'तानाजी' और 'जोधा अकबर' से 'पद्मावत' तक, क्या बॉलीवुड फिल्मों में इतिहास से हो रही है छेड़छाड़ ?
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सैफ के इन तर्कों को मशहूर फिल्मकार मुजफ्फर अली बेकार बताते हैं। वो कहते हैं, "जब आपको पता था कि फिल्म का पॉलिटिकल नैरेटिव बदला गया है तब भी आपको यह किरदार आकर्षक कैसे लगा? ये कोई तर्क नहीं है। आप या तो ऐसे रोल मत कीजिए या फिर कीजिए। पता होते हुए गलत करने का क्या मतलब है?" तानाजी फिल्म में मुगल शासकों को विदेशी और हिंसक बताया गया है जबकि मराठों का महिमामंडन किया गया है।
उमराव जान जैसी फिल्में बनाने वाले निर्देशक मुजफ्फर अली कहते हैं, "मसला केवल तानाजी का ही नहीं है। आप पद्मावत देख लीजिए। इसमें तो अलाउद्दीन खिलजी को किसी चपरासी की तरह दिखाया है। अलाउद्दीन खिलजी मध्यकाल का एक शासक था और आप उसके किरदार को ऐतिहासिक रिसर्च के आधार पर ही दिखाएंगे न कि हिन्दू-मुस्लिम दुर्भावना के साथ। फिल्मों में संकीर्ण एजेंडे को लेकर काम किया जा रहा है। इतिहास के किरदारों के साथ आप खेल नहीं सकते।"
क्या फिल्मकार भारत के मुसलमान किरदारों को विकृत बनाकर पेश करते हैं? जाने-माने इतिहासकार हरबंस मुखिया कहते हैं, "किसी भी शासक को हम धर्म के चश्मे से कैसे देख सकते हैं? अकबर के सबसे खास राजा मान सिंह थे। औरंगजेब के जमाने में राजा जसवंत सिंह और जय सिंह सबसे खास रहे। मराठे भी भरे हुए थे। मध्यकाल में कोई मुस्लिम शासन नहीं था। मुसलमान शासक जरूर थे लेकिन उस शासन में हिन्दू भी निर्णायक पदों पर थे। फिल्में बाजारू हो सकती हैं लेकिन इनमें इतिहास को बाजारू नहीं बनाया जा सकता है।"
हरबंस मुखिया कहते हैं कि यह तर्क बहुत ही फर्जी है कि जो चलता है वही दिखाया जाता है। वो कहते हैं, "दरअसल, जिसकी सरकार होती है और जिस तरह का राजनीतिक ध्रुवीकरण होता है, उस तरह की फिल्में बनती हैं। कांग्रेस की सरकार में हिन्दू-मुस्लिम प्रेम पर 'जोधा-अकबर' बनी और अभी की सरकार में उग्र राष्ट्रवाद और 'तानाजी' जैसी फिल्में बन रही हैं। फिल्मकार भी ताक में रहते हैं कि किस राजनीतिक पार्टी को कैसी फिल्में बनाकर खुश करना है। आखिर बीजेपी शासित राज्यों में तानाजी को टैक्स फ्री क्यों किया गया?"
मुजफ्फर अली मानते हैं कि हिन्दी फिल्मों ने भारतीय जनमानस का इतिहासबोध बिगाड़ा है। इस बात से हरंबस मुखिया भी सहमत हैं। इन दोनों का कहना है कि इतिहास को अपने तरीके से पेश करने की गलती आपके उस डिस्क्लेमर से माफ नहीं हो जाता है कि इस फिल्म के सभी किरदार काल्पनिक हैं। मुखिया कहते हैं कि अगर सभी किरदार काल्पनिक हैं तो नाम भी काल्पनिक रखो।
जाने-माने फिल्मकार आनंद पटवर्धन को लगता है कि फिल्मकार मुसलमान किरदारों को बायस्ड होकर देखते हैं। वो कहते हैं, "पद्मावत फिल्म अलाउद्दीन खिलजी को हत्यारा, लंपट और दूसरे की पत्नी पर नजर रखने वाला दिखाया गया है। फिल्मकार को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि खिलजी का क्या योगदान था। ये बात सही है कि खिलजी ने अपने चाचा की हत्या कर सत्ता हासिल की थी लेकिन सम्राट अशोक ने भी अपने कई भाइयों को मारा था। क्या किसी ने फिल्म में सम्राट अशोक को हत्यारे की तरह दिखाया गया है? नहीं दिखाया है। हमारे फिल्मकारों का भी भारतीय समाज से वैज्ञानिक सोच खत्म करने में अहम योगदान दिया है।"
मीनाक्षी जैन दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास की प्रोफेसर हैं और उन्हें दक्षिणपंथी इतिहासकार के तौर पर देखा जाता है। वो कहती हैं, "ये बात बिल्कुल सही है कि अकबर की जोधाबाई नाम की कोई रानी नहीं थी। लेकिन हम अलाउद्दीन खिलजी से सम्राट अशोक की तुलना नहीं कर सकते हैं। अशोक ने तो बाद में हिंसा का रास्ता छोड़ दिया था। उन्होंने अपनी गलती मान ली थी। अलाउद्दीन खिलजी के जीवन में ऐसा कोई परिवर्तन नहीं आया।"
आनंद पटवर्धन को लगता है कि अभिनेताओं को केवल लालच पूरा करने के लिए काम नहीं करना चाहिए। वो कहते हैं, "पिछले साल विवेक अग्निहोत्री की फिल्म 'द ताशकंद फाइल्स' में नसीरुद्दीन शाह ने काम किया। विवेक अग्निहोत्री का ऐसी फिल्में बनाना तो समझ में आता है लेकिन ऐसी प्रोपेगेंडा फिल्म में नसीर का काम करना चौंकाता है। हालांकि अब लगता है कि बदले हालात में नसीर और सैफ जैसे अभिनेता भी खुद को बदलेंगे।"