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Movie Review: एक्शन-रोमांस नहीं, जेल की जिंदगी के लिए देखें 'लखनऊ सेंट्रल'

Fri, 15 Sep 2017 12:19 PM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Fri, 15 Sep 2017 12:19 PM IST
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lucknow central movie review of farhan akhtar, diana penty, deepak dobriyal
लखनऊ सेंट्रल

-निर्माताः निखिल आडवाणी


-निर्देशकः रंजीत तिवारी
-सितारेः फरहान अख्तर, दीपक डोबरियाल, इमानुल हक, राजेश शर्मा, गिप्पी ग्रेवाल, डायना पेंटी, रोनित रॉय
रेटिंग *1/2

जब लखनऊ के सेंट्रल जेल में बंद कुछ कैदियों को बैंड बना कर 15 अगस्त पर परफॉर्म करने का मौका मिलता है तो वे उसकी आड़ में भागने का प्लान बनाते हैं। यह इस फिल्म की तरह ही फ्लॉप आइडिया साबित होता है। कहानी में यहां कोई दम नहीं है। कुछ नयापन नहीं है।

इसका एंटरटेनमेंट राइटरों और डायरेक्टर के दिमाग में ही कैद हो कर रह गया। वह उसे पर्दे पर नहीं उतार सके। फिल्म में एक्शन, रोमांस और कॉमेडी शून्य प्रतिशत है। रोमांच भी यहां नहीं है। रहा क्या? जेल की जिंदगी। मगर वह भी भयावहता का एहसास नहीं कराती। ऐसे में लखनऊ सेंट्रल देखने की कोई ठोस वजह सामने नहीं आती।

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लखनऊ सेंट्रल

फिल्म बेहद सपाट है। मुरादाबाद का रहने वाला किसन मोहन गिरहोत्रा (फरहान अख्तर) लोकल सिंगर है और अपना बैंड बनाना चाहता है। छोटे शहरों में भी बड़े सपने देखे जा सकते हैं मगर किसन को हत्या के एक झूठे मामले में जेल हो जाती है। आजीवन कारावास मिलता है लेकिन सामने वाली पार्टी सजा-ए-मौत की मांग करती है।

किसन को लखनऊ के सेंट्रल जेल भेज दिया जाता है। किसन एनजीओ एक्टिविस्ट गायत्री (डायना पेंटी) की मदद से अन्य कैदियों को लेकर बैंड बनाना चाहता है। जेल तोड़ने के प्लान के साथ। फिल्म दूसरे हिस्से के कुछेक मिनटों को छोड़ कर बहुत बोर करती है।

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लखनऊ सेंट्रल

फरहान-डायना सपाट चेहरों और तेल से चिपचिपे सिर के बालों के साथ खराब ऐक्टिंग करते हैं। दोनों न किरदारों में उतर पाते हैं और न संवाद ढंग से बोलते हैं। इनकी खराबी ढंकने में दीपक डोबरियाल, इमानुल हक, राजेश शर्मा और गिप्पी ग्रेवाल थोड़ी मदद कर पाते हैं, जो कभी बहुत नहीं हो पाती। ये चारों उन कैदियों के रोल में हैं जो किसन के बैंड में शामिल हैं। यहां फिल्म-जेलों के पुराने फार्मूले हैं। सख्त-खूंखार जेलर, अंदर की गैंगबाजी, आपसी झगड़े-मारपीट, जेल में सुरंग बनाने की कोशिश। 

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लखनऊ सेंट्रल

लखनऊ सेंट्रल बैंड और संगीत की बात करती है पर एक भी गाना ढंग का नहीं है। इसके गीत-संगीत से ज्यादा आप यूट्यूब पर ढिनचिक पूजा के गानों में मजा ले सकते हैं। लखनऊ सेंट्रल एक पश्चिमी विद्वान के हवाले से कहती है कि किसी को न्याय नहीं मिलता, बस आपका भाग्य अच्छा या बुरा होता है। परंतु आप पाते हैं कि अंत में झूठा गवाह सच उगल देता है, पुलिस को ऐसे साक्ष्य नहीं मिलते कि किशन ने हत्या की।

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लखनऊ सेंट्रल

आखिरकार न्याय होता है। किशन बरी होता है। स्क्रिप्ट और संवाद बेहद कमजोर हैं। निर्देशक रंजीत तिवारी की यह पहली फिल्म है और वह प्रभाव नहीं छोड़ते। कुछ दिनों पहले लगभग इसी कथानक पर यशराज फिल्म्स की नए कलाकारों वाली फिल्म कैदी बैंड आई थी, जो सुपर-डुपर फ्लॉप रही। बेहतर होगा कि आप लखनऊ सेंट्रल के बजाय कुछ और प्लान करें।

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