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Shabbir Kumar Interview: जब मनमोहन देसाई की जिद ने बदल दी गुमनाम गायक की तकदीर, शब्बीर यूं बने सिंगर नंबर वन

Wed, 25 Oct 2023 06:55 PM IST
Virendra Mishra वीरेंद्र मिश्र
Updated Wed, 25 Oct 2023 06:55 PM IST
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Shabbir Kumar Interview on his birthday Laxmikant Pyarelal R D Burman Betaab Coolie Mard Pyar Jhukta Nahin
शब्बीर कुमार - फोटो : अमर उजाला
हिंदी सिनेमा की गायिकी में जब जिक्र शब्बीर कुमार का आता है तो कहते हैं कि बस उनका नाम ही काफी है। 'कुली', 'बेताब', 'तेरी मेहरबानियां', 'प्यार झुकता नहीं' और 'मर्द' जैसी कई बड़े बजट की फिल्मों में एक से बढ़कर एक हिट गीत गाने वाले शब्बीर कुमार गुजरात से मुंबई आए। मोहम्मद रफी के गाए गाने आर्केस्ट्रा में सुनाकर लोगों का दिल बहलाते रहे और फिर एक दिन उन पर किस्मत ऐसी मेहरबान हुई कि फिर पीछे मुड़कर उन्होंने कभी नहीं देखा। 26 अक्टूबर 1954 को गुजरात के बड़ौदा (अब वडोदरा) में जन्मे शब्बीर कुमार से उनके जन्मदिन की पूर्व संध्या पर एक खास बातचीत।

 

Shabbir Kumar Interview on his birthday Laxmikant Pyarelal R D Burman Betaab Coolie Mard Pyar Jhukta Nahin
शब्बीर कुमार - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
क्या ये सच है कि गाना गाने से पहले आपका पेशा पेंटिंग था?

हां, मुझे फिल्मों में गाने का शौक कभी नहीं रहा। मैं तो पेंटिंग करता था। पेंटिंग करते समय रेडियो पर मोहम्मद रफी साहब के गाने सुनता था। मेरी उंगलियां उनका गाना सुनकर अपने आप चलने लगती थीं। रेडियो पर गाने सुनने -सुनते मुझे भी संगीत का शौक हो गया और दोस्तों की सलाह पर पर मैंने आर्केस्ट्रा में गाना शुरू कर दिया। मेरी आवाज को काफी पसंद किया गया। मैंने संगीत की कहीं से कोई तालीम नहीं ली है। मैं तो बस रेडियो पर रफी साहब, लता मंगेशकर और किशोर कुमार के गाने सुनकर गायक बन गया।

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शब्बीर कुमार, मोहम्मद रफी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
ये भी किस्सा मशहूर है कि मोहम्मद रफी की कब्र में आपका पेन गिर गया था?

जब मोहम्मद रफी साहब का इंतकाल हुआ तो मैं बड़ौदा में था। मेरे पिता राजस्व विभाग में अधिकारी थे और बेहद ईमानदार अधिकारी थे। रफी साहब के निधन की खबर सुनकर मेरा बड़ा मन हुआ मुंबई आने का। मेरे बहनोई ने मुझे कुछ पैसे दिए। मैं जूनियर महमूद और जॉनी विस्की के साथ स्टेज शोज किया करता था। उन लोगों ने मुझे कब्र तक पहुंचने में मदद की। उनको उस वक्त दफन करने के लिए उतारा जा रहा था और न जाने कैसे रफी साब का पैर मेरे हाथ में आ गया। ठीक उसी वक्त पहली मेरी घड़ी टूटकर नीचे गिरी और फिर जेब से निकलकर कलम भी कब्र में गिर गया। शायद रफी साहब ने उसी कलम से मेरी तकदीर लिख दी।

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शब्बीर कुमार, उषा खन्ना - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

पहला मौका आप को कब मिला?
मुझे सबसे पहला मौका संगीतकार उषा खन्ना ने फिल्म 'तजुर्बा' में दिया। मैं 'एक शाम रफी के नाम' शो में गाने गाता था। वहां काम करने वाले एक साजिंदे ने मेरे बारे में उनको बताया। उषा जी बना बताए मेरे कार्यक्रम में मुझे सुनने आई और वहीं मुझे अपनी फिल्म में गाने का मौका दिया। यह फिल्म मुझे रफी साहब के गाए गाने की वजह से ही मिली और बाद धीरे-धीरे छोटी मोटी फिल्मों में मेरी गायकी का सफर शुरू हो गया। 

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शब्बीर कुमार, मनमोहन देसाई - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

और, फिर आया सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट यानी कि फिल्म 'कुली'...
'कुली' फिल्म के सभी गाने पहले रफी साहब ही गाने वाले थे। मनमोहन देसाई के दिल में रफी साहब के लिए बहुत इज्जत थी। वह उनको अपने पिता के समान मानते थे। वह अपने घर के मंदिर में भगवान की मूर्ति के पास रफी साहब की तस्वीर रखते थे। रफी साहब के इंतकाल के बाद वह 'कुली' के गानों के लिए रफी साहब जैसी आवाज वाले गायक की ही तलाश कर रहे थे।

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