आठ ऑस्कर पुरस्कार जीतने वाली फिल्म ‘गांधी’ बनाने के बाद इसके निर्देशक रिचर्ड एटनबरो ने जिस अगली फिल्म की तैयारी कर रहे थे, उसके लिए उस दौर की नामचीन अभिनेत्रियों हेमा मालिनी और शबाना आजमी के बीच तगड़ा मुकाबला हुआ। हेमा मालिनी को इस मुकाबले में जीत की उम्मीद कतई नहीं थी क्योंकि वह शबाना के हॉलीवुड संपर्कों के बारे में भली भांति वाकिफ थीं, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। हेमा मालिनी ने आखिर में रिचर्ड एटनबरो को अपनी सिर्फ एक फिल्म देखने का निवेदन किया, और उसके बाद जो हुआ, वह हिंदी सिनेमा का इतिहास बन गया।
Shabana Azmi Birthday: ‘गांधी’ के निर्देशक की इस फिल्म के लिए शबाना का हुआ हेमा से कंपटीशन, फिर किसे मिला रोल?
बीती सदी के नौवें दशक की शुरुआत में फिल्म ‘गांधी’ का पूरी दुनिया में हल्ला मचा। फिल्म 30 नवंबर 1982 को भारत में रिलीज हुई तो सिनेमा के सुधी दर्शकों को इसके दो नाम हमेशा के लिए याद हो गए। एक इसमें गांधी का किरदार करने वाले अभिनेता बेन किंग्सले और दूसरा इसके निर्देशक रिचर्ड एटनबरो का। फिल्म ने अगले साल के ऑस्कर पुरस्कारों में रिकॉर्ड 11 नामांकन हासिल किए और इनमें से आठ जीते भी। बेन किंग्सले को बेस्ट एक्टर का पुरस्कार मिला जबकि रिचर्ड एटनबरो ने बेस्ट पिक्चर और बेस्ट डायरेक्टर दोनों पुरस्कार अपनी झोली में डाले।
फिल्म ‘गांधी’ की मेकिंग के दौरान ही रिचर्ड एटनबरो के हाथ अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई पर लिखा गया कुछ ऐसा साहित्य हाथ लगा कि वह इस ऐतिहासिक चरित्र पर न सिर्फ मोहित हुए बल्कि उन्होंने इस पर फिल्म बनाने की भी ठान ली। फिल्म की कथा, पटकथा पर काम शुरू हुआ तो एटनबरो ने तय किया कि ये किरदार कोई भारतीय अभिनेत्री ही निभाएगी। तमाम अभिनेत्रियों के बारे में शोध करने के बाद रिचर्ड एटनबरो की तलाश आकर हिंदी सिनेमा की दो अभिनेत्रियों शबाना आजमी और हेमा मालिनी पर टिक गई।
सिनेमा में उन दिनों शबाना की लहर सी चल रही थी। तब तक सर्वश्रेष्ठ अभिनय के दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार वह जीत चुकी थीं और सिनेमाघरों में उनके नाम से फिल्में देखने लोग आया करते थे। ‘अर्थ’, ‘ये नजदीकियां’ जैसी उनकी चर्चित फिल्में साल 1982 में ही रिलीज हुई थी और रिचर्ड एटनबरो की नई फिल्म के बारे में भी उनके पास सारे अपडेट नियमित रूप से पहुंच रहे थे। शबाना आजमी का विश्व सिनेमा में नाम भी काफी था और करीब करीब ये तय हो चुका था कि रिचर्ड एटनबरो की फिल्म ‘झांसी की रानी लक्ष्मीबाई’ में लीड किरदार उन्हीं को मिलेगा।
लेकिन, हेमा मालिनी ने हार नहीं मानी। हिंदी सिनेमा में सबसे ज्यादा फीस लेने वाली हीरोइन का तमगा उन्हें मिल ही चुका था और उनके रूप, लावण्य और राजसी रुआब पर मोहित होकर ही निर्देशक कमाल अमरोही ने हेमा को फिल्म ‘रजिया सुल्तान’ में शीर्षक भूमिका दी थी। बताते हैं कि हेमा ने अपनी आखिरी कोशिश के रूप में रिचर्ड एटनबरो से निवेदन किया कि वह अपना अंतिम फैसला लेने से पहले एक बार यह फिल्म देख लें। एटनबरो ने फिल्म देखी और जैसा कि हेमा ने सोचा था, वैसा ही हुआ। इस रोल के लिए हेमा मालिनी को साइन कर लिया गया। फिल्म की शूटिंग की तैयारियों के लिए काफी दिन तक काम भी चला। बाद में वित्तीय कठिनाइयों के चलते रिचर्ड एटनबरो को ये फिल्म बंद करनी पड़ी। लेकिन, हेमा मालिनी पर इस किरदार का इतना असर रहा कि इसके एक दशक बाद उन्होंने धारावाहिक ‘झांसी की रानी’ में यही किरदार निभाया।
