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Simran Movie Review: बैंक में डाका डालती है 'सिमरन', जेब पर ना डाल दे

रवि बुले Updated Fri, 15 Sep 2017 08:39 PM IST
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simran movie review of kangana ranaut
Simran, Kangana Ranaut
-निर्माताः भूषण कुमार-शैलेष आर. सिंह

-निर्देशकः हंसल मेहता
-सितारेः कंगना रनौत
 रेटिंग **

निर्देशक हंसल मेहता ने कुछ साल पहले खबर पढ़ी कि अमेरिका में भारतीय मूल की एक युवती जुए की लत की वजह से बैंकों में डकैती डालने लगी। पकड़े जाने पर उसे दस साल जेल की सजा हुई। उन्होंने राइटर अपूर्व असरानी से इस पर डार्क थ्रिलर लिखवाई। कंगना रनौत को उन्होंने हीरोइन चुना तो कंगना ने थ्रिलर को कॉमेडी बनवा दिया। कहते हैं कि एक मिठाई को जब बहुत सारे हलवाई मिलकर बनाते हैं तो वह खाने लायक नहीं रह जाती।
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Simran, Kangana Ranaut

सिमरन भी इतने सारे दिमागों के मिलने से दही हो गई। मजे की बात यह कि यहां दृश्य थ्रिलर का आभास देते हैं और चार्ली चैपलिननुमा फिल्मों वाला बैकग्राउंड संगीत उन्हें कॉमेडी बनाने का प्रयास करता है। उस पर चेहरे की ऊल जुलूल भाव-भंगिमाओं से कंगना कथित हास्य सीन को हास्यास्पद बना देती हैं। हंसल को अपराध कथा बनानी थी तो अमेरिका जाने की जरूरत नहीं थी। इस देश में ही रोंगटे खड़े करने वाले अपराध हो रहे हैं। फिल्म का नाम सिमरन की जगह प्रफुल्ल भी होता तो यह ऐसी ही बनती। 

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simran kangana

नाम में क्या रखा है? सिमरन (कंगना) अमेरिका में बागी टाइप की तलाकशुदा गुजराती महिला है, जो माता-पिता के घर में रह रही है। वह होटल में हाउसकीपिंग की नौकरी करते हुए अपना फ्लैट खरीदना चाहती है। पैसे जोड़ती है। एक सहेली उसे अपनी शादी से पहले लास वेगास ले जाती है और प्रफुल्ल जुए के जंजाल में फंस जाती है। वह पहले जीतती और फिर हारती है। जोड़ा हुआ पैसा खो देती है। फिर कुछ अपराधियों से पैसे उधार लेकर कर्जदार बन जाती है। अपराधी धन वापस चाहते हैं और पैसा लौटाने के लिए प्रफुल्ल बैंक लूटने लगती है।

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सिमरन

हंसल ने अमेरिका में बैंक लूटना हंसी खेल बताया है। जैकेट की जेब में दोनों हाथ डाल कर कहा कि मेरे पास बम है और घबराया कैशियर सारा धन सामने रख देता है!! सिक्योरिटी जीरो है। एक के बाद एक बैंक लूटे जाते हैं और पुलिस सिर्फ टीवी पर दिखती है। यह असली कॉमेडी है। प्रफुल्ल के माता-पिता उसकी शादी के लिए लड़का ढूंढते हैं। यह पूरा प्रसंग कहानी में कुछ नहीं जोड़ता। अंत और भी गया गुजरा है। फिल्म कंगना के इर्द-गिर्द है। उन्हें एडिशनल स्टोरी और डायलॉग का क्रेडिट मिला है। न कहानी/दृश्य असर छोड़ते हैं और न संवादों में दम है। 

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कंगना रनौत

संदेह नहीं कि कंगना अच्छी अभिनेत्री हैं और कई कॉमिक दृश्यों को सहजता से निभा गई हैं। उनके किरदार की टोन शुरू से अंत तक सटीक है। इसके बावजूद कहानी का पूरा ढांचा कमजोर है और कंगना के सशक्त अभिनय से भी उसे मजबूती नहीं मिलती। कई दृश्यों में फिल्म तीसरे दर्जे के अमेरिकी यूरोपीय-सिनेमा की तरह है। हंसल के निर्देशन में वह पकड़ नहीं जो शाहिद और अलीगढ़ में मिलती है। आप कंगना के पक्के फैन हैं और उनकी हर अदा से खुश होते हैं तभी फिल्म देख सकते हैं। गीत संगीत कैमरा सामान्य है।

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