कश्मीर के बर्फीले इलाके में सैनिकों की टुकड़ी के साथ पुल पर सबसे आगे एक व्यक्ति हाथ में तिरंगा उठाए चल रहा है, यह संवाद बोलने से ठीक पहले उस व्यक्ति पर चरमपंथी गोलियों की बौछार करते हैं। सैनिक उनपर जवाबी कार्रवाई करते हैं और वह व्यक्ति घुटनों के बल बैठ जाता है मगर तिरंगे को झुकने नहीं देता है।
प्रधानमंत्री मोदी की बायोपिक की कहानी कितनी सच्ची, कितनी काल्पनिक
लोकसभा चुनावों के पहले चरण की वोटिंग से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक 'पीएम नरेंद्र मोदी' को सिनेमाघरों में रिलीज करने की योजना है। 05 अप्रैल को इसकी रिलीज डेट रखी गई है लेकिन इससे पहले विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने इस फिल्म की रिलीज पर कड़ी आपत्ति जताई है।
पार्टी का आरोप है कि इसका निर्माण भाजपा ने करवाया है और वो इसे पार्टी की ओछी राजनीति करार दे रही है। हालांकि फिल्म से भारतीय जनता पार्टी से किसी तरह से जुड़ी नहीं है लेकिन इसके मोदी का किरदार निभा रहे विवेक ओबेरॉय बीजेपी समर्थक रहे हैं। इस महीने की शुरुआत में ट्रेलर लॉन्च के मौके पर एक सवाल के जवाब में उन्होंने पार्टी के एक चुनावी नारे, 'मोदी है तो मुमकिन है' को दोहराया था।
फिल्म प्रोमोशन से जुड़े कई कार्यक्रमों में भाजपा के वरिष्ठ नेता शिरकत करते नजर आए हैं। निर्वाचन आयोग इस बात की जांच कर रहा है कि फिल्म रिलीज से आचार संहिता का उल्लंघन तो नहीं हो रहा है। फिल्म के प्रोड्यूसर ने आयोग से कहा है कि इसके निर्माण में उनका पैसा लगा है। लेखक और निर्माता संदीप सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा कि वो "एक महान व्यक्तित्व" की कहानी देश को बताना चाहते हैं ताकि लोग "इससे प्रेरणा ले सकें।"
उन्होंने बीबीसी से कहा, "मुझे राजनीति, राजनेताओं या फिर किसी भी पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है, अगर वो (विपक्षी राजनेता) एक फिल्म से डरते हैं तो क्या वो अपने काम के प्रति आश्वस्त नहीं हैं जो उन्होंने अपने देश और अपने राज्यों के लिए किया है।"
अभी तो फिल्म का ट्रेलर ही लॉन्च हुआ है, सिनेमाघरों में फिल्म का रिलीज होना बाकी है, इससे पहले ही कुछ आलोचक इसे प्रोपेगेंडा मूवी करार दे रहे हैं। हिंदुस्तान टाइम्स के फिल्म आलोचक राजा सेन ने बीबीसी से कहा, "फिल्म रिलीज की टाइमिंग इसे संदिग्ध बनाती है. जनवरी में इसकी शूटिंग शुरू हुई और अप्रैल में यह रिलीज हो रही है। चुनावों से पहले इसे रिलीज करना (मोदी की) छवि को भुनाने की कोशिश है और फिल्म की यह भी कोशिश होगी कि वो उस छवि का प्रचार करे जो वो चाहती है।" प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में दावा किया जाता है कि वो बचपन में रेल गाड़ियों में चाय बेचते थे और वहां से उन्होंने देश के प्रधानमंत्री पद तक की यात्रा की है। वो दक्षिणपंथी हिंदू संगठन आरएसएस से भी जुड़े रहे हैं और 13 साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री भी रहे। उनकी व्यक्तिगत अपील और सख्त हिंदू राष्ट्रवादी नेता की छवि ने पार्टी को लोकप्रियता दिलाई है।
कई आलोचकों को ट्रेलर का वो सीन चौकाता है जिसमें नरेंद्र मोदी 2002 में हुए गुजरात के दंगों के बाद परेशान और दुखी दिख रहे हैं। दंगों में मारे गए अधिकतर मुसलमान थे। दंगों के वक्त नरेंद्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री थे और उन पर आरोप है कि उन्होंने इसे रोकने के लिए उचित कदम नहीं उठाए थे।
इसके बाद अमरीका ने उन्हें वीजा भी देने से इनकार कर दिया था। हालांकि 68 साल के मोदी हमेशा इन आरोपों को गलत बताते रहे हैं। पत्रकार और 2013 में मोदी की जीवनी लिखने वाले नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं, "यह मोदी के जीवन की एक काल्पनिक कहानी है।