इन दिनों फिल्म इंडस्ट्री में बड़ा शोर है वंशवाद और माफिया स्टाइल में काम करने वाले दबंग सितारों और पुरस्कार देने वालों का। अपने अंकल धर्मेंद्र की बदौलत फिल्मों में आए अभय देओल तक को इस बात पर गुस्सा है कि उन्हें सहायक कलाकार के तौर पर पुरस्कार समारोहों में नामित किया गया। तो आज कहानी ऐसे ही एक आउटसाइडर की जिसे फिल्म इंडस्ट्री में कोई नहीं जानता था। वह एक विदेशी फिल्म टार्जन गोज टू इंडिया में अभिनय कर लोगों की नजरों में आया। फिल्मफेयर वालों ने उसे यश चोपड़ा और बीआर चोपड़ा की फिल्म आदमी और इंसान में बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का तमगा भी दे दिया लेकिन, अफगानी पिता और ईरानी मां की संतान था ये असली खान, फिरोज खान।
बाइस्कोप: जीनत अमान को बिकिनी पहनाकर भी यू सर्टिफिकेट ले आए फिरोज खान, कमाई का बना सबसे बड़ा रिकॉर्ड
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खुद फिरोज खान ने एक बार इसका जिक्र किया था कि साल 1980 में रिलीज हुई हिंदी फिल्मों में सबसे ज्यादा कमाई का रिकॉर्ड बनाने वाली कुर्बानी सबसे पहले अमिताभ बच्चन को ऑफर हुई थी। फिरोज खान की मंशा थी कि वह फिल्म कुर्बानी में अमर का रोल करें, ये रोल बाद में विनोद खन्ना ने किया। अमिताभ बच्चन के पास तब छह महीनों तक तारीखें नहीं थी और वह चाहते थे कि फिरोज खान इतना इंतजार करें उनके लिए। लेकिन, फिरोज खान का अंदाज ही निराला है। वह जब जो चाहते हैं, वही करते हैं। फिल्म कुर्बानी के लिए जो कुछ उन्होंने किया वह उन दिनों फिल्म इंडस्ट्री में पागलपन समझा जाता था। फिल्म में उन्होंने एक असली मर्सिडीज कार तहस नहस कर दी थी, ये वो समय था जब हिंदुस्तान में महंगी से महंगी गाड़ियां रखने वालों ने भी भारत की सड़कों पर मर्सिडीज नहीं देखी थी।
कुर्बानी राजेश और अमर की कहानी है, दोनों शीला को प्यार करते हैं। दोनों की दोस्ती और गलतफहमियों की भी ये कहानी है। दोनों अलग अलग धाराओं से आते हैं। राजेश जब जेल में होता है तो उसकी गर्लफ्रेंड शीला को अमर मिलता है। अमर की पत्नी मर चुकी है और वह अपनी बेटी की देखभाल में ज्यादातर वक्त बिताता है। जेल से छूटने के बाद जब राजेश की अमर से मुलाकात होती है, तब शीला असली बात नहीं बताती है। दोनों एक आखिरी अपराध की प्लानिंग करते हैं, जिसमें राजेश फंस जाता है और अमर अपनी बेटी और शीला को लेकर लंदन पहुंच जाता है। राजेश को लगता है कि उसके साथ धोखा हुआ है। वह बदला लेने लंदन पहुंचता है तो उसे असल बात पता चलती है। लेकिन, तब तक दोनों का खतरनाक दुश्मन विक्रम वहां पहुंचता है, वह राजेश को मारना चाहता है लेकिन अमर अपनी जान देकर राजेश, शीला और अपनी बेटी को बचा लेता है।
विनोद खन्ना ने फिल्म में अमर का रोल एक ही शर्त पर किया था और वह था फिल्म कुर्बानी के मुंबई वितरण क्षेत्र में होने वाला सारा मुनाफा अपने नाम लिखवा लेना। फिरोज खान की दरियादिली ऐसी कि उन्होंने इन कागजात पर दस्तखत भी कर दिए लेकिन जब कुर्बानी रिलीज हुई और बॉक्स ऑफिस पर ताबड़तोड़ दौलत बरसी तो विनोद खन्ना ओशो के हो चुके थे। अकेले मुंबई में ये फिल्म तीन महीने तक हाउसफुल चली थी। पूरे देश और बाहर भी फिल्म ने बंपर कमाई की और इतनी कमाई की कि फिरोज खान के बैंगलोर स्थित फार्महाउस में नोट गिनने के लिए पूरा एक दस्ता अलग से तैनात किया गया था। फिल्म कुर्बानी में अमजद खान पहली बार एक दमदार कैरेक्टर रोल में दिखे। उनका रोल एक पुलिस इंस्पेक्टर का था और इस रोल में भी लोगों ने उन्हें खूब पसंद किया। लैला ओ लैला गाने में वह ड्रम बजाते भी दिखते हैं।
फिल्म में वैसे तो मेन विलेन अमरीश पुरी ही हैं लेकिन इस फिल्म से जिस अभिनेता को सबसे ज्यादा फायदा हुआ, वह हैं शक्ति कपूर। फिल्म में उनका किरदार विक्रम का है जो अपनी बहन ज्वाला (अरुणा ईरानी) के साथ नफरत का खेल रचता है। भाई बहन की ये जोड़ी परदे पर इतनी क्रूर दिखती है कि एक बार तो फिल्म देखते समय भी सिहरन हो जाती है। शक्ति कपूर को ये रोल मिलने की भी एक दिलचस्प कहानी है। जावेद अख्तर को अपने घर में पनाह देने वाली राइटर हनी ईरानी की बहन डेजी ईरानी की शादी भी एक मशहूर लेखक से हुई। कुर्बानी लिखने वाले ये राइटर थे के के शुक्ला, इनका नाम आप 70 और 80 के दशक में रिलीज हुई तमाम सुपरहिट फिल्मों के क्रेडिट्स में देख सकते हैं। के के शुक्ला उत्तर प्रदेश में उन्नाव जिले के ऊगू के बाशिंदे थे और उनके घर में मुंबई जाने के बाद भी एक इंसान के खाने भर का भोजन हर समय बना रखा रहता था। ये अवध के गांवों का बरसों से चला आ रहा नियम है। और, डेजी ईरानी के घर रखा ये खाना खाने अक्सर शक्ति कपूर पहुंच जाते थे।
शक्ति कपूर के पास उन दिनों एक फिएट कार हुआ करती थी और रहते वे पूरे स्वैग में थे। एक दिन उनकी कार बांद्रा में एक ब्रांड न्यू मर्सिडीज कार से टकरा गई। शक्ति कपूर पूरे तैश में कार वाले को मारने उतरे तो देखा कि सामने फिरोज खान खड़े हैं। शक्ति कपूर का गुस्सा काफूर और वह उन्हें अपना परिचय देने लगे। फिरोज खान दफ्तर लौटे तो के के शुक्ला को बुलाकर बोले कि मेरी कार को टक्कर मारने वाले लड़के को तलाश करो, वही फिल्म कुर्बानी का विक्रम बनेगा। घर पर के के शुक्ला ने ये किस्सा सुनाते हुए शक्ति कपूर से कहा, सॉरी, मैं तुम्हारी मदद नहीं कर पाऊंगा क्योंकि जो रोल मैंने तुम्हें देने के लिए फिरोज खान से बात करने की प्लानिंग की थी, वह रोल अब वो किसी और को दे रहे हैं जिसने उनकी कार में आज टक्कर मार दी। शक्ति कपूर के तो आंखों से आंसू निकल आए ये सुनकर। वह बोले, वह लड़का मैं ही हूं। आज मेरी ही कार से फिरोज खान की कार टकरा गई थी। फिरोज खान हिंदी सिनेमा के ऐसे फलदार वृक्ष रहे जिसने पत्थर मारने वालों को भी फल ही दिए।
हालांकि, शक्ति कपूर ने फिल्म की शूटिंग खत्म होते होते एक बार फिरोज खान से मार भी खाई। शक्ति कपूर की आदत है अपने जान पहचान के लोगों से करीबी दिखाने के लिए उनके घर वालों के हाल चाल पूछने की। शक्ति को पता चल चुका था कि फिरोज खान की एक बहन भी है दिलशाद नाम की। तो एक दिन जब दोनों नशे में धुत थे, शक्ति कपूर ने पूछ लिया कि दिल्लू कैसी है? फिरोज खान को लगा कि शक्ति कपूर की नीयत में खोट है। उन्होंने शक्ति को ऐसा जबर्दस्त मुक्का चेहरे पर मारा कि शक्ति कपूर जमीन पर चारों खाने चित हो गए। हालांकि बाद में फिरोज खान ने फिल्म कुर्बानी के प्रीमियर पर शक्ति कपूर को स्टेज पर बुलाकर अपने छोटे भाई के तौर पर लोगों से मिलवाया और सबके सामने गले भी मिले। शक्ति कपूर उसके बाद फिरोज खान के आखिरी दिनों तक उनके छोटे भाई ही बने रहे।
फिल्म कुर्बानी को फिल्मफेयर पुरस्कारों में छह नॉमीनेशन मिले। इनमें से तीन इसके संगीत को लेकर मिले। एक तो फिल्म के संगीतकारों कल्याणजी आनंदजी को मिला। दूसरा फिल्म में लैला ओ लैला गाने वाली कंचन को मिला। कंचन का नाम उन दिनों चटनी म्यूजिक के लिए पूरी दुनिया में हो रहा था। कल्याणजी आनंद जी के छोटे भाई बाबला की पत्नी कंचन ने बाद में ‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी’ के लिए भी खूब शोहरत पाई। लेकिन फिल्म कुर्बानी के संगीत के लिए इकलौता फिल्मफेयर पुरस्कार जीता फिल्म में ‘आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आए’ गाने वाली नाजिया हसन ने। फिल्म की हीरोइन जीनत अमान ने ही नाजिया से फिरोज खान को लंदन में मिलवाया था। नाजिया की आवाज सुनते ही फिरोज खान ने फिल्म कुर्बानी में उनसे एक गाना गवाने का फैसला कर लिया। किसी विदेशी खासकर पाकिस्तानी गायक को मिला ये पहला फिल्मफेयर अवार्ड रहा।
दिक्कत यहां ये थी कि उन दिनों पूरी फिल्म का संगीत एक ही संगीतकार दिया करते थे। तब एक ही फिल्म में थोक के भाव तमाम संगीतकार भर लेने का आजकल जैसा माहौल नहीं था। और, फिरोज खान चाहते थे कि तेजी से उभरते सिंगर म्यूजिक डायरेक्टर बिद्दू नाजिया के लिए गाने को कंपोज करें। बिद्दू किसी दूसरे गायक के लिए गाना कंपोज नहीं करना चाहते थे। उन्हें मनाने के लिए फिरोज खान ने तमाम पापड़ बेले और आखिर में जो कार्ड यहां काम आया वह था बैंगलोर कार्ड। फिरोज और बिद्दू दोनों का जन्म बैंगलोर में हुआ और बस इसी बात पर बात बन गई। फिल्म में नाजिया के गाए इस गाने ने उन दिनों कहर मचा रखा था। सिर्फ छह महीने में फिल्म कुर्बानी के संगीत के 10 लाख यूनिट्स बिक गए थे और फिल्म ने प्लैटिनम डिस्क का दर्जा हासिल कर लिया था।