रणबीर और मेरे बीच अदब और लिहाज की रेखा हमेशा से बनी हुई है, जिसमें प्यार और डर दोनों है। एक आम पिता की तरह मैं भी रणबीर के बचपन से ही उसकी ख्वाहिशें पूरी करता रहा हूं। लेकिन अब वह बड़ा हो गया है। जाहिर है, अब उसकी हर जिद पर वही प्रतिक्रिया नहीं दी जा सकती, जो बचपन में दी जाती थी।
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यह बात मैं साफ कर देना चाहता हूं कि जैसे दूसरे पिता अपने बेटों को प्यार करते हैं और उसे लेकर चिंतित रहते हैं, वैसा ही मैं भी करता हूं, लेकिन दूसरों के मुकाबले थोड़ा फर्क है। हमारे परिवार में बड़ों की इज्जत करने की परंपरा रही है। मेरे पिता अपने पिता की और मैं और मेरे भाई अपने पिता की बहुत इज्जत करते थे। आधुनिक समय में परिवार नाम की इकाई के संस्कार बदले हैं, लेकिन हमारे परिवार में बड़ों की इज्जत के मुद्दे पर आज भी पुराने संस्कार ही कायम हैं। रणबीर और मेरे बीच अदब और लिहाज की रेखा हमेशा से बनी हुई है, जिसमें प्यार और डर दोनों हैं। एक आम पिता की तरह मैं भी रणबीर के बचपन से ही उसकी ख्वाहिशें पूरी करता रहा हूं। एक बार मैं और नीतू लंदन में थे, तब रणबीर चार-पांच साल का रहा होगा। रात में उसने जिद पकड़ ली कि उसे गिटार चाहिए। मैं और नीतू उसे लेकर रात के एक बजे तक लंदन की दुकानों में घूमते रहे और बड़ी मुश्किल से उसके मतलब का एक गिटार मिल सका।
तब वह बच्चा था और अब बड़ा हो चुका है। जाहिर है अब उसकी हर जिद पर वही प्रतिक्रिया नहीं दी जा सकती, जो बचपन में दी जाती थी। मिसाल के लिए सड़कों पर बढ़ रहे बेतहाशा ट्रैफिक से मुझे बड़ी दहशत होती है। कुछ साल पहले रणबीर ने लाल रंग की ऑडी कार खरीदी। इसके बारे में उसने मुझे नहीं बताया, लेकिन अपनी मां से पूछा जरूर था। मैंने उससे साफ कहा कि इस कार को लेकर तुम सिर्फ जिम तक जा सकते हो, जो घर के पास ही था। मुझे खुशी हुई, जब उसने मेरी बात मान ली। रणबीर जब दसवीं क्लास पास कर चुका था, तो उन दिनों मैं फिल्म ‘आ अब लौट चलें’ का निर्देशन करने अमेरिका जा रहा था। सिनेमा में उसकी रुचि देखते हुए अपने असिस्टेंट के तौर पर मैं उसे साथ ले गया। फिल्म की शूटिंग के दौरान हम दोनों में इतनी बातें हुईं, जितनी रणबीर ने तब तक की अपनी पूरी उम्र में मुझसे नहीं की थीं। मुझे लगता है इसके बाद हम एक-दूसरे के ज्यादा करीब आए।
रणबीर को सिनेमा में काम करने का शौक था, मगर मैं चाहता था कि पहले उसे सिनेमा की तकनीक के बारे में गहरी जानकारी हो जाए, तब वह पर्दे पर उतरे। इसके लिए उसने न्यूयार्क के ‘स्कूल ऑफ विजुअल आर्ट्स’ से फिल्म मेंकिंग की पढ़ाई की फिर ‘ली स्ट्रासबर्ग थिएटर एंड फिल्म इंस्टीट्यूट’ से एक्टिंग का कोर्स किया। उसके बाद उसने संजय लीला भंसाली को फिल्म ‘ब्लैक’ में असिस्ट किया। इसके बाद मुझे भरोसा हो गया कि रणबीर सिनेमा में अब वह सब कर सकेगा, जो शायद मैं भी नहीं कर पाया।
फिर उसने खुद ही अपने लिए जगह बना ली। यह मेरा अपना अनुभव है कि किसी स्टार की औलाद होने की वजह से फिल्मी दुनिया में सब कुछ आसान नहीं हो जाता। मैं भी स्टार की औलाद था, मैं राज कपूर का बेटा था, लेकिन आज 46 साल बाद भी मैं फिल्मों में टिका हूं, तो इसकी वजह यह है कि मैं बार-बार खुद को साबित करता रहा हूं। हां इतना जरूर है कि स्टार किड होने की वजह से पहली फिल्म आसानी से मिल जाती है, लेकिन इसके बाद अपने दम पर टिकना होता है। फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी पचासों मिसालें मिल जाएंगी कि स्टार किड बहुत धूम धड़ाके से फिल्मों में आए और आगे टिक नहीं पाए। दरअसल यह एक जंगल है, जहां अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होती है।
एक रात रणबीर ने अचानक फैसला लिया और अपनी मां को बताया कि वह नया साल मनाने के लिए न्यूयॉर्क जा रहा है और वह चला गया। यह उसकी अपनी आजादी है, जिसका वह हकदार है। उसने मेहनत की और एक जिम्मेदार शख्स बनकर यह आजादी कमाई है। लेकिन हर मुद्दे पर आजादी तो नहीं दी जा सकती। परिवार में आजादी की सीमाएं भी होती हैं। रणबीर अब अपनी लड़ाई खुद लड़ रहा है। वह अपने फैसले खुद ले रहा है। जब तक वह खुद को साबित करता रहेगा, सिनेमा के पर्दे पर बना रहेगा। कभी-कभार फिल्मों के चयन को लेकर राय जरूर ले लेता है, लेकिन फैसला वही करता है और मैं उसमें कभी दखल भी नहीं देता। वह अच्छी फिल्में चुन रहा है। वह अलग तरह का काम करना चाहता है इस सिलसिले में उसने कुछ फ्लॉप फिल्में भी की हैं, जैसे ‘वेक अप सिड’, ‘रॉकेट सिंह’, ‘जग्गा जासूस’ वगैरह। उसकी पहली फिल्म ‘सांवरिया’ ही फ्लॉप थी, लेकिन लोगों ने उसे पसंद किया और वह लोगों की पसंद पर खरा उतरने की जद्दोजहद भी कर रहा है। आज रणबीर उस मकाम पर पहुंच गया है, जहां उसे देखकर मैं सारी परेशानियां भूल जाता हूं।
