चीन में बने उत्पादों का बहिष्कार करने वाला एक वीडियो टिकटॉक ने अपने प्लेटफॉर्म से हटाया तो इसे बनाने वाली सोशल मीडिया स्टार सलोनी गौड़ रातों रात सुर्खियों में आ गईं। सलोनी की गिनती देश के नामी सोशल मीडिया सितारों में होती है। दिल्ली में स्नातक अंतिम वर्ष की छात्रा सलोनी ने अमर उजाला के लिए पंकज शुक्ल से की ये एक्सक्लूसिव बातचीत।
EXCLUSIVE: ऐसे हुआ सोशल मीडिया पर नजमा आपी का जन्म, बुलंदशहर की सलोनी ने सुनाई पूरी दास्तान
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बुलंदशहर में रहते हुए पहली बार आपको कब लगा कि लोगों को आपकी कला पर हंसी आती है?
मुझे तो अपने परिवार में ही पता चल गया था कि कुछ तो मैं कर सकती हूं जो लोगों को हंसा सके। मेरी दादी पुष्मा शर्मा मेरी सबसे पहली प्रशंसक हैं। मैं ज्यादा बोलती नहीं हूं। मम्मी पापा रिश्तेदारों के यहां साथ लेकर जाते थे। वहां मेरी उम्र का कोई बच्चा नहीं होता था तो मैं बस शांत बैठकर दूसरों को निहारा करती और उनके बातचीत के तौर तरीकों को देखा करती। वहां से लौटकर आती तो दादी को अपने सभी रिश्तेदारों की मिमिक्री करके सुनाती थी। मामा की नकल उतारती, नानी की नकल उतारती तो दादी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी। वह मुस्कान ही मेरा पहला इनाम थी। फिर मैं स्कूल में भी लोगों की मिमिक्री करने लगी।
तो स्कूल में कभी स्टेज पर या क्लास में ऐसा कुछ हुआ हो जिसने आपको इस क्षेत्र को ही अपनाने का हौसला दिया हो?
बुलंदशहर के वनेसा स्कूल में पढ़ाई के दौरान मैं अपने अध्यापकों की खूब मिमिक्री करती थी, बच्चों को पसंद भी खूब आता था। उन अध्यापकों का नाम बताना तो यहां ठीक नहीं रहेगा लेकिन हां, हमें अंग्रेजी में बातचीत करना सिखाने वाले एक अध्यापक थे नितिन गोविल, अब वह इस स्कूल में नहीं पढ़ाते हैं, उन्होंने मेरा हौसला खूब बढ़ाया। हुआ यूं कि बच्चों ने उन्हें बता दिया कि ये लड़की मिमिक्री बहुत अच्छा करती है तो उन्होंने मुझे इसे करके दिखाने को कहा। मैंने उन्हीं की क्लास में उन्हीं की मिमिक्री करके दिखाई। उन्होंने मेरी बहुत तारीफ की और मेरा बहुत हौसला बढ़ाया। शायद उस एक शाबाशी ने मुझे आगे तक जाने में बहुत मदद की।
फिर आप दिल्ली आईं और दिल्ली के प्रदूषण व कंगना रनौत की मिमिक्री वाले वीडियो ने आपकी लाइफ बदल दी। घरवालों को आपकी ये बगावत पसंद आई या फिर डांट पड़ी?
दरअसल, ये सब कुछ मेरा भाई शुभम गौड़ पहले ही झेल चुका है। वह मुझसे पांच साल बड़ा है। वह भी घर से सीए बनने ही निकला था। कोचिंग भी उसकी इसी के लिए लगी। लेकिन उसका एक्टिंग में मन लगता था तो नाटकमंडली में शामिल हो गया। अमेजन प्राइम पर एक सीरीज आई है हॉस्टल डेज उसमें उन्होंने काम किया है।
अच्छा तो घरवालों को कैसे पता चला कि बेटा उनका ये गुल खिला रहा है?
ये उन दिनों की बात है जब सबके पास स्मार्टफोन नहीं हुआ करते थे, इंटरनेट भी इतना सस्ता नहीं था। शुभम भैया का एक वीडियो वायरल हो गया था। रिश्तेदारों ने देखा। घर में मम्मी पापा को बताया। खूब सुनना पड़ा हम लोगों को। उन्हें भी खूब समझाया लोगों ने कि इसमें नियमित आमदनी नहीं है वगैरह वगैरह..। लेकिन फिर लोगों ने भैया के बारे में बातें करनी शुरू कीं। इंटरव्यू आने लगे उनके तो मम्मी पापा को लगा कि ये सही चीज है। मेरी बारी आने तक ये सब हो चुका था तो मुझे तो सपोर्ट ही मिला लेकिन हां ये था कि पहले स्नातक तक की पढ़ाई जरूर पूरी कर लो फिर जो मन को अच्छा लगे वो काम करो।
लेकिन, आज देश में लाखों सलोनियां ऐसी हैं जिन्हें घर में या अपने बड़े भाई का इस तरह का साथ नहीं मिलता, उन्हें अपनी पसंद का काम करने के लिए क्या करना चाहिए?
पहले तो मैं ये एक बात स्पष्ट कर दूं कि मुझे मेरे भाई का कोई सहयोग नहीं मिला। पहले तो मुझे वह सोशल मीडिया पर फॉलो भी नहीं करते थे। कहते थे कि किसी दिन कोई वीडियो वायरल हो गया तो मैं फॉलो करूंगा। मैंने जो किया खुद से किया। हां, उनका इस बात में साथ मिला कि वह मम्मी पापा को बोलते रहे कि ये जो कर रही है करने दो। मेरी मम्मी (कविता शर्मा) आज भी कहती रहती हैं कि बैंक में जगह निकलें तो फॉर्म जरूर भर देना। हर माता पिता अपनी संतान को ऐसे पेशे में देखना चाहता है कि जहां उसकी नियमित आमदनी हो। मेरा इस बारे में ये कहना है कि पहले अपनी पढ़ाई स्नातक तक पूरी करना जरूरी है, फिर खुद को आंकना जरूरी है। आप क्या करना चाहते हैं, उसके लिए ये जांचना जरूरी है कि आपके भीतर उस क्षेत्र में कुछ अलग कर सकने की काबिलियत है कि नहीं।
इतनी कम उम्र में इतनी समझदारी आई कहां से?
मेरे पापा भूपेंद्र शर्मा मुझसे हमेशा दो ही बातें कहते थे। एक, स्कूल जाओ तो अच्छे से नाश्ता करके जाओ। उन दिनों बच्चे धूप में खड़े होकर जब प्रार्थना करते थे तो आधे बच्चे तो चक्कर खाकर गिर ही जाते थे। मेरे पापा कहते थे कि कभी ऐसे गिरना नहीं है। दूसरा ये है कि हमेशा घर से अखबार पढ़कर जाओ। हमारे घर शुरू से अमर उजाला ही आता है। पापा तब दुकान से रात 10 बजे भी आते तो हम साथ में समाचार सुनते थे। पहले तो हम बस पापा को सुनते थे फिर हम बड़े हुए तो हमने भी पापा के साथ चर्चा करनी शुरू कर दी। अमर उजाला में जब मेरी पहली खबर छपी तो दादी को बहुत अच्छा लगा, उनको पहले तो यकीन नहीं हुआ तो उन्होंने पापा से पूछा। मेरे तमाम इंटरव्यू और खबरें अंग्रेजी के अखबारों में छप चुके हैं लेकिन घर के अखबार में छपने की बात ही कुछ और है।
20-25 साल पहले सोशल मीडिया पर हिंदी में लिखने को अजूबा माना जाता था, आज स्थानीय भाषाओं का ही इंटरनेट पर बोलबाला है, इस बारे में क्या कहना चाहेंगी?
इन दिनों जो भी कंटेंट क्रिएटर हैं, वे ज्यादातर अपनी बोली या अपनी भाषाओं में ही कंटेंट बनाकर सफल हो रहे हैं। मैं भी हिंदी में या फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बोली में अपनी सामग्री बनाती हूं। हां, कुछ किरदार ऐसे होते हैं जिनमें अंग्रेजी बोलनी ही ठीक रहती है और वह भी मैं करती हूं लेकिन मेरे हिसाब से आने वाला समय स्थानीय भाषाओं और बोलियां का ही है। सोशल मीडिया पर मौजूद युवाओं को भी अपनी जमीन से जुड़े रहना बहुत पसंद है।
आपका सबसे मशहूर किरदार है नजमा आपी, इसका नाम नजमा आपा क्यों नहीं है?
हुआ ये कि जब मैं इस किरदार को बनाने पर काम कर रही थी तो मैंने अपनी एक दोस्त से मदद मांगी। वह बोली कि बहन को हमारे यहां आपा भी बोलते हैं और आपी भी तो जो पसंद है वो रख लो। तो मैंने आपी रख दिया। लेकिन, अब भी न्यूज चैनलों में ऐसे लोग हैं जिन्हें आपा, आपी या अप्पा में फर्क समझ नहीं आता। और, ये भी है कि लोगों ने मुझे अब सलोनी गौड़ की बजाय नजमा आपी ही समझना शुरू कर दिया है। किसी किरदार का नाम कलाकार के नाम से ज्यादा मशहूर हो जाए तो इसे भी अच्छा ही मानते हैं लोग।
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