हम तेरे आशिक हैं दो फिल्में बनीं। इसके अलावा एक गुजराती नाटक संतू रंगीली भी इसी कहानी पर बना। मशहूर गीतकार अमित खन्ना की बतौर प्रोड्यूसर मन पसंद पहली फिल्म है। फिल्म का उनका लिखा एक गाना उन दिनों मशहूर हुआ, मैं अकेला अपनी धुन में मगन जिंदगी का मजा लिए जा रहा था...!

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मनपसंद - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

हफ्ता भर पहले ही गुजरे बासु चटर्जी के निधन पर लोगों ने उनकी याद में उनकी तमाम फिल्मों के नाम गिनाए और उन्हें समय से आगे का निर्देशक तक बताया। लेकिन, देश या विदेश में किसी फिल्म स्कूल के छात्र से उनके बारे में चर्चा कीजिए तो उसकी राय बासु चटर्जी के बारे में बहुत अच्छी नहीं मिलेगी। अपनी फिल्म एक रुका हुआ फैसला में उन्होंने जिस तरह एक अंग्रेजी फिल्म 12 एंग्री मेन का फ्रेम दर फ्रेम कॉपी कर दिया, उसने बासु चटर्जी की ब्रांडिंग को बड़ा नुकसान पहुंचाया। फिल्म मन पसंद में देव आनंद ने उन पर भरोसा किया और बासु चटर्जी के सामने चुनौती थी उन्हें एक ऐसे नायक के रूप में पेश करने की जो अपने दोस्त की चुनौती को स्वीकार कर किसी युवती के जीवन को बदलने की ठान लेता है।

फिल्म मनपसंद की कहानी शुरू होती है प्रताप की प्रयोगशाला में। जहां 57 साल के देवआनंद प्रताप के किरदार में अपने दोस्त काशीनाथ (गिरीश कर्नाड) को अपनी एक मशीन के बारे में बता रहे हैं। काशीनाथ और प्रताप के बीच एक पार्टी में शर्त लगती है कि अगर कोई ऐसी लड़की प्रताप ढूंढ सके जो गाती अच्छा हो और जिसकी सूरत सीरत भी अच्छी हो तो काशीनाथ उससे शादी कर लेगा। दोनों को ट्रेन में एक दातून बेचने वाली (टीना मुनीम) मिलती है जिसमें प्रताप को काशीनाथ की भविष्य की पत्नी नजर आने लगती है। वह उसे प्रशिक्षित करता है और इस प्रशिक्षण के तमाम उतार चढ़ावों पर ही फिल्म की पूरी कहानी आधारित है। फिल्म के क्लाइमेक्स में कहानी का असली ट्विस्ट है, और फिल्म वहीं आकर एक साधारण सी मुंबइया फिल्म में बदल जाती है। फिल्म में देव आनंद, गिरीश कर्नाड और टीना मुनीम से ज्यादा दमदार किरदार महमूद का लगता है, जो कमली के पिता के किरदार में हैं। फिल्म में बासु चटर्जी ने इन पर एक आइटम गाना भी फिल्माया जो गाया भी खुद महमूद ने ही है, किस्मत की जेब में अंगूठा नसीब का...


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मनपसंद - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

निर्देशक बासु चटर्जी को वैसे तो अपनी हर फिल्म की कास्टिंग के लिए बहुत तारीफ मिली है लेकिन फिल्म मनपसंद में उनका ये तिलिस्म भी टूट गया। बासु चटर्जी को उनके समय के और बाद के भी तमाम समीक्षकों ने मिडिल ऑफ द रोड सिनेमा यानी कमर्शियल और आर्ट सिनेमा के बीच का फिल्मकार बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन, असल में वह ऐसे आर्ट फिल्म डायरेक्टर थे जो कमर्शियल सिनेमा बनाने में अधिकतर फेल ही हुए। वह अपने जमाने के प्रकाश झा रहे। जिस तरह से प्रकाश झा ने हिप हिप हुर्रे, दामुल और मृत्युदंड की अपनी कमाई गंगाजल 2 और उससे पहले राजनीति, आरक्षण, चक्रव्यूह और सत्याग्रह जैसी फिल्मों में गंवा दी। उसी तरह बासु चटर्जी ने रजनीगंधा, छोटी सी बात और चितचोर की अपनी कमाई पसंद अपनी अपनी, एक रुका हुआ फैसला और चमेली की शादी जैसी फिल्मों में गंवा दी।

फिल्म मन पसंद में सिनेमा के विद्यार्थियों के लिए अगर कुछ सीखने लायक है तो वह है इसकी एडीटिंग। फिल्म एक सीन से होकर दूसरे सीन में तैरती सी चलती है। कहीं कोई जर्क नहीं। फिल्म में एडीटिंग का कमाल है बाबू शेख का जो देव आनंद के पसंदीदा फिल्म एडीटर रहे और उनकी तमाम फिल्में भी उन्होंने ही एडिट कीं। बाबू शेख की इस एडीटिंग के साथ साथ तारीफ फिल्म की पटकथा की भी करनी बनती है जो खुद बासु चटर्जी ने लिखी। संवाद भी फिल्म में उन्हीं के है लेकिन फिल्म में कहानी किसकी है ये फिल्म के ओपनिंग क्रेडिट्स से पता नहीं चलता। फिल्म की शुरूआत में बासु चटर्जी ने जॉर्ज बर्नाड शॉ को ये फिल्म समर्पित तो की है लेकिन ये नहीं बताया कि ये फिल्म उनके एक नाटक पर आधारित है। क्रेडिट्स में टीना मुनीम का नाम भी सिर्फ टीना ही लिखकर आता है। फिल्म में चूंकि प्रताप का मुख्य काम कमली को गायिकी में पारंगत करना है तो इसलिए फिल्म का एक गाना जोकि लिखा भी बहुत ही साहित्यिक तरीके से गया है, उसी अंदाज में बुना गया..



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मनपसंद - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्म मन पसंद की कमाई इतनी नहीं हुई कि इसकी गिनती उस साल सबसे ज्यादा कमाई करने वाली 25 फिल्मों में भी हो सकती। फिल्म के निर्माता अमित खन्ना ने बाद में बासु चटर्जी के साथ अनुपम खेर और प्रतिभा सिन्हा स्टारर गुदगुदी भी बनाई। बासु चटर्जी की फिल्म मनपसंद दरअसल उनकी अतिव्यस्तता का शिकार हुई एक ऐसी फिल्म है जो अपने प्लॉट और अपने दमदार एक्टर्स के चलते एक कालजयी फिल्म बन सकती थी। लेकिन अमोल पालेकर के साथ तीन सिल्वर जुबली फिल्में बनाने के बाद बासु चटर्जी जरूरत से ज्यादा व्यस्त हो गए।

साल 1979 में उनकी बतौर निर्देशक छह फिल्में रिलीज हुईं। इन फिल्मों में शामिल थीं, अमोल पालेकर और नवीन निश्चल की फिल्म दो लड़के दोनों कड़के, अमिताभ बच्चन और मौसमी चटर्जी की फिल्म मंजिल, राजेश खन्ना और नीतू सिंह की चक्रव्यूह, मिथुन चक्रवर्ती और बिंदिया गोस्वामी की प्रेम विवाह, गिरीश कर्नाड व हेमा मालिनी की फिल्म रतनदीप और अमोल पालेकर व टीना मुनीम की फिल्म बातों बातों में। मन पसंद के बॉक्स ऑफिस पर सफल न होने का बासु चटर्जी को अपने करियर में बड़ा नुकसान उठाना पड़ा, इसके बाद हिंदी सिनेमा के उस दौर के किसी ए लिस्टर कलाकार ने उनके साथ काम नहीं किया। मिथुन ने जरूर प्रेम विवाह में मौका देने का उनका एहसान फिल्म शौकीन में काम करके चुकाया। शौकीन ही उनके करियर की आखिरी हिट फिल्म रही। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल यानी 12 जून को बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।

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