निर्माताः किरण श्रॉफ/अश्मित कुंदेर
निर्देशकः कुषाण नंदी
सितारेः नवाजुद्दीन सिद्दिकी, बिदिता बाग, जतिन गोस्वामी, भगवान तिवारी, दिव्या दत्ता, श्रद्धा दास,अनिल जॉर्ज
रेटिंग: **
'बाबूमोशाय बंदूकबाज' कोई जैंटलमैन नहीं है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी के अलावा फिल्म में ऐसी बात नहीं कि आप उसके साथ चलने की सोचें। फिल्म के किरदार उत्तर प्रदेश के किसी जंगलराज वाले हिस्से में है क्योंकि बाबू बिहारी और उससे हत्याएं करने वाले बेधड़क खून-खराबा करते हैं।
2 of 7
'बाबूमोशाय बंदूकबाज' फिल्म रिव्यू
इस स्थानीय राजनीति में दो धड़े हैं, जीजी और दुबे (दिव्या दत्ता/अनिल जॉर्ज)। एक-दूसरे के लोगों को खत्म करना उनका लक्ष्य है। बाबू के लिए सब बराबर हैं। वह निःसंकोच हत्याएं करता है। उसका मानना है कि वह यमराज का एजेंट है। दस साल की उम्र में दो केलों के लिए उसने हत्या की थी और तब से लोगों को नीचे से ऊपर डिलिवर करना उसका पेशा है।
पढ़ें: नवाज का बेटा बना कृष्ण, खुद नहीं बन पाए थे राम-लीला का हिस्सा
3 of 7
'बाबूमोशाय बंदूकबाज' फिल्म रिव्यू
फिल्म बढ़ती है और थोड़े ही समय में उसे टक्कर देने के लिए एक और बंदूकबाज बांके बिहारी (जतिन गोस्वामी) आता है। वह बाबू को गुरु मानता है। जैसे एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं, वैसे एक इलाके में दो शूटर कैसे रह सकते हैं?
4 of 7
'बाबूमोशाय' बंदूकबाज फिल्म रिव्यू
हत्याओं से भरी फिल्म में यौन उत्तेजना का तड़का लगाने के लिए फुलवा (बेदिता बाग) है। गैंपरेप का शिकार फुलवा तब बाबू की हो जाती है जब वह बलात्कारियों को गोली मार देता है। लेकिन बांके की एंट्री फुलवा के दिल और कहानी में ट्विस्ट पैदा करती है।
पढ़ें: जब अचानक 'रेड लाइट एरिया' पहुंच गए नवाजुद्दीन सिद्दीकी
5 of 7
'बाबूमोशाय' बंदूकबाज फिल्म रिव्यू
फिल्म कोई ठोस बात नहीं करती। स्थानीय माफिया/हत्यारों की कहानियां पहले भी पर्दे पर आई हैं। 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' की परंपरा को आगे बढ़ाते 'बाबूमोशाय बंदूकबाज' के निशाने में वह बात नहीं है। न ही खास नयापन। सारे किरदार नकारात्मक हैं।