करोल बाग, दिल्ली की एक बरसाती के सामने की जगह को रंगमंच बनाकर स्वांग रचने वाले आशीष विद्यार्थी को अब दुनिया सलाम करती है। 11 भाषाओं में 230 फिल्में कर चुके आशीष जल्द ही वेब सीरीज ‘सनफ्लॉवर’ में दिखने वाले हैं। वह अभिनय के अलावा लोगों को जिंदगी का फलसफा भी समझाने का काम करते हैं। इन दिनों हिमाचल प्रदेश की वादियों में अपने मित्रों के साथ समय बिता रहे आशीष से ये खास बातचीत की है ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने।
EXCLUSIVE: आशीष विद्यार्थी का खुलासा, ‘फिल्म ‘1942 ए लव स्टोरी’ का ऑडिशन देते हुए मैं कांप रहा था’
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मां कथक गुरु और पिता संगीत नाटक अकादमी में, तो कह सकते हैं कि अभिनय घुट्टी में मिला?
पता नहीं मुझे। मैं कह नहीं सकता। मां और बिरजू महाराज ने एक साथ लच्छू महाराज से कथक सीखा। बाद में वह शंभू महाराज की भी शिष्या रहीं। दिल्ली में वह कथक गुरु थीं। पिताजी भी दिन पर अकादमी में ही रहते थे। मैं स्कूल से आने के बाद अपनी अलग ख्याली दुनिया में रहता था। कभी घंटों टेनिस बाल को बैडमिंटन रैकेट से दीवार पर मारते गुजार देता। कहानियां बुनने में तब मेरा सानी नहीं था। मुझे लगता है अभिनय की शुरूआत मेरी वहीं से हुई।
दिल्ली में आपके दिनों में हिंदी रंगमंच की स्थिति कैसी थी?
बहुत ही दयनीय। ये बात मैं आपको 1981-82 की बता रहा हूं। तब सप्रू हाउस में मेला लगा रहता था। वहां पंजाबी नाटक होते थे और एक से एक फूहड़ नाटक होते थे। लेकिन, हाउसफुल होते थे। हिंदी नाटक कोई देखने आता ही नहीं था। फिर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से निकले कुछ युवाओं ने ‘संभव’ की शुरूआत की। देवेंद्र राज अंकुर, राजेंद्र गुप्ता, वीरेंद्र सक्सेना, अमिताभ श्रीवास्तव ये लोग सब इकट्ठे हुए। इन लोगों ने तय किया कि हर महीने एक नया नाटक करेंगे। पैसे नहीं होते थे लेकिन बहुत ही नाममात्र का सेट लगाकर भी हिंदी के नाटक खेले जाते थे। श्रीराम सेंटर के बेसमेंट में नाटक होते और तय ये था कि दो लोग भी आएंगे तो हम शो करेंगे। और कई बार ऐसा हुआ भी। बाद में नाटक हाउसफुल भी खूब हुए। ‘संभव’ ने दिल्ली में हिंदी नाटकों को पुनर्जीवित किया।
और आपके अभिनय यात्रा में दिल्ली कितना शामिल है?
‘संभव’ के समय मैं कॉलेज में था और सबसे बहुत जूनियर था। लेकिन मैं जाया करता था इन लोगों के साथ काम करने। ठेले पर सामान भी ढोया करता था। फिर एनएसडी में रहा। वहां से निकला तो ‘एक्ट वन’ से जुड़ा। हम लोग जब एन के शर्मा से जुड़े तो एन के सिर्फ एनके ही था। एनके के साथ मेरा काम दो साल रहा मुंबई आने से पहले।
मां, बाबा ने हर कदम हौसल बढ़ाया इस दौरान?
मैं अपने मां, बाबा का ही आशीष हूं। वे मेरा हर नाटक देखने आते थे। ये वह समय था जब माता पिता अपने बच्चों को डॉक्टर या इंजीनियर ही बनाना चाहते रहे होंगे। लेकिन, मेरे अभिनय के क्षेत्र में जाने को मेरे मां, बाबा का पूरा आशीर्वाद मिला। हम सब लोग जो भी हैं, जहां भी हैं, ना जाने कितने लोगों के आशीष से बने हैं,ना जाने कितने लोगों के धक्के से बने हैं। अभी कुछ साल से मैंने लोगों को जीवन समझाना शुरू किया है। वह सब साझा करना शुरू किया है जो मैं अभिनय से अलग हटकर दिखाना चाहता हूं। मैं बताना चाहता हूं कि अभिनेता बिना अभिनय के भी कुछ अच्छा दिखला, बता सकता है। मैं अभिनेता भी हूं। सिर्फ अभिनय ही नहीं करता हूं।