हिंदी सिनेमा के पहले शो मैन कहे जाने वाले राज कपूर ने अपने करियर में ज्यादातर ऐसी फिल्में बनाई हैं, जिनमे कुछ ना कुछ सामाजिक संदेश जरूर होता था। उन्होंने अपनी फिल्मों के जरिए हिंदी सिनेमा को एक नई दिशा दी। राज कपूर की फिल्मों में महिला पात्र ही कहानी की धुरी होते रहे। फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम' के जरिए उन्होंने एक जले हुए चेहरे को भी बहुत ही खूबसूरती से पेश किया तो फिल्म 'प्रेम रोग' में विधवा पुनर्विवाह जैसे विषय पर प्रकाश डाला। फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली' और 'बॉबी' पर भी बहसें खूब होती रही हैं। राज कपूर की चार हीरोइनों ने अपने करियर में राज कपूर की आमद पर खूब खुलकर बातें की हैं।
Heroines Of Raj Kapoor: जीनत से जानिए साइनिंग में मिले सोने के सिक्कों की दास्तां, मंदाकिनी का ‘लिटमस टेस्ट’
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राज साब से कह दो, रूपा आई है
अभिनेत्री जीनत अमान के करियर की 'सत्यम शिवम सुंदरम' ऐसी फिल्म है जिसकी चर्चा आज भी होती है। पहले इस फिल्म में काम करने के लिए राज कपूर से हेमा मालिनी से संपर्क किया था। जीनत अमान कहती हैं, 'मैं राज साहब के साथ फिल्म 'वकील बाबू' की शूटिंग कर रही थी, इसी दौरान उन्होंने फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ की हीरोइन रूपा के बारे में जिक्र किया। राज साहब अपनी इस फिल्म को लेकर जितने उत्साहित थे, उतना ही चुनौती से भरा मुझे रूपा का किरदार लग रहा था। मैंने घाघरा चोली पहना और रूपा के जले हुए चेहरे को दिखाने के लिए अपने गाल पर टिशू पेपर लगाकर मेकअप करवाया जैसे जला हुआ चेहरा हो। मैं राज साहब से मिलने उनके ऑफिस गई तो गेट पर ही मुझे रोक लिया गया। फिर मैंने संदेश भिजवाया, ‘राज साब से कह दो रूपा आई है।’ राज साहब ने जैसे ही मुझे देखा दंग रह गए। मुझे उस लुक में देखकर इतने खुश हुए कि साइनिंग अमाउंट में चेक नहीं बल्कि सोने के सिक्के दिए।'
मेरे इन्कार का बुरा नहीं माना
राज कपूर की फिल्म 'सत्यम शिवम सुंदरम' में बाल कलाकार के तौर पर काम करने के बाद पद्मिनी कोल्हापुरे ने फिल्म 'प्रेम रोग' में बतौर मुख्य अभिनेत्री काम किया। पद्मिनी कोल्हापुरे कहती हैं, 'अच्छे कलाकार के साथ -साथ अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा मुझे राज अंकल से मिली है। उस समय एक शॉट के बाद दूसरे शॉट को लेने में चार घंटे का समय लगता था। राज अंकल मेरे पास आकर बोलते थे कि अभी चार घंटे का समय है तब तक तुम थियेटर में जाकर मेरी फिल्में देखो। राज कपूर ने अपने स्टूडियो में ही छोटा सा थियेटर बनवा रखा था। वह कहते थे कि थियेटर में जाकर मेरी फिल्म 'मेरा नाम जोकर' और 'आवारा' देखो। जब मैं फिल्में देखकर आती थी तब राज अंकल मेरे पास बैठकर पूछते थे कि फिल्म कैसी लगी? हमारी फिल्म के बारे में घंटों बात होती थी। इस फिल्म के बाद वह मुझे 'राम तेरी गंगा मैली' में भी कास्ट करना चाह रहे थे, लेकिन उस फिल्म में जिस तरह के दृश्य से उससे मैं काफी असहज महसूस कर रही थी, इसलिए मैंने फिल्म में काम करने से इंकार कर दिया, लेकिन मेरी इंकार का उन्होंने बुरा नहीं माना।'
मैं जो कुछ हूं, ‘बॉबी’ की वजह से हूं
फिल्म 'बॉबी' से ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया रातों-रात स्टार बन गए। डिंपल कपाड़िया आज भी मानती है कि बॉबी जैसा किरदार फिर उन्हें कभी निभाने का मौका नहीं मिला। वह कहती हैं, 'राज कपूर साहब शानदार और जीनियस निर्देशक निर्देशक रहे हैं। बॉबी को रिलीज हुए 50 साल हो गए, लेकिन अभी तक उस फिल्म के मुकाबले मेरे करियर में वैसी कोई फिल्म नहीं आई। मैं जो कुछ हूं, बॉबी की वजह से हूं। इसी फिल्म की वजह से मेरा वजूद है। राज कपूर जैसे बेहतरीन फिल्मकार के निर्देशन में अपना करियर शुरू करने के बाद भी आगे काम करना मेरे लिए बहुत ही बड़ा तकलीफदेह था। चार सीन और दो गाने के बाद फिल्म की हीरोइन सीधे क्लाइमेक्स में ही दिखती थी। पुरुषप्रधान फिल्मों के बीच राज साहब ने महिला पात्र को ध्यान में रखकर बहुत सारी फिल्में बनाई और सभी फिल्में सफल रही हैं, उनकी सोच बहुत दूर तक थी।'
मेरा चूड़ीदार पहनना काम कर गया
फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली' में राजीव कपूर से ज्यादा चर्चा फिल्म की अभिनेत्री मंदाकिनी की रही। मंदाकिनी कहती हैं, 'उस दौर में इंडस्ट्री में हर किसी का सपना होता था कि राज साहब के साथ एक काम करना है। मेरी तो शुरुआत ही राज साहब की फिल्म से हुई। मेरे लिए यह बहुत बड़ा मौका था। मुझे याद है जब पहली बार राज साहब से मिलने गई थी तो चूड़ीदार ड्रेस पहन रखी थी। मुझे इस ड्रेस में देखकर बहुत खुश हुए। वह बोले कि अगर तुम कुछ और पहनकर आती, जींस या टी-शर्ट तो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं आता। उन्होंने मेरे घर परिवार के बारे में बात की और पूछा, 'छोटे भाई बहन हैं घर पर?' मैंने बताया कि छोटा भाई और एक छोटी बहन है। फिर उन्होंने पूछा, 'गोद में लिया है उनको कभी, खिलाया है?' मैंने कहा जिस पारिवारिक पृष्ठभूमि से हम लोग आते हैं, अपने परिवार के बहुत ही नजदीक होते हैं और छोटे बच्चों को पूरा दिन गोद में संभालते हैं।' इस तरह से बातचीत के दौरान ही राज साहब को इस बात का अंदाजा हो गया था कि मैं गंगा की भूमिका निभा पाऊंगी या नहीं।'