‘अभी तक वह नागेश्वर राव था, अब वह टाइगर बन गया है!’ तेलुगु में बनी फिल्म ‘टाइगर नागेश्वर राव’ के हिंदी ट्रेलर का ये संवाद ही इस फिल्म का असल लब्बोलुआब है। उत्तर भारत में तो लोगों को ज्यादा नहीं पता लेकिन दक्षिण में नागेश्वर राव का नाम बच्चा बच्चा जानता है, कुछ कुछ वैसे ही जैसे कभी चंबल के डकैतों के नाम कुख्यात थे। टाइगर नागेश्वर राव अपने समय की एक किंवदंती रहा है। एक ऐसा शातिर चोर जिसने जब चाहा, जैसे चाहा और जहां चाहा, अपने हिसाब से बड़ी बड़ी चोरियां की और जब भी पुलिस की पकड़ में आया। किसी न किसी बहाने भाग निकला। उसे अपने चोरी के इस हुनर पर इतना गुमान था कि इसे साबित करने के लिए उसने प्रधानमंत्री की एक निजी वस्तु तक की चोरी कर डाली।
Tiger Nageswara Rao: सबसे बदनाम चोर की असली कहानी, चुनौती जीतने के लिए जिसने चुराया इंदिरा गांधी का ये सामान
टाइगर नागेश्वर राव आंध्र प्रदेश की बस्ती स्टुअर्टपुरम का नामी चोर रहा है। उसके खिलाफ कई गंभीर मामले दर्ज थे। टाइगर की परवरिश स्टूअर्टपुरम में हुई जिसे चोरों का गांव कहा जाता है। कहते हैं कि साल 1911 और 1914 के बीच अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरह के अपराधों को अंजाम देने वाले चोरों-डकैतों को एक साथ रखने की योजना बनाई गई। और, उस जगह का नाम स्टुअर्ट पुरम रखा गया। साल 1913 में तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के सदस्य हेरोल्ड स्टुअर्ट के नाम पर इस गांव स्टुअर्टपुरम की स्थापना हुई। सरकार का मकसद था कि चोरों और डकैतों को एक जगह रखकर उन पर नजर रखना आसान होगा।
इसी गांव में नागेश्वर राव का जन्म हुआ था। बचपन में ही अनाथ हो गए नागेश्वर को मुसीबतों ने पाला। स्कूल बीच में ही छोड़ पेट भरने के लिए वह मजदूर बना और जल्द ही अपराध की ओर मुड़ गया। साल 1973 में नागेश्वर राव ने अपनी पहली चोरी एक बैंक में की। वह इस चोरी में सफल रहा। नागेश्वर राव ने इसके बाद तमाम छोटी-मोटी चोरियां शुरू कीं और धीरे-धीरे उसके मन से पुलिस का डर जाता रहा। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों में बड़ी चोरियां करने के बावजूद वह पुलिस की पकड़ दूर रहा। यही वजह थी कि अपराध जगत के लोग उसे टाइगर कहकर बुलाने लगे। वह जो भी चुराता था, उसका बड़ा हिस्सा गरीबों में बांट देता था।
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