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बड़े एक्टर्स के चुप्पी साधे रहने पर भड़के मनोज बाजेपेयी, बोले- 'ऋचा और स्वरा हैं सबसे बेबाक'

Sat, 29 Sep 2018 11:10 AM IST
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Updated Sat, 29 Sep 2018 11:10 AM IST
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manoj bajpai asked bollywood actors silent most of the issues

पिछले हफ्ते मंटो समय से रिलीज नहीं हुई और उसे बड़ा नुकसान हुआ। वितरकों और सिनेमाघर मालिकों के अनसुलझे तकनीकी मुद्दे इसका कारण बताए गए। फिर सवाल उठा कि क्या बॉलीवुड के दिग्गज स्टूडियो, वितरक, एक्जिबीटर नहीं चाहते कि इंडी फिल्में ढंग से रिलीज हों। स्वतंत्र निर्माता-निर्देशकों के लिए कंटेंट फिल्मों की रिलीज बड़ी चुनौती है। कितना संघर्ष है इसमें, जानिए इंडी फिल्मों का मुख्य चेहरा कहे जाने वाले मनोज बाजपेयी से...

manoj bajpai asked bollywood actors silent most of the issues

चाहे जुबैदा हो, गैंग्स ऑफ वासेपुर या अलीगढ़। इन फिल्मों को पहले का भी दर्शक देख सकता था और आज का देख रहा है। बॉक्स ऑफिस इन्हें सही जगह नहीं देता कि ज्यादा दर्शक देखने आएं। जब दर्शक को ऐसी फिल्में दिखाएंगे नहीं तो उनके बारे में पता कैसे चलेगा। यही दर्शक है जो चौदहवीं का चांद और दिल दिया दर्द लिया देखता था। यही यहूदी,प्यासा, कागज के फूल और गाइड देखता था। इस हिसाब से मापें तो पुराने जमाने का दर्शक आज के दर्शक से ज्यादा संजीदा था। दर्शक ये फिल्में देखेगा। बशर्ते आप दिखाएंगे लेकिन हमारे जो तथाकथित सिनेमा और बॉक्स ऑफिस के जानकार मानते हैं कि दर्शकों की सोच संकुचित है कि वह मसाला फिल्में ही देखेगा तो असल में वह अपनी संकुचित सोच के बारे में बता रहे होते हैं।

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मैं नहीं मानता कि बॉक्स ऑफिस फिल्म की क्वालिटी का निर्णय करता है। बॉक्स ऑफिस फिल्म की रेटिंग निर्धारित नहीं कर सकता। अगर मेरी प्रोड्यूस की हुई मिसिंग में खराबी थी तो वह अमेजन डिटिजल प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड क्यों कर रही है। लोग उसे ज्यादा से ज्यादा क्यों देख रहे हैं। इसका मतलब है कि हमारे डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम में कमी है। ऐसी फिल्मों को स्क्रीन्स नहीं मिलते। इन्हें एक्जिबीटर्स टिकने नहीं देते। इनके निर्माताओं को परेशान किया जाता है। यह भी समस्या है कि आज रिलीज करने के खर्च भी बढ़े हैं। बुधिया सिंह, मिसिंग या गली गुलियां मुझे लगता है कि बेहतरीन फिल्में हैं और इनमें मेरी बेहतरीन परफॉर्मेंस हैं। सबने मीडिया में यह लिखा लेकिन इन फिल्म को सही डिस्ट्रीब्यूशन नहीं मिलता है तो आप बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के नाम पर फिल्म की क्वालिटी पर सवाल नहीं उठा सकते।

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मैं अपनी फिल्मों की स्टोरी राइटिंग से लेकर मेकिंग तक हमेशा जुड़ा रहता हूं। मैं देखता रहा हूं कि एक माफिया है यहां। जिस पर कोई लगाम ही नहीं है। लगाम नहीं है क्योंकि हमारे पास देश में फिल्मों के लिए कोई प्रॉपर पॉलिसी नहीं है। देश में आजादी के बाद से आज तक कोई भी सरकार रही हो उन्होंने इंडस्ट्री के कई मुद्दों पर काम नहीं किया। उनमें इन छोटी इंडी फिल्मों के सर्वाइवल का मामला भी है।

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हमारी इंडस्ट्री के लोगों का आलम भी यह है कि वह किसी मुद्दे पर कुछ नहीं बोलते हैं। हमारे यहां बस ऋचा चड्ढा और स्वरा भास्कर जैसी दो-चार महिलाएं हैं जो सबसे ज्यादा बोलती हैं। वे हर मुद्दे पर अपनी बात रखती हैं। इंडस्ट्री के लोगों के चुप रहने पर मैं क्या बोलूं। एक दौर था जब इंडी फिल्में देखने के लिए मैं दस-दस किलोमीटर भी बस से गया हूं दिल्ली में। परंतु आज मल्टीप्लेक्स आ गए हैं, नए सिनेमाघर आ गए हैं। क्या चीजें बदलीं, नहीं बदलीं। हम चाहे जितना चिल्लाते रहें। इतना जरूर है कि आप पाएंगे मनोज बाजपेयी इन हालात में भी ऐसी फिल्में करता रहेगा। यह मेरी जिद है। जुनून है। ऐसी फिल्मों और कहानियों पर लेकिन इस पूरे सिस्टम को या कहें यह जो केकड़ा जाल है, इसे हटाएगा कौन। मैं सालों से बोल रहा हूं परंतु आज तक कुछ नहीं हुआ।

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