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'तानाजी' और 'जोधा अकबर' से 'पद्मावत' तक, क्या बॉलीवुड फिल्मों में इतिहास से हो रही है छेड़छाड़ ?

बीबीसी हिंदी Published by: प्रतीक्षा राणावत Updated Thu, 23 Jan 2020 07:31 PM IST
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Saif Ali Khan Ajay Tanhaji to Hrithik Jodha Akbar Deepika Padmaavat controversial historical movies
ऐतिहासिक फिल्में - फोटो : Social Media
सितंबर 2018 में नवाजुद्दीन सिद्दीकी नंदिता दास की फिल्म 'मंटो' में सआदत हसन मंटो बने और ठीक पाँच महीने बाद बाल ठाकरे बने। नवाजुद्दीन कह सकते हैं कि एक कलाकार हर भूमिका निभाने के लिए आजाद होता है और उसके अभिनय में किसी किरदार को लेकर कोई दीवार नहीं होनी चाहिए। अभिनेता मोहम्मद जीशान अयूब कहते हैं कि मंटो उनके पसंदीदा किरदार हैं लेकिन उन्हें बाल ठाकरे का रोल मिलता, तो वो स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद ही कोई फैसला लेते। जीशान कहते हैं, "बाल ठाकरे का किरदार निभाने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन मैं प्रोपेगेंडा नहीं करूंगा। मैं हिटलर को हिटलर दिखाने वाला किरदार करूंगा लेकिन राष्ट्रभक्त दिखाने वाला नहीं करूंगा।"
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Saif Ali Khan Ajay Tanhaji to Hrithik Jodha Akbar Deepika Padmaavat controversial historical movies
Tanhaji The Unsung Warrior - फोटो : social media
वरिष्ठ फिल्म पत्रकार जिया उस सलाम कहते हैं कि कलाकार के किरदार में विविधता होनी चाहिए लेकिन मंटो की बात करने वाला कलाकार अचानक बाल ठाकरे की प्रोपेगेंडा फिल्म में काम कैसे कर सकता है? सलाम कहते हैं कि ये लालच और डर का तर्क है। क्या यही लालच सैफ अली खान के भीतर भी हावी था? 'तानाजी द अनंसग वॉरियर' फिल्म में उदयभान राठौर के किरदार से सैफ अली खान सहमत नहीं थे लेकिन उन्होंने ये रोल निभाया। सैफ अली खान का कहना है कि अगली बार से वो ऐसे किरदार का अभिनय करने से पहले सोचेंगे। उन्हें लगता है कि तानाजी में पॉलिटिकल नैरेटिव को बदला गया है और ये बहुत ही खतरनाक है। सैफ ने कहा कि उन्हें पता था कि फिल्म में इतिहास से छेड़छाड़ है। जब सैफ को इतना कुछ पता था तब भी उन्होंने ये रोल क्यों किया? सैफ ने इसका जवाब दिया है कि इसके बावजूद उन्हें उदयभान राठौर का किरदार आकर्षक लगा।
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फिल्मकार मुजफ्फर अली - फोटो : amar ujala

सैफ के इन तर्कों को मशहूर फिल्मकार मुजफ्फर अली बेकार बताते हैं। वो कहते हैं, "जब आपको पता था कि फिल्म का पॉलिटिकल नैरेटिव बदला गया है तब भी आपको यह किरदार आकर्षक कैसे लगा? ये कोई तर्क नहीं है। आप या तो ऐसे रोल मत कीजिए या फिर कीजिए। पता होते हुए गलत करने का क्या मतलब है?" तानाजी फिल्म में मुगल शासकों को विदेशी और हिंसक बताया गया है जबकि मराठों का महिमामंडन किया गया है।

उमराव जान जैसी फिल्में बनाने वाले निर्देशक मुजफ्फर अली कहते हैं, "मसला केवल तानाजी का ही नहीं है। आप पद्मावत देख लीजिए। इसमें तो अलाउद्दीन खिलजी को किसी चपरासी की तरह दिखाया है। अलाउद्दीन खिलजी मध्यकाल का एक शासक था और आप उसके किरदार को ऐतिहासिक रिसर्च के आधार पर ही दिखाएंगे न कि हिन्दू-मुस्लिम दुर्भावना के साथ। फिल्मों में संकीर्ण एजेंडे को लेकर काम किया जा रहा है। इतिहास के किरदारों के साथ आप खेल नहीं सकते।"

क्या फिल्मकार भारत के मुसलमान किरदारों को विकृत बनाकर पेश करते हैं? जाने-माने इतिहासकार हरबंस मुखिया कहते हैं, "किसी भी शासक को हम धर्म के चश्मे से कैसे देख सकते हैं? अकबर के सबसे खास राजा मान सिंह थे। औरंगजेब के जमाने में राजा जसवंत सिंह और जय सिंह सबसे खास रहे। मराठे भी भरे हुए थे। मध्यकाल में कोई मुस्लिम शासन नहीं था। मुसलमान शासक जरूर थे लेकिन उस शासन में हिन्दू भी निर्णायक पदों पर थे। फिल्में बाजारू हो सकती हैं लेकिन इनमें इतिहास को बाजारू नहीं बनाया जा सकता है।"

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जोधा अकबर
आशुतोष गोवारिकर ने 2008 में जोधा-अकबर फिल्म बनाई थी। इस फिल्म में हिन्दू राजकुमारी और मुगल शासक अकबर की प्रेम कहानी है। मध्यकाल के जाने-माने इतिहासकार हरबंस मुखिया कहते हैं, "अकबर के वक्त में जोधा बाई नाम की कोई महिला नहीं थी। जहांगीर की एक पत्नी थी जिसका नाम जोधाबाई कहा जाता है। वो जोधपुर से थीं इसलिए जोधाबाई कहा जाता है। लेकिन अकबर की कोई पत्नी जोधाबाई नहीं थी। आशुतोष ने मशहूर इतिहासकार इरफान हबीब से जाकर पूछा था और उन्होंने मना किया था लेकिन फिर भी फिल्म बनाई।" इतिहासकार अकबर की पाँच पत्नियां बताते हैं, जिनमें किसी का भी नाम जोधाबाई नहीं था। ये थीं- सलीमा सुल्तान, मरियम उद जमानी, रजिया बेगम, कासिम बानू बेगम और बीबी दौलत शाद।

हरबंस मुखिया कहते हैं कि यह तर्क बहुत ही फर्जी है कि जो चलता है वही दिखाया जाता है। वो कहते हैं, "दरअसल, जिसकी सरकार होती है और जिस तरह का राजनीतिक ध्रुवीकरण होता है, उस तरह की फिल्में बनती हैं। कांग्रेस की सरकार में हिन्दू-मुस्लिम प्रेम पर 'जोधा-अकबर' बनी और अभी की सरकार में उग्र राष्ट्रवाद और 'तानाजी' जैसी फिल्में बन रही हैं। फिल्मकार भी ताक में रहते हैं कि किस राजनीतिक पार्टी को कैसी फिल्में बनाकर खुश करना है। आखिर बीजेपी शासित राज्यों में तानाजी को टैक्स फ्री क्यों किया गया?"

मुजफ्फर अली मानते हैं कि हिन्दी फिल्मों ने भारतीय जनमानस का इतिहासबोध बिगाड़ा है। इस बात से हरंबस मुखिया भी सहमत हैं। इन दोनों का कहना है कि इतिहास को अपने तरीके से पेश करने की गलती आपके उस डिस्क्लेमर से माफ नहीं हो जाता है कि इस फिल्म के सभी किरदार काल्पनिक हैं। मुखिया कहते हैं कि अगर सभी किरदार काल्पनिक हैं तो नाम भी काल्पनिक रखो।
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alauddin khilji

जाने-माने फिल्मकार आनंद पटवर्धन को लगता है कि फिल्मकार मुसलमान किरदारों को बायस्ड होकर देखते हैं। वो कहते हैं, "पद्मावत फिल्म अलाउद्दीन खिलजी को हत्यारा, लंपट और दूसरे की पत्नी पर नजर रखने वाला दिखाया गया है। फिल्मकार को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि खिलजी का क्या योगदान था। ये बात सही है कि खिलजी ने अपने चाचा की हत्या कर सत्ता हासिल की थी लेकिन सम्राट अशोक ने भी अपने कई भाइयों को मारा था। क्या किसी ने फिल्म में सम्राट अशोक को हत्यारे की तरह दिखाया गया है? नहीं दिखाया है। हमारे फिल्मकारों का भी भारतीय समाज से वैज्ञानिक सोच खत्म करने में अहम योगदान दिया है।"

मीनाक्षी जैन दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास की प्रोफेसर हैं और उन्हें दक्षिणपंथी इतिहासकार के तौर पर देखा जाता है। वो कहती हैं, "ये बात बिल्कुल सही है कि अकबर की जोधाबाई नाम की कोई रानी नहीं थी। लेकिन हम अलाउद्दीन खिलजी से सम्राट अशोक की तुलना नहीं कर सकते हैं। अशोक ने तो बाद में हिंसा का रास्ता छोड़ दिया था। उन्होंने अपनी गलती मान ली थी। अलाउद्दीन खिलजी के जीवन में ऐसा कोई परिवर्तन नहीं आया।"

आनंद पटवर्धन को लगता है कि अभिनेताओं को केवल लालच पूरा करने के लिए काम नहीं करना चाहिए। वो कहते हैं, "पिछले साल विवेक अग्निहोत्री की फिल्म 'द ताशकंद फाइल्स' में नसीरुद्दीन शाह ने काम किया। विवेक अग्निहोत्री का ऐसी फिल्में बनाना तो समझ में आता है लेकिन ऐसी प्रोपेगेंडा फिल्म में नसीर का काम करना चौंकाता है। हालांकि अब लगता है कि बदले हालात में नसीर और सैफ जैसे अभिनेता भी खुद को बदलेंगे।"

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