'मिर्जिया' से दो स्टार संतान बॉलीवुड में दस्तक दे रहे हैं। एक अनिल कपूर के बेटे हर्षवर्द्धन कपूर। दूसरी गुजरे जमाने की अदाकारा उषा किरण की पोती सैयामी खेर। तन्वी आजमी उनकी बुआ और शबाना आजमी मौसी हैं। सैयामी के पिता भी मॉडल और उनकी मां पूर्व मिस इंडिया रह चुकी हैं, मगर उन्होंने सैयामी को ग्लैमर की चकाचौंध से दूर रखने का फैसला किया। लिहाजा वे मुंबई की बजाय नासिक में रहे। सैयामी महाराष्ट्र के लिए स्टेट लेवल पर बैडमिंटन खेल चुकी हैं। फिर सैयामी कैसे ग्लैमर जगत में आईं, पढिए उनकी जुबानी।
सैयामी खेर ने क्यों कहा, बहुत कम वफादार होते हैं शहर के युवा
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सैयामी खेर ने क्यों कहा, बहुत कम वफादार होते हैं शहर के युवा
नौ महीने लगे सैयामी से साहिबां बनने में
' मिर्जिया' में कास्टिंग होने के बाद भी मेरा सफर लंबा रहा। मुझे नौ महीने लगे सैयामी से साहिबां बनने में। दिल्ली में दिलीप शंकर जी के यहां तीन महीने एक्टिंग वर्कशॉप की। वह मेरे लिए बहुत बड़ा अनुभव था। मेरी क्रिएटिविटी यानी रचनात्मकता में काफी इजाफा हुआ। मैं सोच के स्तर पर बहुत अमीर हुई, इसलिए भी यह फिल्म मेरे लिए बहुत स्पेशल है।
चार महीने की वर्कशॉप खत्म कर मैं मुंबई आई तो दो-तीन और स्क्रीन टेस्ट बचे हुए थे। तब तक यह तय नहीं हुआ था कि मैं फिल्म में हूं कि नहीं, क्योंकि दिल्ली वाली वर्कशॉप में मेरे साथ एक और लड़की थी। बहरहाल मैंने मुंबई में राकेश ओमप्रकाश मेहरा सर से कहा कि अगर मैं फिल्म के लिए फाइनल होती हूं ठीक, वरना कोई बात नहीं।
वह इसलिए कि वर्कशॉप से मुझे काफी कुछ सीखने को मिला है। उसके लिए मैं सबों की आभारी रहूंगी।
अागे पढ़ें : किसने दिए सैयामी को एक्टिंग के टिप्स
सैयामी खेर ने क्यों कहा, बहुत कम वफादार होते हैं शहर के युवा
इश्क के तो तीन गवाह हैं। मेरी मेहनत का एक गवाह रब तो है ही। मैंने अपना सफर शुरू करने के लिए लंबा सफर तय किया है। मिर्जिया से दो साल पहले तक मैं स्ट्रगलिंग एक्टर थी। आरामनगर इलाके में लाइन में लगकर ऑडिशन दिया करती थी। खार से रोजाना अंधेरी इलाके के प्रॉडक्शन हाउस के चक्कर लगाती थी। ढेर सारी ऑडिशन के बाद मुझे साउथ की एक फिल्म मिली। वहां मेरी ऑन द जॉब ट्रेनिंग हुई।
वह टिपिकल साउथ फिल्म थी, जिसमें अदाकारा महज शो पीस के तौर पर होती हैं। उसका फायदा यह हुआ कि मेरी हिचक टूट गई। शबाना मासी ने मुझे सलाह दी थी कि साउथ की फिल्में भी करो। वे कैमरे के सामने आप की सारी हिचक दूर कर देती हैं। बहरहाल उसके बाद एकाध हिंदी फिल्मों के ऑडिशन हुए, मगर बात नहीं बनी। किस्मत शायद मेरे लिए कुछ और ही चीज प्लान कर रही थी। वे मेरी पारी का आगाज ' मिर्जिया' से ही करवाना चाहते थे।
आगे पढ़ें : किसकी फैन हैंं सैयामी खेर
सैयामी खेर ने क्यों कहा, बहुत कम वफादार होते हैं शहर के युवा
''राकेश सर वैसे तो बड़े गंभीर इंसान हैं, मगर उतने शरारती भी हैं। उन्होंने वर्कशॉप से लेकर मुंबई प्रवास तक मुझे नहीं बताया कि मैं ही फिल्म में हूं। बल्कि यह कहकर डराते भी रहे कि अगर मेरा सेलेक्शन नहीं हुआ तो भी मैं उसे दिल पर न लूं, क्योंकि एक्टिंग से लेकर घुड़सवारी आदि सीखने को जो मिला। मुझ जैसी मासूम, उनकी बातों पर यकीन करती रही।
आखिरकार जब उन्होंने मुझे पहली बार स्क्रिप्ट पेपर दिया तो मैं भौंचक्की रह गई। पेपर की आखिर में बहुत बड़ा नाम लिखा हुआ था। खुद गुलजार साहब का। उनकी कविताओं की तो मैं फैन हूं। ''
आगे : रिलीज से पहले जानें मिर्ज्या की कहानी सैयामी की जुबानी
सैयामी खेर ने क्यों कहा, बहुत कम वफादार होते हैं शहर के युवा
मिर्जिया की कहानी अतीत और वर्तमान के चक्कर काटती रहती है। आज के जमाने मे सुचि की कहानी चल रही है। अतीत में समान पलों पर ही साहिबान की भी किस्सागोई चल रही है। दर्शक इसे पुनर्जन्म का मामला न मानें। सुचि और साहिबान अलग शख्सियत हैं। हां, अतीत दोनों को एक धागे में पिरोए हुए है। सुचि राजस्थान में है। आजाद ख्याल वाली है। बड़ी हिम्मती है। टिपिकल छुई-मुई लड़की नहीं है।
साहिबान राजसी ठाठ में पली-बढी लड़की है। मजबूत कद-काठी है उसकी। कंधे चौड़े हैं उसके। विशालकाय प्रतीत होती है तो साहिबान जैसी दिखने के लिए मुझे चार महीने लगे। मसल्स मजबूत किए। दोस्त तो मुझे पहलवान पुकारने लगे थे। पहले सुचि वाले किरदार की शूटिंग हुई। उसके चार महीने बाद साहिबान की। ऐसा लगा कि हमने दो अलग फिल्में शूट कर लीं। बहरहाल दोनों दौर में मेरे किरदार का प्रेम त्रिकोण है।
आगे : गुलजार के लिए क्या हैं सैयामी