77 साल के अमिताभ बच्चन जिस फिल्म को याद करते हुए ये लिखें कि जीवन में विनम्र होना जरूरी है लेकिन लाइफ में थोड़ी ‘तड़ी’ तो होनी चाहिए। तो समझ सकते हैं कि आज से 41 साल पहले उनकी क्या तड़ी रही होगी, मुंबई में ताड़देव से लेकर जुहू तक। हुआ कुछ यूं था कि मशहूर निर्माता टीटो अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र को लेकर एक फिल्म बना रहे थे, राम बलराम। निर्देशक थे विजय आनंद जो एक और फिल्म धर्मेंद्र के साथ राजपूत भी उन्हीं दिनों बना रहे थे। धर्मेंद्र की तारीखों का कुछ पंगा हुआ और फिल्म राम बलराम की शूटिंग तीन महीने के लिए आगे खिसक गई।
बाइस्कोप: तीन महीने में निर्माता ने ऐसे बना दी मि. नटवरलाल, आनंद बख्शी ने बनाया मिस्टर बच्चन को गायक
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अमिताभ बच्चन ने जब राकेश कुमार से सवाल किया कि फिल्म क्या है, कहानी क्या है, गाने किसके हैं? किसी को कुछ नहीं पता। बस ये पता था कि सब कश्मीर चलेंगे। वहीं गाने शूट करेंगे। वहीं फिल्म की कहानी भी लिख लेंगे। आपको ये जानकर भले झटका लगे कि बिना फिल्म की कहानी के कैसे फिल्म की शूटिंग फिक्स हो सकती है लेकिन सच पूछिए तो सलीम जावेद के हिंदी सिनेमा में बतौर राइटिंग टीम कदम रखने तक शूटिंग से पहले पूरी कंप्लीट स्क्रिप्ट गिनती की ही फिल्मों की तैयार होती थीं। एक मोटा मोटा खाका दिमाग में होता था प्रोड्यूसर और डायरेक्टर के और तमाम बार तो फिल्म की शूटिंग वाले दिन ही सीन लिखा जाता और उसके संवाद लिखे जाते। मिस्टर नटवरलाल हालांकि है तो उस दौर की फिल्म जब हीरो फिल्म साइन करने से पहले स्क्रिप्ट मांगने लगे थे लेकिन हिंदी सिनेमा में बहुत सारा काम भरोसे पर भी हो जाता है। राकेश कुमार ने बाद में एक और फिल्म अमिताभ बच्चन के साथ इसी भरोसे पर ही बना डाली थी, जिसका नाम है याराना। उसका किस्सा फिर कभी।
खैर तो फिल्म मि. नटवरलाल के लिए अमिताभ बच्चन ऑन बोर्ड हो गए। डायरेक्टर राकेश कुमार भी ऑन बोर्ड हो गए। डायरेक्टर ने अपनी पिछली फिल्म की हीरोइन रेखा को भी हीरो की सिफारिश पर ऑन बोर्ड कर लिया। सबके टिकट बुक हो गए। होटल के कमरे बुक हो गए। शूटिंग के लिए सारे कैमरा, लाइट्स और बाकी उपकरण बुक होकर तय हो गया कि किस दिन कौन सा ट्रक कहां से निकलना है? लेकिन ये नहीं तय हो रहा था कि फिल्म क्या है। निर्देशक ने अब तक फिल्म के कुछ बड़े बड़े सीन सोच लिए थे। फिल्म मेकिंग की भाषा में इन्हें गिमिक्स (टोटके) कहा जाता है। जैसे कि ये दो ऐसे भाइयों की कहानी होगी जिसमें एक पुलिस वाला और एक चोर होगा। चोर पुलिस के इस खेल में अमजद खान जैसा एक खतरनाक विलेन होगा। हीरो की जंगली जानवरों से एक दो खतरनाक फाइट्स होंगी और होंगे कुछ दमदार, मस्ती भरे गाने। फिल्म के स्टंट डायरेक्टर थे वीरू देवगन और फिल्म में उन्होंने कप्तान सिंह का रोल भी किया है। फिल्म की शूटिंग पर अजय देवगन भी गए थे, जिनकी एक खास तस्वीर यहां हम आपके लिए ले आए हैं।
प्रोड्यूसर को मामला जमता सा दिखा तो तय हुआ कि पहले गाने ही शूट कर लिए जाएंगे। एक दो हफ्ते तो गानों की शूटिंग में लगेंगे ही, तब तक बाकी कहानी लिख ली जाएगी। बस निर्देशक राकेश कुमार ने गीतकार आनंद बख्शी के घर के चक्कर काटने शुरू कर दिए। बख्शी साब ठहरे पान और ट्रिपल फाइव सिगरेट के शौकीन। पान उनके आते थे खार रेलवे स्टेशन की वेस्ट साइट की एक खास दुकान से। बख्शी साब को जब ये पता चला कि अमिताभ बच्चन की किसी फिल्म के लिए उनसे बस दो तीन हफ्ते में गाने लिखने की उम्मीद की जा रही है तो उन्होंने प्रोड्यूसर डायरेक्टर दोनों को अपने घर से दफा हो जाने को कहा।
यहां फायदे वाली बात फिल्म मि. नटवरलाल के मेकर्स के लिए ये रही कि बख्शी साब संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ मिलकर इनकी फिल्म राम बलराम के गाने भी लिख रहे थे। किसी तरह सीन में म्यूजिक डायरेक्टर राजेश रोशन की एंट्री हुई। राजेश रोशन ने मामला जमाया और ये तय हो गया कि बख्शी साब ये गाने एक एक करके देते रहेंगे और मेकर्स इन्हें इसी क्रम में रिकॉर्ड करते रहेंगे। बख्शी साब ने कहा भी कि ऐसे तुरत फुरत काम करवाओगे तो बाकी प्रोड्यूसर तो नाराज हो जाएंगे। वे तो बोलेंगे कि जैसे बख्शी साब ने इनको ही अपना सब कुछ दे दिया है। बस गुस्से में निकली ये बात ही फिल्म का सबसे हिट गाना बन गई। गाने के बोल हैं, परदेसिया ये सच है पिया, सब कहते हैं मैंने तुझको दिल दे दिया। मुखड़ा क्रैक होने भर की देर थी कि बख्शी साब बाहर बालकनी में गए और लौट कर आए तो गाने के बाकी अंतरे भी हाथ के हाथ लिख डाले, सिर्फ 15 मिनट में ये गाना इसकी धुन समेत रेडी था। आप सुनिए ये गाना और फिर मैं आपको बताता हूं कि इस गाने के तुरंत बाद उन्होंने दूसरा गाना कौन सा उसी दिन लिख डाला।
लता मंगेशकर और किशोर कुमार के गाए इस गाने की शूटिंग के दौरान अमिताभ और रेखा की दोस्ती के किस्से पूरे देश के गली मोहल्लों तक पहुंच चुके थे। दोनों काम तो इससे पहले भी साथ साथ कर चुके थे और इसके बाद राम बलराम में भी दोनों की जोड़ी नजर आई। लेकिन कश्मीर में हुए किस्सों की जो बातें छन छनकर बंबई तक पहुंची उनके चलते अमिताभ बच्चन पर फिर कोई फिल्म रेखा के साथ साइन न करने की अघोषित पाबंदी घर में लग गई। सिर्फ यश चोपड़ा के लिए ये पाबंदी हटी एक फिल्म के लिए यानी सिलसिला के लिए जिसकी कास्टिंग कहते हैं कि अमिताभ बच्चन ने अपनी तड़ी दिखाकर कश्मीर पहुंच जाने के बाद बदलवा दी थी।
अमिताभ बच्चन तड़ी वाले कलाकार हैं, ये बात आनंद बख्शी को भी अच्छी तरह से मालूम थी। लेकिन, उनको ये भी मालूम था कि तड़ी वाला इंसान बच्चों को बहुत प्यारा होता है। सो उन्होंने इस फिल्म में एक गाना क्रिएट कर दिया अमिताभ बच्चन के लिए। ये बात उन्होंने फिल्म का पहला गाना परदेसिया लिखने के तुरंत बाद फिल्म के संगीतकार और निर्देशक को समझाई कि फिल्म कभी कभी में जिस अंदाज से अमिताभ बच्चन ने साहिर की लाइनें पढ़ी हैं, उस हिसाब से वह गाना भी बहुत अच्छा गा सकते हैं। अमिताभ बच्चन के तो ये सुनकर तोते उड़ गए। लेकिन, कुछ प्रोड्यूसर ने पुचकारा, कुछ निर्देशक ने समझाया और बाकी काम राजेश रोशन ने संभाल लिया। राजेश रोशन के करियर का ये उस वक्त का सबसे ऊंचा मुकाम था कि उन्होंने अपने निर्देशन में अमिताभ बच्चन से गाना गवा दिया। आनंद बख्शी की बात सही निकली और ये गाना सुपरहिट हो गया।
लता मंगेशकर, किशोर कुमार और अमिताभ बच्चन के साथ ही फिल्म मि. नटवर लाल में आशा भोसले और उषा मंगेशकर ने भी गाने गाए हैं। मोहम्मद रफी के साथ फिल्म का एक गाना अनुराधा पौडवाल ने भी गाया है। फिल्म के गीत संगीत ने फिल्म को हिट कराने में खूब मदद की। जब तक गाने तैयार हुए ज्ञानदेव अग्निहोत्री ने फिल्म की स्टोरी क्रैक कर ली। राकेश कुमार ने फटाफट इसकी पटकथा लिखी और कादर खान ने दो हफ्ते के भीतर फिल्म के सारे संवाद लिख डाले।
अगले दो महीने में फिल्म की पूरी यूनिट कश्मीर जाकर फिल्म का लंबा शेड्यूल पूरा करके मुंबई लौट आई। मुंबई के अलग अलग स्टूडियोज में फिल्म की बाकी शूटिंग संपन्न होकर फिल्म तैयार हो गई। फिल्म जब सेंसर के लिए जाने ही वाली थी कि फिल्म के निर्माताओं को एक नोटिस मिला। नोटिस बिहार के उस नटवरलाल की तरफ से था जिस पर धोखाधड़ी के तमाम केस चल रहे थे और इस बात के लिए था कि वे फिल्म का नाम नटवरलाल बगैर उसकी इजाजत के नहीं रख सकते। फिल्म का नाम पहले सिर्फ नटवरलाल ही था तो उसमें मिस्टर जोड़ दिया गया। असली नटवरलाल को इस पर भी एतराज रहा तो फिल्म का नाम कर दिया गया ‘अमिताभ बच्चन इन एंड एज मि. नटवर लाल’। फिल्म में कास्टिंग इतना लिखा आने के बाद ही शुरू होती है।

कमेंट
कमेंट X