73 साल के हो चुके अभिनेता, निर्माता, निर्देशक राकेश रोशन इन दिनों अपनी अगली फिल्म ‘कृष 4’ को लेकर उधेड़बुन में हैं। कहानी, पटकथा, विचार सब तैयार है। बस राकेश रोशन इस उम्र में आकर ऐसी फिल्म बनाने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं है जो हॉलीवुड सुपरहीरो की फिल्म के मुकाबले किसी भी तरह दोयम हो या फिर उनकी फिल्म के चक्कर में फिल्म वितरकों या प्रदर्शकों का किसी तरह कोई नुकसान हो। ‘कृष 4’ बनी तो ये फिल्म अपने बेटे ऋतिक रोशन का करियर पटरी पर लाने के लिए बनाई उनकी फिल्म ‘कोई मिल गया’ की तीसरी सीक्वल होगी और 8 अगस्त 2003 को रिलीज हुई फिल्म ‘कोई मिल गया’ की रिलीज के इसी हफ्ते 20 साल पूरे हो रहे हैं। इसी सिलसिले में ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने की राकेश रोशन से ये खास मुलाकात।
Rakesh Roshan Interview: दोस्तों की प्रतिक्रिया देख बदला कोई मिल गया का अंत, कृष 4 के लिए चाहिए हजार करोड़
राकेश जी, फिल्म ‘कोई मिल गया’ का विचार कैसे आया?
विचार यही था मेरे पास कि ऋतिक जो है वह मानसिक रूप से एक कमजोर युवा है और उसका बर्ताव बच्चों जैसा है। फिर एक एलियन आता है। उससे दोस्ती हो जाती है और एलियन उसे जाते जाते शक्ति देकर जाता है, उसे ठीक कर जाता है..ये एक आइडिया था। चूंकि ऋतिक के किरदार का छोटे बच्चों जैसा उसका व्यवहार है तो जाहिर है कि दोस्त भी उसके छोटे ही होंगे। ये अपने आप ही सब बनता गया। फिर बच्चे भी आ गए। टैलेंटेड बच्चे आ गए। मैंने ऑफिस में बुलाया सब बच्चों को। सब बड़े टैलेंटेड बच्चे मिले मुझे। ऋतिक का रोल बहुत चैलेंजिंग था। ऐसे रोल हॉलीवुड में बहुत सारे कलाकारों ने किए हैं लेकिन बच्चों के साथ कभी नहीं किया। एक तुलना भी थी कि कि ऋतिक ठीक कर रहा है या ओवरएक्टिंग कर रहा है। बच्चों के साथ एक्टिंग करना मुश्किल होता है। बहुत मुश्किल से पिक्चर बनाई थी तो ऋतिक एकदम से कैरेक्टर में था तो मुझे मुश्किल नहीं हुई।
ऋतिक के साथ जब आपने फिल्म का पहला विचार साझा किया होगा तो उनकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?
उसका पहला ही रिएक्शन था, इट इज वेरी गुड, लेट्स गो अहेड विद इट। मुझे याद है कि दिल्ली में वह फिल्म ‘यादें’ की शूटिंग कर रहा था तो मैंने उसे फोन किया सुबह 8 बजे कि ऐसा एक आइडिया आया है रात को। कैसा लगा? तो सुनते ही उसने कहा बहुत अच्छा। क्या होता है कि सामने वाले से अच्छा रिस्पांस आता है तो उत्साह बढ़ जाता है तो फिर मैंने इसे अपनी राइटिंग टीम को सुनाया। दोस्तों को सुनाया। फिर आहिस्ता आहिस्ता इस पर काम आगे बढ़ता गया। स्क्रीनप्ले, स्टोरी कुछ 15 दिन में बन गई क्योंकि नई कहानी थी। जब भी हम कोई नहीं कहानी बनाते हैं तो उसमें दिक्कत क्या होती है कि हम कोई भी सीन सोचते हैं तो रिएक्शन आता है कि ये तो फलां पिक्चर में आ चुका है। फिर हम हम चेंज करते हैं तो चेंज करना बड़ा मुश्किल होता है क्योंकि जैसे गाने हैं। रोमांटिक गाने हैं तो वही। उनके नए बोल भी लिखवाने हैं। बोल तो वही हैं तो कितने नए गाने लिखवा लेंगे? कितनी नई धुनें बना लेंगे? इसमें क्या था कि ये कहानी नई थी तो ये अपने आप बुनती चली गई ऐसी कोई पिक्चर पहले आई नहीं तो इसका कोई रेफरेंस जैसा था नहीं।
लेकिन कहा तो जाता है कि स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म ‘ईटी’ (एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल) से इस फिल्म का संदर्भ लिया गया है..
नहीं, रेफरेंस उसका नहीं है। एलियन जरूर आया है और बच्चे के साथ रहता है बस उतना ही है और कुछ नहीं है..
सचिन भौमिक, रॉबिन भट्ट और हनी ईरानी जैसे दिग्गज लेखकों ने इसे लिखा, एक एक करके अगर उनका योगदान गिनें तो कुछ विशेष याद आता है आपको?
हर पिक्चर में मेरी लेखक बहुत बड़ा रोल प्ले करते हैं. क्योंकि वह जानते हैं मुझे किस तरह की कहानी दिखानी है परदे पर। वे किसी और डायरेक्टर के साथ काम करेंगे तो उनको पता है कि उनको किस तरह का काम चाहिए और मुझे भी पता है कि अगर मैंने ये सीन सोचा है कोई चीज डाली है इनके सामने ये तो किस तरह का रेस्पॉन्स करेंगे। तीनों का काम अलग अलग पिन प्वाइंट करना तो बड़ा मुश्किल होगा लेकिन ये टीम वर्क है। सचिन भौमिक जी का जो शब्दकोश था वह कमाल का था। कोई भी पिक्चर का आप नाम ले लीजिए तो या उनकी खुद की लिखी होगी या फिर उन्होंने उसको खूब पढ़ा होगा। उससे बहुत मदद मिलती थी हमको। हनी जी थीं। मैंने एक महिला को इसलिए रखा राइटर क्योंकि वह भावनाएं समझती हैं। रॉबिन भट्ट भी अपने साथ बहुत सारा अनुभव लेकर आए। वह चुटकी बजाते ही समस्या का हल निकाल लेते थे।