70 और 80 के दशक के मशहूर फिल्मकार रमेश सिप्पी को आज की पीढ़ी बहुत ही कम पहचानती है। इसका कारण 21वीं सदी में उनका फिल्मों में नाता अच्छा न होना है। ‘शोले’, ‘शक्ति’, ‘सीता और गीता’ जैसी हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में शुमार फिल्मों के निर्देशक रमेश सिप्पी का करियर उनकी निर्देशित की हुई पहली फिल्म ‘अंदाज’ से ही परवान चढ़ना शुरु हो गया था। हिंदी सिनेमा को गब्बर सिंह और शाकाल जैसे खूंखार विलेन देने वाले इस पद्मश्री विजेता निर्देशक ने फिल्म निर्माण के गुर सीखने के लिए छह साल की उम्र से ही फिल्मों के सेट पर जाना शुरू कर दिया था। रमेश के पिता गोपालदास परमानंद सिप्पी (जी पी सिप्पी) उस समय के मशहूर फिल्म निर्माता थे इसलिए रमेश ने फिल्मकारी की सारी कला बचपन से ही सीखी। आइए, रमेश सिप्पी के जन्मदिन के मौके पर नजर डालते हैं उनकी बनाई कुछ यादगार फिल्मों पर।
‘शोले’, ‘शक्ति’ जैसी फिल्मों के निर्देशक की 21वीं सदी में खो गई पहचान, ये फिल्में हैं आज भी यादगार
अंदाज (1971)
सात साल तक एक सहायक निर्देशक के रूप में काम करने के बाद जब रमेश को पूरी एक फिल्म का निर्देशन करने का मौका मिला तो उन्होंने फिल्म ‘अंदाज’ बनाई। रमेश नए थे इसलिए किसी और ने भरोसा नहीं दिखाया। तो फिल्म का निर्माण कार्य भी रमेश के पिता को ही देखना पड़ा। शम्मी कपूर और हेमा मालिनी जैसे सितारों पर इसके बाद शोहरत और दौलत की बारिश हुई। फिल्म सुपरस्टार अभिनेता राजेश खन्ना के नाम पर बेची गई जिनका फिल्म में बहुत कम काम है। पैंतरा काम कर गया और रमेश के करियर को इस फिल्म के साथ कमाल की शुरुआत मिली।
सीता और गीता (1972)
रमेश की पहली फिल्म को सलीम-जावेद ने लिखा और दूसरी फिल्म के लिए भी लेखकों की इसी जोड़ी ने काम किया। अभिनेत्री हेमा मालिनी के दोहरे किरदार वाली फिल्म ‘सीता और गीता’ को रमेश सिप्पी ने ऐसा पर्दे पर उतारा कि फिल्म सीधे दर्शकों के दिल में उतर गई। हेमा मालिनी के अलावा फिल्म में धर्मेंद्र और संजीव कुमार भी रहे जिनमें इसी फिल्म के दौरान असल जिंदगी में लव ट्रायंगल बन गया। यह फिल्म दो जुड़वा बहनों सीता और गीता की कहानी है जो अपने जन्म के वक्त ही एक दूसरे से अलग हो जाती हैं। इस फिल्म की सफलता के बाद जुड़वा भाई बहनों को लेकर हिंदी सिनेमा में बहुत सी फिल्में बनीं।
शोले (1975)
सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म का दर्जा पाने वाली फिल्म ‘शोले’ सिर्फ रमेश सिप्पी की नहीं, बल्कि पूरे भारतीय सिनेमा की अबतक की सदाबहार फिल्म है। इस फिल्म के हर छोटे किरदार से लेकर बड़े किरदार तक सिर्फ एक संवाद तक बोलकर भी दर्शकों के जेहन में एक याद बनकर समा चुके हैं। रमेश के अनुसार शोले की सफलता का राज इसकी पटकथा और पार्श्व संगीत है। आसमान में गोलियों की गूंजती आवाज, झूले के चरचराहट, डाकुओं की फिल्म होते हुए भी खून खराबा न होना, इसी सबने मिलकर शोले को महान बनाया। वर्ष 2005 में 50वें फिल्मफेयर समारोह में फिल्म को पिछले 50 साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का दर्जा दिया। साथ ही ब्रिटिश फिल्म इंस्टीट्यूट ने वर्ष 2002 की वोटिंग में शीर्ष 10 भारतीय फिल्मों की सूची में 'शोले' को प्रथम स्थान दिया।
शक्ति (1982)
साल 1982 की फिल्म के साथ रमेश सिप्पी अपने करियर की सफलता की एक और सीढ़ी को लांघ गए। अपने समय के शीर्ष अभिनेता दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन को एक साथ पर्दे पर लाने का श्रेय इसी इकलौती फिल्म को जाता है। इस फिल्म में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए दिलीप और अमिताभ दोनों को नामित किया गया था, लेकिन अंत में बाजी दिलीप कुमार ने मारी। इस पर रमेश सिप्पी ने कहा था कि अमिताभ ने फिल्म में जैसा अभिनय किया है, वैसा शायद ही कोई अभिनेता कर पाता। इस फिल्म ने वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर पुरस्कार भी जीता।
