शशि कपूर बॉलीवुड के दिग्गज कलाकारों में से एक थे। उनका जन्मदिन 18 मार्च को होता है। शशि कपूर ने सत्यम शिवम सुंदरम, सुहाग, नमक हलाल और प्यार का मौसम जैसी कई शानदार फिल्मों में काम किया। उन्हीं में से एक फिल्म थी दीवार। दीवार फिल्म में उनके साथ अभिनेता अमिताभ बच्चन मुख्य भूमिका में थे। इस फिल्म की कहानी और डायलॉग्स को दर्शकों आज ही काफी पसंद करते हैं। ऐसे में आज हम आपको दीवार फिल्म से जुड़े कुछ किस्से बताने जा रहे हैं।
शशि कपूर-अमिताभ की इस फिल्म के आज भी दीवाने हैं लोग, चोर-पुलिस के किरदार ने खूब बटोरी तालियां
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विजय का किरदार पहले राजेश खन्ना को निभाना था और रवि की भूमिका के लिए नवीन निश्चल चुने गए थे। लेकिन यश चोपड़ा के साथ इन दोनों की जमी नहीं और फिर ये भूमिका अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के हिस्से में आ गई। इस फिल्म का जादू अगर आज तक क़ायम है तो इसमें अमिताभ बच्चन-शशि कपूर की जोड़ी के अभिनय के अलावा दमदार कहानी, चुस्त पटकथा और एक से बढ़कर एक डॉयलॉग की भूमिका रही है। सलीम-जावेद की ज्यादातर फिल्मों का नायक अपने पिता के खिलाफ विद्रोही तेवर अपनाने वाला नज़र आता है, लेकिन दीवार के नायक के साथ उन्होंने इसका एक मार्मिक पहलू भी जोड़ दिया है।
अमिताभ बच्चन की बांह पर लिखा है- 'मेरा बाप चोर है।' अपने पिता के प्रति अमिताभ दीवार में ग़ुस्से से भरे दिखाई देते हैं लेकिन यहां सांत्वना के बोल उनके पिता को भी मिलते हैं, जिनकी भूमिका एक मिल में मजदूर यूनियन के नेता की है, जिन्हें मालिकों ने षड्यंत्र से चोर बेईमान साबित कर दिया है। दो बेटों को पालने संवारने के साथ साथ नैतिक मूल्यों पर खरी मां की सशक्त भूमिका निरूपा राय ने निभाई है। क्लाइमेक्स में उनकी छवि मदर इंडिया की लीजेंडरी नरगिस की भूमिका से मेल खाती दिखती है जिन्होंने एक लड़की के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती करने के चलते अपने नायक बेटे को गोली मार दी थी।
दीवार में ऐसे कई सीन थे, जो 1975 के हिसाब से आम जन मानस को झकझोरने वाले थे। मसलन बचपन से ही अमिताभ बच्चन अपनी मां के साथ मंदिर नहीं जाते हैं, वे मंदिर के बाहर खड़े होते हैं। एक मासूम बताता है कि वह भगवान को नहीं मानता और जो भी करेगा अपने दम पर करेगा। आज के दौर में बनी फिल्मों में ऐसे दृश्य रखे जाएं तो विवाद उत्पन्न हो जाएगा। लेकिन आज से महज चार दशक पहले तक ऐसे सीन फिल्म की कहानी को कहीं दमदार बनाते हैं। भगवान को नहीं मानने वाला वह लड़का बूट पालिश करके पैसा कमाता है ताकि मां की मुश्किलें थोड़ी कम हों। महज सात आठ साल की उम्र में उनका साहस इतना है, पालिश करने के बाद जब एक सेठ उन्हें पैसे फेंक कर देता है तो वे बोलता है, "मैं फेंके हुए पैसे नहीं उठाता।"
सेठ भी बच्चे की दिलेरी से ऐसा प्रभावित हुआ कि अपने आदमी से बोलता है कि देखना ये लड़का एक दिन बहुत आगे जाएगा। अमिताभ ने अपने बचपने में ही पढ़ाई नहीं करने का फैसला किया ताकि छोटा भाई पढ़ सके। और बीसेक साल बाद जब वही सेठ अपने साथ गैर क़ानूनी काम के लिए उसी युवक को टेबल पर पैसे फेंक कर देता है तो आत्मविश्वास से लबरेज वह युवा कहता है, "मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता।"
अमिताभ बच्चन को ये डॉयलॉग रिपीट करते हुए देखकर सिनेमा हॉल में 1975 में भी तालियां बजती थीं, 1985, 1995 और 2005 में भी। 2020 के मल्टीप्लेक्स के जमाने में भी दीवार लगे तो लोग तालियां बजाए बिना नहीं रहेंगे। अपराध के रास्ते पर काम शुरू करने से पहले दीवार में अमिताभ डॉकयार्ड में कुली की भूमिका में हैं। जहां वे हर दिन मजदूरों से कमीशन वसूलने वाले गुंडों से एक दिन भिड़ जाते हैं। इसका टीजर वे पहले दे देते दैं, जब उनका एक डॉयलॉग आता है, "रहीम चाचा, जो पच्चीस बरस में नहीं हुआ वो अब होगा। अगले हफ्ते एक और कुली मवालियों को पैसे देने से इनकार करने वाला है।" और जब ये मवाली उन्हें पीटने के लिए ढूंढ़ रहे होते हैं तब अमिताभ उनका इंतजार करने उनके ही गोदाम में पहुंच जाते हैं।
वे कहते हैं, "पीटर तेरे आदमी मुझे बाहर ढूंढ रहे हैं और मैं तुम्हारा यहां इंतजार कर रहा हूं।" इतना कहने के बाद वे दरवाज़ा अंदर से बंद कर देते हैं और चाबी पीटर की ओर फेंकते हुए कहते हैं कि तुमसे चाबी लेकर मैं ये दरवाजा खोलूंगा और यह कहते हुए वे 25 गुंडों से भिड़ गए। यह सिनेमाई पर्दे पर ही संभव है लेकिन ऐसे दृश्यों और ऐसे डॉयलॉग्स ने अमिताभ की सिनेमाई छवि को लार्जर दैन लाइफ़ बना दिया।
मोदी है तो मुमकिन है के नारों से बहुत पहले अमिताभ की सिनेमाई छवि ऐसी ही थी अमिताभ है तो कुछ भी मुमकिन है। उस दौर में भारतीय युवाओं में महत्वाकांक्षा और मौजूदा परिस्थितियों को लेकर जो आक्रोश था, उसका सबसे बड़ा चेहरा अमिताभ बच्चन जिन दो फिल्मों से बन गए, उनमें पहली जंजीर थी जिसमें वे पुलिस अधिकारी के तौर पर सिस्टम का हिस्सा था। और दूसरी फिल्म दीवार रही जिसमें उन्होंने सारे सिस्टम को धता बता दिया था।