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Sunday Special Seema Biswas: अवधी नाटक ने दिलाई मुझे बैंडिट क्वीन, साबित करना था, मैं कंट्रोवर्सी गर्ल नहीं!

Sat, 15 Apr 2023 01:05 PM IST
रुपाली रामा जायसवाल अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई Published by: रुपाली रामा जायसवाल Updated Sat, 15 Apr 2023 01:05 PM IST
सार

सीमा बिस्वास ने अपनी नई फिल्म ‘सर मैडम सरपंच’ के सिलसिले में अमर उजाला से बात की। इस दौरान एक्ट्रेस ने अपने फिल्मी करियर से लेकर इंडस्ट्री तक से जुड़े कई सवालों के बेहतरीन जवाब दिए। 

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Seema Biswas Exclusive Interview Amar Ujala Bandit Queen Khamoshi Hazaar Chaurasi ki Maa Sir Madam Sarpanch
सीमा बिस्वास - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

दीवानी जवानी के पीछे भागते सिनेमा में अनुभव का गाढ़ा रंग जो कलाकार अब भी भर रहे हैं, उनमें सीमा बिस्वास का नाम सबसे आगे है। नई फिल्म ‘सर मैडम सरपंच’ के सिलसिले में उनसे बात हुई तो बात उस असम तक भी जा पहुंची, जहां का बच्चा बच्चा अब देश की मुख्यधारा में आने को बेताब है। कम लोगों को ही पता होगा कि सीमा बिस्वास को बड़े परदे पर पहला ब्रेक जिस नाटक की वजह से मिला, वह एक अवधी नाटक है। इस खास मुलाकात में सीमा ने अपने पहले ब्रेक से लेकर हिंदी सिनेमा के निर्देशकों संजय लीला भंसाली, गोविंद निहलानी, श्याम बेनेगल और श्रीराम राघवन तक के बारे में बात की है और साथ ही इस विचार का भी समर्थन किया है कि भारत का अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव उत्तर पूर्व के राज्यों में भी आयोजित किया जाना चाहिए।

Seema Biswas Exclusive Interview Amar Ujala Bandit Queen Khamoshi Hazaar Chaurasi ki Maa Sir Madam Sarpanch
सीमा बिस्वास - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

उत्तर पूर्व के राज्य इन दिनों केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है, आपकी पृष्ठभूमि में भी असमिया सिनेमा खूब दमकता दिखता है। उत्तर पूर्व के सिनेमा को मुख्यधारा का सिनेमा बनाने के लिए अभी क्या कुछ किए जाने की जरूरत है?

असम  की ऐसी बहुत सारी खूबसूरत जगहें हैं जिनके बारे में लोगों को पता ही नहीं है। वहां के टूरिज्म को बहुत ज्यादा बढ़ावा देने की जरूरत है ताकि फिल्म मेकर्स को उन खूबसूरत जगहों के बारे में पता चले। इससे वहां के अधिक से अधिक लोग फिल्मों की शूटिंग में भी हिस्सा ले सकते हैं। स्थानीय कलाकारों को काम मिलने का भी ये बड़ा मौका होगा। असम के लोग बाहर से आने वालों का बहुत ही प्यार से स्वागत करते हैं। आतंकवाद को लेकर भी यहां जो डर रहा है, वह भी पर्यटन बढ़ने से दूर होता जाएगा। असम के घर घर में कलाकार हैं। पढ़ाई के साथ कला से लगाव यहां विरासत में मिलता है। हां, लोग थोड़े शर्मीले स्वभाव के होते हैं और अपने बारे में ढिंढोरा नहीं पीटते।

Seema Biswas Exclusive Interview Amar Ujala Bandit Queen Khamoshi Hazaar Chaurasi ki Maa Sir Madam Sarpanch
सीमा बिस्वास - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

क्या गोवा फिल्म फेस्टिवल जैसा एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल हर साल उत्तर पूर्व के राज्यों में करने से वहां के सिनेमा को मुख्यधारा में लाया जा सकता है?

बिल्कुल, बहुत सही आइडिया दिया ‘अमर उजाला’ ने। बीच में ऐसी चर्चाएं शुरू भी हुई थीं लेकिन बाद में फिल्म फेस्टिवल का आयोजन गोवा शिफ्ट हो गया। अगर असम सरकार इस दिशा में कदम उठाए तो इससे हमारे यहां का माहौल और भी अच्छा हो जाएगा। उम्मीद करती हूं कि इस तरह का कोई ना कोई आयोजन असम में बहुत जल्द होगा। मुझे लगता है कि असम सरकार जरूर इस दिशा में कोई कदम उठाएगी और इससे उत्तर पूर्व के राज्यों को मुख्य सिनेमा से जोड़ा जा सकेगा। सिनेमा की जो सॉफ्ट पॉवर है वह उत्तर पूर्व की किस्मत बदल सकती है।

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सीमा बिस्वास - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

थोड़ा पीछे जाकर आपकी पहली चर्चित फिल्म बैंडिट क्वीन की बात करते हैं। लोग कहते हैं कि शेखर कपूर ने ये फिल्म आपको एनएसडी में कोई नाटक देखने के बाद दी, कौन सा था वह नाटक और उसमें आपका रोल क्या था?

उस नाटक का नाम 'खूबसूरत बहू' था, उसे अवधी भाषा में लिखा गया था। उस नाटक को रंजीत कपूर ने डायरेक्ट किया था। शेखर कपूर ने मेरे बारे में सुन रखा था। एक बार मुझसे मिल भी चुके थे। यह नाटक देखने वह चुपके से चले और नाटक देखने के बाद अकेले में मिलकर बोले, कल मिल सकती हो। अगले दिन वह सबके सामने मिले और वहीं ऐलान कर दिया कि मेरी फिल्म की यही फूलन देवी हैं। 

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सीमा बिस्वास - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

रंगमंच से आए कलाकारों ने हिंदी सिनेमा में अपना मजबूत स्थान बनाया है, क्या सिनेमा में रंगमंच से आए कलाकारों को वाकई हाथों हाथ लिया जाता है? 

इस बारे में तो मैं क्या ही बोलूं। मैं तो खुद थियेटर से हूं। थियेटर के एक्टर हर बार यह कोशिश करते हैं कि कुछ अलग करें। थियेटर में जरूरी नहीं है कि वकील काला कोट ही पहने। थियेटर में कोई बुजुर्ग भी 18 साल के युवक का रोल कर सकता है, जबकि फिल्मों में ऐसा असंभव है। फिल्मों में वास्तविकता के बहुत नजदीक जाना पड़ता है। हम जब काम करते हैं तो ऐसा नहीं सोचते हैं कि हम फिल्म कर रहे हैं या फिर थियेटर वाले हैं। हम ये सोचते हैं कि किरदार क्या है और उसे कैसे करना है। फिल्मों में इतने साल हो गए काम करते अभी तक मुझे नहीं पता चला कि कैमरा में कितने लेंस होते हैं और कौन सी लाइट कहां काम कर रही है। मेरा काम है अभिनय करना और इस बात का ध्यान रखना कि डायरेक्टर मुझसे क्या चाहता है।

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