सोनी लिव की वेब सीरीज 'चमक' पंजाब की म्यूजिक इंडस्ट्री के अपराध पर आधरित है। इस सीरीज की कहानी पंजाबी सिंगर सिद्धू मूसे वाला और अमर सिंह चमकीला की हत्या कांड से प्रेरित बताई जा रही है, हालांकि सीरीज के निर्देशक रोहित जुगराज का कहना है कि उनकी सीरीज की कहानी का सिद्धू मूसेवाला और अमर सिंह चमकीला की हत्याकांड से कुछ भी लेना देना नहीं है। रोहित जुगराज से अमर उजाला की एक खास बातचीत
Rohit Jugraj Interview: आंखों में थकान, जेब में टूथब्रश और सामने राम गोपाल वर्मा, जानिए, फिर क्या हुआ...
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वेब सीरीज 'चमक' देखकर लगता है कि यह सीरीज पंजाब के कुछ बेहद लोकप्रिय गायकों की हत्याओं से प्रेरित है?
जैसा इस सीरीज का नाम 'चमक' है वैसे ही इस सीरीज की एक चमकती हुई दुनिया की कहानी है। सीरीज के हीरो का स्टेज नाम काला है। इस सीरीज की कहानी चमक के पीछे अंधेरे की है। इस कांसेप्ट से ही सीरीज की पूरी कहानी स्पष्ट हो जाती है। यह दुनिया पंजाबी म्यूजिक वर्ल्ड की है। अभी हाल फिलहाल पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री में जो हो रहा है। वही इस सीरीज की कहानी है। अभी पिछले साल सिद्धू मूसेवाला के साथ जो हुआ। उससे पहले 1988 में अमर सिंह चमकीला के साथ हुआ। इस सीरीज में काल्पनिक पात्रों के जरिए पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री की सच्चाई कहीं जा रही है। किसी एक व्यक्ति की हत्याकांड से प्रेरित नहीं है।
पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री इस तरह की घटना के पीछे की वजह क्या मानते हैं आप ?
देखिए, अपराध वहीं होता है जहां पर पैसा होता है। एक बड़ी प्रसिद्ध पुरानी कहावत है जर, जोरू, जमीन, यही तीन कारण अपराध के होते हैं। पंजाब में लोगों के पास बहुत जमीन है। जमीन का एक छोटा सा हिस्सा बेचकर अल्बम निकाल दिया क्योंकि वहां हर एक को गाने का शौक है। पंजाब में ढाबे पर बैठने वाला लड़का भी गा रहा है। पंजाब में पॉलिटिशियन, क्रिकेटर के अलावा बाकी सब सिंगर है। संगीत की इतनी कदर है, यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन इसके पीछे नकारात्मक बातें भी बहुत हैं। वह है आपसी जलन और ईर्ष्या। कलाकार को जब कामयाबी मिलती है तो उसकी सहनशीलता कम हो जाती है।
पंजाबी इंडस्ट्री में काम करने से पहले आपने मुंबई में भी खूब काम किया, शुरुआत कैसी रही आपकी?
मैं मुंबई साल 2003 में पहुंचा और संजय लीला भंसाली को फिल्म 'देवदास' और 'ब्लैक' में असिस्ट किया। राम गोपाल वर्मा के गाड़ी के पीछे भागा। उनको अपनी शॉर्ट फिल्म देखने के लिए दी। उन्होंने कहा कि शॉर्ट फिल्म देखने का समय तो नहीं है। लेकिन जिस गति से तुम भागे थे, तुमको असिस्टेंट रख लूंगा। फिर मैंने राम गोपाल वर्मा को 'भूत' और 'सरकार' में असिस्ट किया।
संजय लीला भंसाली से कैसे मुलाकात हुई?
यह बहुत ही दिलचस्प घटना है। मैं दिल्ली से बैग उठाकर आ गया था और मेरे मन में था कि बिना कुछ किए वापस तो जाना नहीं है। जो कुछ करना है मुंबई में ही करना है। मैं भंसाली सर को ईमेल करता था और मुझे पता नहीं था कि ईमेल का जवाब वह नहीं बल्कि कोई और दे रहा है। जब मैं संजय लीला भंसाली के ऑफिस में गया तो सिकंदर खेर ने दरवाजा खोला। उनको मैंने अपना नाम बताया और ईमेल का प्रिंट आउट दिखाया। उन्होंने प्रिंट आउट ले लिया और बोले कि जाओ।