यह बात उस वक्त की है जब अभिनेता सुनील दत्त अभिनय में अपना रुतबा जमाने के बाद फिल्मों का निर्माण भी करने लगे थे। उन्होंने वर्ष 1963 में रिलीज हुई फिल्म 'ये रास्ते हैं प्यार के' फिल्म से अपनी प्रोडक्शन कंपनी शुरुआत की थी और इसी साल रिलीज हुई है उनके प्रोडक्शन हाउस की दूसरी फिल्म 'मुझे जीने दो'। इस फिल्म में वह खुद एक डकैत ठाकुर जरनैल सिंह के किरदार में नजर आए। फिल्म के निर्माता होने के नाते वह अपनी फिल्म को हकीकत से अछूता नहीं छोड़ना चाहते थे इसलिए शूटिंग के लिए पहुंच गए सीधे चंबल। वहां कुछ ऐसी घटनाएं हुई जो हमेशा के लिए यादगार बन गईं।
किस्सा: 'जरनैल सिंह' का रुतबा बरकरार रखने के लिए सुनील दत्त ने वहीदा रहमान से खाए थे बार-बार थप्पड़
शूटिंग के दौरान वहीदा सुनील से चिढ़ती भी बहुत थीं। दरअसल सुनील अपनी फिल्म की शूटिंग चंबल घाटी में कर रहे थे। वह डाकुओं का इलाका था और सभी कलाकारों और कारीगरों का ख्याल रखना उनका कर्तव्य था। फिल्म में वह खुद भी डाकू का किरदार कर रहे थे। कभी कभी वह लोगों से थोड़ी सख्ती से पेश आते थे इसलिए वहीदा उनसे चिढ़ने लगी थीं। वहीदा ने एक इंटरव्यू के दौरान बताया कि जब उन्हें सुनील को थप्पड़ मारने का मौका मिला तो उन्होंने जमकर थप्पड़ जड़े थे।
वहीदा रहमान ने उस शूटिंग के दौरान का एक और मजेदार किस्सा साझा किया। उन्होंने बताया था कि सुनील दत्त फिल्म में डाकू का किरदार कर रहे थे इसलिए सेट पर भी उनकी प्रवृत्ति डाकू जैसे ही हो गई थी। वह हर किसी पर नाराज रहते थे और हर किसी आने जाने वाले को रोकते टोकते थे। जब सेट पर एक बार सुनील दत्त की पत्नी नरगिस दत्त अपने बेटे संजय दत्त के साथ आई तो वहीदा रहमान ने उनसे सुनील दत्त की खूब शिकायतें कीं। इस पर नरगिस ने अपने पति का बचाव करते हुए कहा कि वह दिल के बहुत अच्छे हैं लेकिन चंबल घाटी में आकर शूटिंग कर रहे हैं और यहां डाकुओं का बहुत खतरा है इसलिए उनके ऊपर आप सब की जिम्मेदारी होने की वजह से वह थोड़े सख्त हो गए हैं। वहीदा यहां पर भी मन मार कर रह गईं।
एक दिन का जिक्र करते हुए वहीदा रहमान कहती हैं, 'मैं, फिल्म की दूसरी कलाकार निरूपा रॉय और नरगिस एक खाट पर बैठकर अमरूद काट कर खा रहे थे। तभी अचानक सुनील जी आते हैं और कहते हैं कि वहीदा जी, निरुपा जी फटाफट उठिए। नरगिस ने उनसे पूछा कि क्या हुआ? इतनी जल्दी क्या है? तो उन्होंने चिल्लाकर कहा कि आप सवाल बहुत पूछती हैं। जल्दी उठिए और जाकर जीप में बैठिए। हम लोग उठे और जीप की ओर चल दिए। सुनील जी के साथ बीएसएफ के कमांडर भी थे। जब वह आए, तब उनका चेहरा देखकर हमें अंदाजा हुआ कि यहां कुछ तो गंभीर समस्या है। उसके बाद उन्होंने हम लोगों को टेंट में छोड़ दिया। इस फिल्म की शूटिंग के लिए हमें टेंट में रहना पड़ता था।'
वहीदा रहमान ने आगे कहानी जारी रखते हुए कहा, 'जब हम लोगों को टेंट में छोड़ा गया तो हम चार औरतें और छोटा बच्चा संजू हमारे साथ था। सुनील जी ने कहा कि आप सब लोग अपने-अपने टेंट में न जाकर एक ही टेंट में रहें और संजू का ख्याल रखें। ट्रांजिस्टर और रेडियो का इस्तेमाल मत करना और ज्यादा तेज बातें भी मत करना। अब हम चार औरतें थी तो आपस में बातें कर रही थीं लेकिन संजू को रोकना मुश्किल था। क्योंकि वह छोटा था और उसे बार-बार बाहर जाना था। एक बार फिर सुनील जी आए और जैसे उन्होंने नरगिस जी से बोला था वैसे ही संजू को भी बोला कि तुम सवाल बहुत पूछते हो। चुपचाप बैठे रहो।'